प्रकृति में है परमात्मा :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

19 नवम्बर 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (2634 बार पढ़ा जा चुका है)

प्रकृति में है परमात्मा :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸


‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼


*मनुष्य माता - पिता के संयोग से इस पृथ्वी पर आता है | मानव जीवन में माता - पिता का बहुत बड़ा महत्त्व है बिना इनके इस संसार में यात्रा करने का सौभाग्य प्राप्त ही नहीं हो सकता | जन्म लेने के बाद मनुष्य परिवार के संस्कार ग्रहण करके परमात्मा को ढूंढ़ने का प्रयास करने लगता है | जिस प्रकार माता - पिता के बिना जन्म संभव नहीं है उसी प्रकार परमात्मा (पिता) एवं प्रकृति (माता) के बिना जीवन नहीं सम्भव है | यदि परमात्मा पिता है तो प्रकृति मनुष्य की माता है | जन्म लेने के बाद मनुष्य सबसे पहले माँ से परिचित होता है उसके बाद माँ ही पिता से परिचय कराती है उसी प्रकार सबसे पहले प्रकृति रूपी माँ से परिचित होना पड़ता है जब मनुष्य प्रकृतिरूपी माँ से परिचित हो जाता है तब वह परमपिता से परिचित होने के मार्ग पर अग्रसर होता है | बिना प्रकृति का जाने परमपिता को नहीं जाना जा सकता क्योंकि जब कोई भी साधक उस परमपिता की ओर कदम बढ़ाता है तो सर्वप्रथम वह प्रकृति के सान्निध्य में जाता है और प्रकृति के अंग चन्द्रमा , तारे , वायु , वृक्ष आदि उसके गुरु बनकर मार्गदर्शन करना प्रारम्भ कर देते हैं | भगवान को प्राप्त करने के पहले मनुष्य में भगवत्सत्ता के गुणों का प्रकट होना परम आवश्यक है और यह गुण मनुष्य को प्रकृति रूपी माँ ही सिखाती है | प्रकृति का निर्माण पाँच तत्त्वों (भूमि , गगन , वायु , अग्नि एवं जल ) से हुआ है | सर्वप्रथम इन्हीं पंचतत्तवों के गुणों को स्वयं में समाहित करके ही परमात्मा को प्राप्त को प्राप्त किया जा सकता है | साधक जब भी किसी उलझन में पड़ता है तो उसे यह प्रकृति ही नवीन मार्ग सुझाती है | प्राय: यह देखा जाता है कि तेज आँधी के समय बड़े - बड़े वृक्ष झुक जाते हैं और आँधी के निकल जाने के बाद पुन: खड़े हो जाते हैं इससे साधक को शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए कि जब वह साधना काल में किसी उलझन में हो हृदय में अनेक प्रकार के विचार - कुविचार प्रकट होने लगें तब उत्तेजित न होकर उन्हीं वृक्षों की ही भाँति झुककर अर्थात शान्त होकर इन विचारों की आँधी को निकल जाने दो इनके शान्त होने के बाद पुन: साधना में डट जाओ | मनुष्य जिस दिन प्रकृति के रहस्यों एवं उससे प्राप्त होने वाले मूक उपदेशों को समझ समझ जाता है उसी दिन अनेक उलझनों का उत्तर तो मिल ही जाता है साथ ही वह परमात्मा के समीप भी पहुँच जाता है |*


*आज के आधुनिक युग में विस्तारीकरण की नीति पर चल रहा मानव प्रतिदिन प्रकृति का दोहन एवं क्षरण करता चला जा रहा है | जिसका परिणाम भी देखने को मिल रहा है | जिस प्रकार माँ का अपमान करने पर पिता रुष्ट होकर अपने द्वारा पुत्र को दी जा रही सेवायें अवरोघित कर देता है उसी प्रकार जब मनुष्य द्वारा प्रकृति रूपी माँ का निरादर किया जाता है तो परमपिता परमात्मा के द्वारा मनुष्य को अनेकों दण्ड मिला करते हैं | प्रतिदिन एसे दण्ड मनुष्य को मिल भी रहे हैं | आज अनेकों लोग परमात्मा को प्राप्त करने के उद्देश्य से अनेकों प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान करते हैं और इन अनुष्ठानों को भव्यता प्रदान करने एवं पांडाल लगवाने के लिए अनेकों वृक्षों को भी कटवा देते हैं | तो क्या ऐसा करने पर परमात्मा प्रसन्न होगा ?/ कदापि नहीं | आज ज्यादा पढ़े - लिखे कुछ लोग एवं साधक यह भी कहते हैं कि भला मूक प्रकृति हमें क्या शिक्षा दे सकती है ?? ऐसे सभी लोगों मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" प्रकृति के द्वारा प्राप्त हो रही शिक्षा की ओर ध्याना कर्षण कराना चाहूँगा | "भूमि" मनुष्य को भार धारण करना अर्थात धैर्य व गंभीरता की शिक्षा देती है | "गगन" विस्तारीकरण की शिक्षा देता है जब तक संकुचित भावना का त्याग करके विस्तृत नहीं बनोगे तब तक कुछ नहीं प्राप्त होगा | "वायु" के द्वारा यह शिक्षा मिलती है कि :- कैसी भी परिस्थिति हो निरन्तर बहते रहो क्योॉकि जो रुक गया उसका जीवन समाप्त हो गया | "अग्नि" सदैव बुरे विचारों को जलाकर अर्थात बीती बातों को भुलाकर आगे बढ़ते रहने का संदेश देती है | "जल" नदीरूप में निरन्तर बहता रहता है | नदी के जल का एक ही उद्देश्य होता है कि उसे समुद्र से मिलना है | यद्यपि उसके इस मिलन में बड़े - बड़े चट्टान , या मैदान , पथरीली भूमि आदि बाधक बनने का प्रयास करते रहते हैं परन्तु जल अपना मार्ग बनाकर समुद्र की ओर सतत् अग्रसर रहता है | उसी प्रकार साधक के जीवन में अनेकों बाधायें आती रहती हैं परंतु जल की निरन्तरता से शिक्षा लेते हुए अनेक विघ्न - बाधाओं के आने के बाद भी सदैव अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते ही रहना चाहिए | इस प्रकार प्रकृति (माँ) के पंचतत्वों से परिचित हुए बिना परमात्मा (पिता) को नहीं पाया जा सकता है अत: प्रत्येक मनुष्य को इस सुंदर प्रकृति का संरक्षण करते रहना चाहिए |*


*जिस प्रकार माँ के बिना जन्म और पिता के बिना उचित मार्गदर्शन नहीं सम्भव है उसी प्रकार बिना प्रकृति के जीवन एवं बिना परमात्मा के मुक्ति (मोक्ष) भी नहीं सम्भव है क्योंकि प्रकृति में ही परमात्मा है |*


🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺



आचार्य अर्जुन तिवारी

प्रवक्ता

श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा

संरक्षक

संकटमोचन हनुमानमंदिर

बड़ागाँव फैजाबाद

श्रीअयोध्याजी

(उत्तर-प्रदेश)

9935328830


🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀

अगला लेख: वैचारिक आतंकवाद :--- आचार्य अर्जुन तिवारी



जय श्री राधे

जय जय श्री राधे

प्रणाम आचार्य श्री

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
28 नवम्बर 2019
*इस समस्त सृष्टि में हमारा देश भारत अपने गौरवशाली संस्कृति एवं सभ्यता के लिए संपूर्ण विश्व में जाना जाता था | अनेक ऋषि - महर्षियों ने इसी पुण्य भूमि भारत में जन्म लेकर के मानव मात्र के कल्याण के लिए अनेकों प्रकार की मान्यताओं एवं परंपराओं का सृजन किया | संस्कृति एवं सभ्यता का प्रसार हमारे देश भारत स
28 नवम्बर 2019
27 नवम्बर 2019
*ईश्वर की बनायी यह सृष्टि बहुत ही विचित्र है , यहां एक ही भाँति दिखने वाले मनुष्यों के क्रियाकलाप भिन्न - भिन्न होते हैं | मनुष्य के आचरण एवं उसके क्रियाकलापों के द्वारा ही उनकी श्रेणियां निर्धारित हो जाती है | वैसे तो मनुष्य की अनेक श्रेणियां हैं परंतु मुख्यतः दो श्रेणियों में मनुष्य बंटा हुआ है |
27 नवम्बर 2019
07 नवम्बर 2019
🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸 ‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼ 🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻 *हमारे देश में हिंदू संस्कृति में बताए गए बारहों महीने में कार्तिक मास का विशेष महत्व है , इसे दामोदर मास अर्थात भगवान विष्णु के प्रति समर्पित बताया गया है | कार्तिक मास का क्या महत्व है इसका वर
07 नवम्बर 2019
08 नवम्बर 2019
*पंचतत्त्वों से बने मनुष्य को इस धरा धाम पर जीवन जीने के लिए मनुष्य को पंचतत्वों की आवश्यकता होती है | रहने के लिए धरती , ताप के लिए अग्नि , पीने के लिए पानी , सर ढकने के लिए आसमान , एवं जीवित रहने के लिए वायु की आवश्यकता होती है | मनुष्य प्रत्येक श्वांस में वायु ग्रहण करता है | श्वांस लेने के लिए
08 नवम्बर 2019
21 नवम्बर 2019
*परमात्मा के द्वारा मैथुनी सृष्टि का विस्तार करके इसे गतिशील किया गया | मानव जीवन में बताये गये सोलह संस्कारों में प्रमुख है विवाह संस्कार | विवाह संस्कार सम्पन्न होने के बाद पति - पत्नी एक नया जीवन प्रारम्भ करके सृष्टि में अपना योगदान करते हैं | सनातन धर्ण के सभी संस्कार स्वयं में अद्भुत व दिव्य रह
21 नवम्बर 2019
10 नवम्बर 2019
!! भगवत्कृपा हि केवलम् !!*सनातन धर्म की दिव्यता विश्व विख्यात है | संपूर्ण विश्व ने सनातन धर्म के ग्रंथों को ही आदर्श मान कर दिया जीवन जीने की कला सीखा है | प्राचीन काल में शिक्षा का स्तर इतना अच्छा नहीं था जितना इस समय है परंतु हमारे पूर्वज अनुभव के आधार पर समाज के सारे कार्य कुशलता से संपन्न कर दे
10 नवम्बर 2019
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x