धार्मिक विश्वास और त्याग भावना

26 नवम्बर 2019   |  डॉ पूर्णिमा शर्मा   (466 बार पढ़ा जा चुका है)

धार्मिक विश्वास और त्याग भावना

धार्मिक विश्वास और त्याग भावना

हम प्रायः दो शब्द साथ साथ सुनते हैं – संस्कृति और धर्म | संस्कृति अपने सामान्य अर्थ में एक व्यवस्था का मार्ग है, और धर्म इस मार्ग का पथ प्रदर्शक, प्रकाश नियामक एवं समन्वयकारी सिद्धान्त है | अतः धर्म वह प्रयोग है जिसके द्वारा संस्कृति को जाना जा सकता है | भारत में आदिकाल से ही आदर्श व्यक्ति और आदर्श समाज के विकास के लिये धर्म का आश्रय लिया गया है | धर्म की प्रधानता, धार्मिक प्रेरणा एवं धार्मिक भावनाओं का अन्य सब प्रेरणाओं पर प्रभुत्व केवल भारतीय संस्कृति की ही विशेषता नहीं है, अपितु यह सदा से ही समस्त संसार में मानव मन तथा मानव समाज की सर्वमान्य अवस्था रही है | भारत ने सम्पूर्ण धर्म का मूल वेद को स्वीकार किया है, अतः भारतीय दृष्टि के अनुसार जो वेदानुकूल है, वेद सम्मत है, वही धर्म है | वेदज्ञों की स्मृति तथा शील ही धर्म है, और यह शील तेरह प्रकार का है – ब्रह्मण्यता, देव-पितृ भक्ति, सौम्यता, अनसूयता, मृदुता, मित्रता, प्रियवादिता, सत्यता, कृतज्ञता, शरण्यता, कारुण्य, प्रशान्ति और वेदों के आचार तथा वेदों के वैकल्पिक विषयों में आत्मतुष्टि |

भारत एक धर्मप्राण देश है और यहाँ का जनमानस धर्म पर अवलम्बित है | जीवन के सभी छोटे बड़े कार्य यहाँ धर्म के आधार पर व्यवस्थित होते हैं | धर्म की परिभाषा करते हुए कहा गया है “धारयतीति धर्मः” अर्थात् समाज या व्यक्ति को धारण करने वाले तत्व को धर्म कहा जाता है | इसके अतिरिक्त यह भी कहा गया है कि “धर्म एव हतो हन्ति, धर्मो रक्षति रक्षितः” अर्थात् जो धर्म की रक्षा करता है धर्म उसकी रक्षा करता है | वास्तव में विश्व में विनाश की ओर जाने की प्रवृत्ति धर्मत्याग से ही आई है | प्राचीन समाज ने कहा “धर्मं चर” अर्थात् धर्म का आचरण करो, उसी से कल्याण होगा | आधुनिक समाज का नारा है “धर्म और ईश्वर की दासता से मुक्ति पाओ | यह दुर्बलता है | नियम बन्धन व्यर्थ हैं | मन स्वतन्त्र रहना चाहिये | मन की आज्ञा मानो |”

धर्म सदा एक ही है, अनेक नहीं हो सकता | अग्नि का धर्म उष्णता है, वह एक ही है, उसका अन्य कोई धर्म नहीं है | आज जो राष्ट्र धर्म, विश्व धर्म, समाज धर्म, मानव धर्म आदि के नारे हैं वे सभी भ्रामक हैं | धर्म सौ दो सौ नहीं हो सकते | धर्म का वास्तविक स्वरूप क्या है ? दुःखहीन शाश्वत सुख पाने का भ्रान्तिहीन प्रयत्न ही धर्म है | धर्म का यही स्वरूप भारतीय जनमानस में प्रतिष्ठित है | यही प्रयत्न मानव को अन्तर्मुखी बनाता है | जो प्रयत्न बहिर्मुख करता है वही अधर्म है | अन्तर्मुखी प्रेरणा भारत के जन जन में सर्वत्र देखने को मिल सकती है | धनी-निर्धन, पढ़ा लिखा-अनपढ़, हर व्यक्ति यही वाक्य कहता मिलेगा “अरे यह धन और धरती यहीं रह जाएँगे, कोई छाती पर रखकर नहीं ले जाएगा |” इस प्रकार सिद्ध होता है कि भारत के जन मानस में धर्म त्याग भावना के रूप में प्रतिष्ठित है | यह बात दूसरी है कि उसके अनुसार आचरण मुखर नहीं है |

कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेSर्जुन |

सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्याग: सात्त्विको मत: || - गीता 18/9

जो कर्म फलेच्छा तथा आसक्ति को छोड़कर यह कर्तव्य है ऐसा जानकार किया जाता है वह त्याग सात्त्विक त्याग है और वही धर्म की भावना का मूलाधार है...

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/11/26/religious-believes-and-renunciation/

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