कलुआ ( जीवन की पाठशाला )

20 नवम्बर 2019   |  Shashi Gupta   (462 बार पढ़ा जा चुका है)

कलुआ ( जीवन की पाठशाला )

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कलुआ होने का उसे कोई मलाल नहीं है..यह तो उसके श्रम की निशानी है..। हाँ, उसके निश्छल हृदय को कोई काला-कलूटा न कहे..इंसानों की इस बस्ती में फिर कोई शुभचिंतक उसे न छले..और कोई कामना नहीं है उसकी..।

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अरी सुनती हो.. !

जरा देखो तो तुम्हारे भैया के हाथ की चमड़ी कैसी हो गयी है..कोई क्रीम रखी हो ?

" छोड़े ,आप भी न ..अब बच्चा तो नहीं रह गया हूँ ..कुछ तो नहीं हुआ है..अवस्था के साथ ऐसे परिवर्तन होते ही रहेंगे ..।"

मासी माँ को इस तरह से विचलित होते देख रजनीश ने बात बीच में ही काट, उन्हें तनिक तसल्ली दी थी..यह मासी माँ ही हैं ,जो उसपर अब भी अपनी ममता लुटाया करती हैं..उन्हें पता है कि रजनीश को कितने नाजो नेमत से पाला गया है..जब सबने उसे दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फेंका हो, तो अपना कहने को इस संसार में उसका वही (मासी माँ) तो एक हैं..तभी तो इतनी दूर से उसे देखने चली आयी हैं।

इतने में माँ की पुकार सुन सुकन्या भी आ गयी .. भाई के हाथों के पंजों और चेहर पर दृष्टि पड़ते ही वह चौंक उठती है .. सच में ऐसा सांवला त्वचा भैया का बचपन में कभी नहीं रहा..।

माँ तो कहती थी कि सिलीगुड़ी के नर्सिंगहोम में जब उसका जन्म हुआ , तब इतना स्वस्थ्य और सुंदर था कि उस बालक को गोद में खिलाने के लिये सभी लालायित रहते थें..।

फिर उसकी उजले त्वचा का रंग इस तरह श्यामवर्ण कैसे हो गया..!

खैर, वह ब्यूटीशियन तो थी नहीं..हाँ, अतिरिक्त आय के लिये किसी नामी कम्पनी की सौंदर्य प्रसाधन सामग्री के कारोबार से जुड़ गई है.. सो ,उसने एक बिल्कुल छोटी-सी डिबिया निकाल भाई को दिया और कहाँ कि इसे लगा लिया करें.. ।

साढ़े छः सौ रुपये की क्रीम की डिब्बी देख रजनीश के अधरों पर तनिक मुस्कान आ गयी..

उसे याद हो आया कि अतीत में चंद पैसों के लिये उसने कहाँ- कहाँ नहीं ठोकरें खायी थी ...यह पेट की आग ही थी कि जिसमें झुलस कर वह " कलुआ " हो गया है..।

अतः सस्नेह डिब्बी वापस कर उसने कहा -

" बहन पचास का हो रहा हूँ, यह मेरे किस काम की, अब तो तेरे भाई को ढलती उम्र से जंग लड़नी है ..। "

मरघट में रेशमी महल बनाने की अभिलाषा भला रजनीश में बची ही कहाँ है ..उसका पौरूख थकता जा रहा है.. अपनों के तिरस्कार का संताप उसे भीतर ही भीतर दीमक की तरह चाटते जा रहा है..।

कलुआ होने का भी कोई मलाल नहीं है..यह तो उसके श्रम की निशानी है..।

हाँ, उसके निश्छल हृदय को कोई काला-कलूटा न कहे..इंसानों की इस बस्ती में फिर कोई शुभचिंतक उसे न छले..और कोई कामना नहीं है उसकी..।

बीते तीन दशक से जीवन के तिक्त दिनों को सहते-सहते रजनीश यह भूल चुका है कि कभी उसमें मधुर क्षण भी आये थें..।

नानीमाँ की मृत्यु के बाद ननिहाल से जब वह वापस घर लौटा था ,तो उसके पुराने सहपाठी और मुहल्ले के लोग आँखें फाड़े उसके गोलमटोल मुखड़े को निहारा करते थें .. और धूप में जब वह निकलता , सिर पर छतरी हुआ करती थी..।

लेकिन, परिस्थितिजन्य कारणों से घर छोड़ते ही उसे कहीं ऐसा ठिकाना नहीं मिला, जहाँ राजाबाबू की तरह रहता ..।

वो कहते हैं न कि वक्त की मार सबसे भयानक होती है..अतः पेट की आग से विवश हो उसने कबाड़ के एक कारखाने में मैनेजरी कर ली थी।

दिनभर तेज धूप में खड़े हो कबाड़ तौलाता रहा रजनीश..। परिणाम सामने है उसके शरीर का जो हिस्सा धूप में झुलसता रहा, वह बदरंग हो गया है । परिस्थितियों ने उसके कोमल तन-मन पर कभी न छुटने वाला स्याह रंग चढ़ा दी है ।

फिर कैसे चढ़ता उसपर प्रीत का रंग .. ? किसी का साथ होगा, इसी आस में पैसा- पैसा जोड़ कर गृहस्थी खड़ी की थी..परंतु जीवन की शून्यता और दर्द को उजला रंग कहाँ से देता वह ..।

स्नेह की नगरी में रजनीश ने जब भी पांव बढ़ाया ,उसने महसूस किया कि स्वार्थ के तराजू पर वह स्वयं कबाड़ बना पड़ा है। किसी भी मित्र,संबंधी और शुभचिंतक को उसकी आवश्यकता नहीं है.. कलुआ जो ठहरा वो..उसे तो निष्ठुर नियति की धधकती भट्टी में तपना है..जिसमें एक दिन उसका अस्तित्व विलीन हो जाएगा.. तब वह जड़ पदार्थ बन कर पुनः बाहर आएगा..कोई उसका श्यामवर्ण हर कर श्वेत रंग दे..ऐसे ठठेरे की उसे फिर से प्रतीक्षा रहेगी .. यही तो है जीवन का रहस्य.. !

ऐसे ही चिंतन में खोया कलुआ स्वयं को एक दार्शनिक समझने लगा था.. तभी एक मधुर गीत ने उसे फिर से उसी भावनाओं के सागर में ला पटका ..।

और कलुआ उसमें डूबते चला गया..


मोरा गोरा अंग लइ ले

मोहे श्याम रंग दइ दे

छुप जाऊँगी रात ही में

मोहे पी का संग दइ दे..


काश ! कभी किसी ने उससे भी यह कह पुकारा होता .. !!

- व्याकुल पथिक


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