प्रकृति पूजा का रहस्य :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

01 दिसम्बर 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (398 बार पढ़ा जा चुका है)

प्रकृति पूजा का रहस्य :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*आदिकाल से इस धरा धाम पर सनातन धर्म की स्थापना मानी जाती है | सनातन धर्म ने सदैव देव पूजा के साथ-साथ प्रकृति पूजा को भी महत्व दिया है | पृथ्वी पर जन्म लेकर के मनुष्य बड़ा होता है , इसीलिए पृथ्वी को माता की संज्ञा दी गई है , उसी की गोद में मनुष्य का बचपन व्यतीत होता है | इसके अतिरिक्त पहाड़ों , नदियों एवं वृक्षों में अनेक देवी-देवताओं का वास बता करके उन को संरक्षित करने का कार्य सनातन धर्म ने किया है | जब जब प्रकृति का दोहन हुआ है तब तब इस धरती पर आंशिक प्रलय दिखाई पड़ी है | सतयुग में जब दानवराज ने पृथ्वी का हरण कर लिया तब भगवान को वाराह अवतार धारण करना पड़ा और हिरण्याक्ष का वध करके पुनः पृथ्वी की रक्षा की | वहीं त्रेतायुग में रावण ने सोने की लंका बनाई थी वह सोने की लंका इस बात का प्रमाण है कि रावण भूगर्भीय रत्नों तथा खनिजों का दोहन कर रहा था | इसके अतिरिक्त उसने प्रकृति के प्रमुख अंगों वरुण , अग्नि , सूर्य , चंद्रमा जैसे देवताओं को अपना दास बना रखा था | जब उसका अत्याचार प्रकृति के प्रति बढ़ गया तब मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को अवतार धारण करके रावण का वध करना पड़ा | प्रकृति अनादि तथा अनंत होने के साथ-साथ परिवर्तनशील भी है , प्रकृति के रूप समयानुसार बदलते रहते हैं | जब भी प्रकृति पर अनावश्यक दबाव बढ़ने लगता है तब प्रकृति उद्वेलित हो जाती है और इस पृथ्वी पर भूकंप , भूस्खलन , बाढ़ अधिक वर्षा या सुखा जैसी दैवीय आपदा के दर्शन होने लगते हैं | हमारे पूर्वजों ने प्राकृतिक पूजा करके मनुष्य को जीवन जीने लायक वातावरण बनाया था | वृक्षों में भिन्न-भिन्न देवी-देवताओं का निवास बतलाने का शायद यही कारण रहा होगा कि मनुष्य इन वृक्षों की पूजा करता रहे और वृक्षों का संरक्षण होता रहे जिससे कि समस्त मानव जाति को जीवनदायिनी स्वच्छ वायु प्राप्त होती रहे | सनातन के अनुयायियों ने प्रकृति के महत्व को समझा था और उसके संरक्षण के लिए अनेकानेक नियम भी बनाए थे परंतु समय के साथ साथ उन नियमों को मनुष्य अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए भूलने लगा | जिसके परिणाम स्वरूप विभिन्न विघटनकारी प्राकृतिक आपदाओं ने अनेक सभ्यताओं एवं संस्कृतियों को अपने उदर में समाहित कर लिया | यदि प्रकृति का संरक्षण नहीं होगा तो मनुष्य किस प्रकार जीवन जी पाएगा यह विचारणीय विषय है | अधिकाधिक पृथ्वी का दोहन एवं ऊंचे ऊंचे पहाड़ों का विघटन मनुष्य भले ही अपने विकास के लिए कर रहा है लेकिन यह अंततोगत्वा विनाशकारी ही सिद्ध होगा |*



*आज सबसे बड़ी समस्या जनसंख्या वृद्धि है | जनसंख्या बढ़ने से मनुष्यों की आवश्यकताएं भी बढ़ गई हैं और उसे पूरा करने के लिए मानवीय बुद्धि ने अधिक से अधिक प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया | वैसे तो भारत कृषि प्रधान देश रहा है परंतु आज भारत में भी कृषि योग्य भूमि कम हो रही है , हरे भरे जंगलों के स्थान पर कंकरीट के जंगल खड़े हो रहे हैं , पेड़ पौधों को काटकर के मनुष्य नई बस्तियां बना रहा है एवं मनुष्य के कुछ नकारात्मक क्रियाकलाप के कारण नदियों का जल भी दूषित हो रहा है , जिसके कारण वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड नामक गैस का उत्सर्जन बढ़ गया है और ग्लेशियर पिघल रहे हैं | प्रकृति का असंतुलन भूकंप , बाढ़ , आंधियों एवं खंड प्रलय के भीषण रूप में देखने को मिल रहा है | जो लोग यह कहते हैं कि प्रकृति की पूजा से ज्यादा आवश्यक है अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करना उन सभी को मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" दुर्गा सप्तशती के देवी कवच में वर्णित एक श्लोक की ओर ध्यानाकर्षण कराना चाहूंगा जहां लिखा है :-- यावत् भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम् ! तावत् तिष्ठति मेदिन्यां संतति: पुत्र पौत्रिकी !! अर्थात :- इस श्लोक में स्पष्ट कर दिया गया है कि जब तक पृथ्वी पर पहाड़ , जल , जंगल और नदियां हैं तभी तक हमारी संतानें अर्थात मनुष्य का अस्तित्व है , जिस दिन यह प्राकृतिक अंग उपांग नहीं रह जाएंगे उस दिन मनुष्य का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा | जब यह स्पष्ट है तो प्रत्येक मनुष्य को मानव जाति के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए प्रकृति का संरक्षण करते रहना चाहिए , अन्यथा वह दिन दूर नहीं है जब अनेकों विलुप्त प्राय प्राणियों की श्रेणी में मनुष्य भी आ जाएगा और इस धरती पर महाप्रलय का ही साम्राज्य होगा | महाप्रलय तो एक दिन आनी ही है परंतु अभी वह समय बहुत दूर है यदि उसके पहले ऐसा कोई रूप प्रकृति का देखने को मिलता है तो उसका जिम्मेदार स्वयं मनुष्य ही होगा | मानव जीवन का आधार प्रकृति ही है इसलिए अपने जीवन के आधार को / प्राणाधार को बचाना उसकी सुरक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य बनता है |*


*प्रकृति को देवता इसलिए कहा गया है क्योंकि प्रकृति मनुष्यों से कभी कुछ लेती नहीं है वरन् जीवन भर मनुष्य के लिए देने का ही कार्य करती है और जो देने वाला होता है उसी को देवता कहा जाता है | यह धारणा सनातन धर्म के अतिरिक्त और कहीं देखने को नहीं मिलती है | प्रकृति का संरक्षण करके मानव प्रजाति का संरक्षण करने के लिए का संकल्प लेना पड़ेगा |*

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