सिन्दूर का महत्त्व :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

01 दिसम्बर 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (2024 बार पढ़ा जा चुका है)

सिन्दूर का महत्त्व :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार मानव जीवन को चार भागों में विभक्त करके उन्हें आश्रमों का नाम दिया गया है | इन चारों आश्रमों में सबसे महत्त्वपूर्ण एवं मुख्य है गृहस्थाश्रम क्योंकि बिना गृहस्थ धर्म के पालन के सृष्टि की निरन्तरता बाधित हो जायेगी | परमात्मा द्वारा सृजित इस मैथुनी सृष्टि में गृहस्थाश्रम का बहुत महत्त्व है | गृहस्थाश्रम में रहते हुए मनुष्य के जीवन का महत्त्वपूर्ण संस्कार है विवाह संस्कार | विवाह संस्कार में सबसे महत्त्वपूर्ण है सिंदूर दान | महिलाओं के जीवन में सिन्दूर का बहुत महत्त्व है | विवाह में पति के द्वारा माँग में सिन्दूर भरने के बाद सनातन धर्म की महिलायें नित्य सिन्दूर से अपनी माँग सजाती है | यह सौभाग्य का प्रतीक होने के साथ ही पति की आयु एवं सौभाग्य में भी वृद्धि करता है | आदिकाल में माता पार्वती से प्रारम्भ हुआ यह प्रचलन आज भी महिलाओं के द्वारा पालन किया जा रहा है | ऐसी मान्यता है कि पत्नी की माँग में भरा हुआ सिन्दूर पति को संकटों से तो बचाता ही है साथ ही पति की अकाल मृत्यु भी नहीं होने देता | सुहागिन स्त्रियों के द्वारा सिन्दूर लगाना उनके सौन्दर्य में वृद्धि तो करता ही है साथ ही इससे पति - पत्नी के बीच आजीवन एक मजबूत सम्बन्ध भी बना रहता है | सनातन धर्म की प्पत्येक मान्यताओं में जिस प्रकार वैज्ञानिकता का समावेश होता ही है उसी प्रकार सिन्दूर लगाने को वैज्ञानिक भी उचित मानते हैं | वैज्ञानिकों के अनुसार पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं का ब्रह्मरन्ध्र अधिक संवेदनशील एवं कोमल होता है उस स्थान पर सिन्दूर लगाने से सिन्दूर में मिला हुआ पारा उनकी विद्युत ऊर्जा को नियन्त्रित नकारात्मकता को दूर करता है | इस प्रकार सिन्दूर के महत्त्व को पुराणों के अतिरिक्त विज्ञान में भी माना गया है | ग्रामीण मान्यताओं के अनुसार माँग में सिन्दूर की जितनी लम्बी रेखा होती है पति की उम्र भी उतनी ही लम्बी होती है | अत: सभी सुहागिन स्त्रियों को पूरी माँग में सिन्दूर नित्य ही भरना चाहिए |*


*आज हमारे देश भारत में जिस प्रकार जीवन के सभी क्षेत्रों में आधुनिकता ने अपना प्रभाव स्थापित कर लिया है उसके महिलाओं की मांग में भरा जाने वाला सिंदूर भी नहीं बच पाया है | पति को जीवन देने वाला माना गया सिंदूर आज दिखावा मात्र बनकर रह गया है | जहां पूर्व काल में महिलाएं लाल एवं मोटा सिंदूर अपनी मांग में पीछे तक भरकर पति की लंबी आयु की कामना करती थी वही आज उस मोटे सिंदूर का स्थान घुले हुए कुमकुम ने ले लिया है | जिस प्रकार आज घुला हुआ कुमकुम तिलक की भांति महिलाओं के द्वारा लगाया जा रहा है उसी प्रकार उनका जीवन भी घुलता चला जा रहा है | आज प्रायः युवतियां मांग न भर कर के हल्का सा लंबा टीका लगाकर सिंदूर लगाने की खानापूर्ति कर रही हैं , उनकी इस कृत्य से अनेक प्रकार की विसंगतियां भी पैदा हो रही है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" आज समाज में जिस प्रकार के क्रियाकलाप देख रहा हूं ! जैसे :- महिलाओं में विद्युतीय की अधिकता के कारण उनमें क्रोध एवं उत्तेजना तथा वैवाहिक जीवन कड़वाहट आदि चारों ओर दिखाई पड़ रही है | इसका कारण यदि सिंदूर का ना लगाना माना जाए तो अतिशयोक्ति न होगी | पति की लंबी आयु की कामना करने के उद्देश्य करवा चौथ का व्रत रखने वाली आज की आधुनिक महिलाएं मांग में सिंदूर भरने पिछड़े पन का एहसास करती दिख रही है | पौराणिक तथ्यों की बात तो छोड़ दीजिए आज महिलाओं ने वैज्ञानिकता को भी नकार दिया है | जिस प्रकार वैज्ञानिकों ने सिंदूर की उपयोगिता बताई थी वह भी वे मानने को तैयार नहीं हैं जिससे उनके ब्रह्म रंध्र में प्रवाहित होने वाली ऊर्जा उनसे संभल नहीं रही है और यह भी कहा जा सकता है कि सिंदूर ना लगाने के कारण पति की अकाल मृत्यु भी हो रही है | सनातन धर्म में जो भी मान्यताएं परंपराएं विकसित की गई है उसके पीछे लोक कल्याण की भावना तो निहित थी ही साथ ही सनातन धर्म के प्रत्येक विधान में वैज्ञानिकता की स्पष्ट झलक भी मिलती है परंतु आज आधुनिकता ने पूरे समाज को अंधा कर रखा है | आज पारा सहित मोटा सिंदूर या तो बुजुर्ग महिलाओं के सर पर देखा जा सकता है या फिर विवाह में उसका प्रयोग हो रहा है शेष महिलाओं ने उसे सिंदूर की उपेक्षा कर रखी है | विचार कीजिए कि जिस सिंदूर के माध्यम से वह किसी की पत्नी बन रही है उसी सिंदूर को उपेक्षित कर रही हैं तो पति-पत्नी के जीवन में कितना सामंजस्य एवं मधुरता रहेगी इसको ईश्वर ही जाने |*


*वैवाहिक जीवन का मुख्य अंग सिंदूर है इसके महत्व को समझते हुए प्रत्येक सुहागिन स्त्री को स्वयं संयमित रहने एवं पारिवारिक जीवन को सुखमय बनाने के लिए सिंदूर से मांग भरने का उपक्रम नित्य करना चाहिए |*

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बहुत सुंदर लेख
जय श्री राधे
प्रणाम आचार्य श्री

जय जय श्री राधे व्यास जी

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