क्या सचमुच जो काम आप कर रहे है वो आपके स्वास्थ्य लिए सही है ?

26 नवम्बर 2019   |  शिल्पा रोंघे   (528 बार पढ़ा जा चुका है)

जब हमारा देश स्वतंत्र हुआ था, तब भारत एक कृषिप्रधान देश माना जाता था, साथ ही खेती किसानी को लोगों की आजीविका का साधान माना जाता था, दूसरा आजीविका का साधन था छोटा या बड़ा व्यवसाय, स्वतंत्रता के बाद औघोगिकरण की लहर चल पड़ी साथ ही प्राइवेट नौकरीयों का उदय भी हुआ, लेकिन ये प्राइवेटाईज़ेशन बड़े शहरों तक सीमित था, छोटे और बड़ें शहरों में प्राईवेट नौकरियों का दबदबा था, बढ़ती जनसंख्या के साथ सरकारी नौकरियों में अवसर कम हुए तब 90 के दशक में बड़ी संख्या में उच्च शिक्षित लोगों के सामने रोजगार के अवसर कम होने लगे और बेरोजगारी ने सुरसा की तरह मुंह फाड़ लिया।


ऐसे में ग्लोबलाईज़ेशन और उदारीकरण की नीति अपनाई गई और विदेशी निवेश को बढ़ावा दिया गया, मल्टीनेशनल कंपनियों के साथ उच्चशिक्षित युवाओं को नौकरी मिलने की दर बढ़ गई, लेकिन इन नौकरियों में भी अंग्रेजी माध्यम से पढ़े हुए या फिर किसी नामी संस्थान से पढ़े लिखे विद्यार्थियों को प्राथमिकता दी जाती थी, छोटे शहरों में रोजगार के लिए आज भी युवा पारंपरिक माध्यमों पर ही निर्भर है।

अब मंदी की मार जिसमे पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया है उससे भारत कैसे अछूता रह सकता था भला। अब तो बड़ी बड़ी कंपनियां भी धराशयी हो रही है जिसकी मार उच्चशिक्षित लोगों पर भी पड़ रही है, जाहिर है कि नौकरियों के मौके कम होगे तो काम का दबाव भी बढ़ेगा, इसका सीधा असर शारिरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है तनाव, ब्लप्रेशर, सिरदर्द, थकान जैसी समस्याओं को न्यौता भी मिलता है। कहीं कहीं लंबी नाईट शिफ्ट के कारण भी शरीर पर बुरा असर होता है।

कहीं आप भी अपने स्वास्थ्य को दरकिनार कर ऐसी जॉब कर रहे है जो कहने को तो 9 से 5 है लेकिन अपना काम करते करते आप को रात के 12 या दो भी बज जाते है तो आप को एक बार ये सोचने की ज़रुरत ज़रुर है कि वो आपके लिए सही है या लंबे वक्त तक इस तरह किया जाने वाला काम आपको बीमार ना बना दे।

बात तब और बिगड़ जाती है जब अपने ऑफिस में ओवर टाईम भी कर रहे हो साथ साथ ऑफिस पॉलिटिक्स को भी झेलना पड़ रहा हो, आपके काम का प्रोत्साहन होना तो दूर हतोत्साहन ज्यादा हो रहा हो तो शारिरिक के साथ मानसिक तनाव भी बढ़ जाता है।

अब ऐसे में सवाल ये उठ खड़ा होता है कि आखिर किया क्या जाए अगर हम अपनी जॉब नहीं करेंगे तो आजीविका कैसे चलाई जाए, कुछ लोग ये तर्क देते है कि वो बहुत ज्यादा पढ़े लिखे है या अनुभवी है तो जॉब उनके रुतबे के अनुसार होनी चाहिए, लेकिन ये तर्क देते वक्त वो ये भूल जाते है कि शारिरिक रुप से स्वस्थ होना कितना ज़रूरी है।

हम ये नहीं कह रहे है कि किसी को एकदम से अपना जॉब छोड़ देना चाहिए, लेकिन अन्य विकल्पों जैसे सेल्फ एम्पालाईड होने, या फिर अपने कार्यक्षेत्र में परिवर्तन करने के बारे में पूरी योजना बनाकर सोचना चाहिए कि उन्हें आर्थिक दिक्कतों का सामना भी ना करना पड़े और वो अपनी रुचि का काम कर सके।

इसके लिए मौजूदा बाजार और उपभोक्ताओं की ज़रूरत और मानसिकता का अध्यन करना बेहद ज़रुरी होता है।

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