लुप्त होती परम्परायें :---आचार्य अर्जुन तिवारी

08 दिसम्बर 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (439 बार पढ़ा जा चुका है)

लुप्त होती परम्परायें :---आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म के अनुसार मनुष्य का जीवन संस्कारों से बना होता है इसी को ध्यान में रखते हुए हमारे पूर्वजों ने मनुष्य के लिए सोलह संस्कारों का विधान बताया है | गर्भकाल से लेकर मृत्यु तक इन संस्कारों को मनुष्य स्वयं में समाहित करते हुए दिव्य जीवन जीता है | इन्हीं संस्कारों में मनुष्य के लिए प्रमुख संस्कार है विवाह संस्कार | विवाह संस्कार संपन्न होने के बाद मनुष्य के जीवन की दिशा एवं दशा परिवर्तित होने लगती है | पूर्वकाल में विवाह का जो विधान बतलाया गया है उसके अनुसार बारातियों के स्वागत के लिए कन्या का पिता पूरे गांव से सहयोग लेकर के चारपाई एवं बिछौने की व्यवस्था करके बहुत ही प्रमुदित हृदय से पूरे गांव के साथ बारातियों के आने की प्रतीक्षा करता था | गांव में किसी के यहां बारात आनी होती थी तो पूरा गांव बिना बुलाए सहयोग करने के लिए उपस्थित रहता था | वह बारात किसी एक व्यक्ति के लिए नहीं बल्कि पूरे गांव के सम्मान का प्रश्न बन जाती थी , इसलिए गांव का प्रत्येक व्यक्ति समर्पित भाव से बारातियों की सेवा में लगा रहता था साथ ही यह भी ध्यान रखता था कि किसी भी सामग्री के अभाव में विवाह कार्य बाधित ना हो और ना ही हमारे गांव का असम्मान होने पाये | आपसी कटुता एवं मनमुटाव को भूलकर लोग एक दूसरे के प्रति ऐसे अवसरों पर समर्पित हो जाया करते थे परंतु अब शायद ऐसा कहीं देखने को नहीं मिलता है |*


*आज आधुनिकता का रंग शहरों के साथ-साथ गांवों पर भी चढ़ने लगा है | जहां पूर्वकाल में बारातियों की स्वागत की भव्य तैयारी करके आगमन की प्रतीक्षा होती थी वही आज सब कुछ विपरीत हो गया है | आज न तो चारपाई की आवश्यकता होती है ना ही बिछौ़ने की | सारे बाराती खड़े-खड़े आते हैं , खड़े-खड़े खाते हैं और खड़े-खड़े चले जाते हैं | आज गांव की तो बात छोड़ो परिवार के भी लोग ना तो कोई सहयोग करना चाहते हैं और ना ही कोई कार्य करना चाहते हैं | इसका कारण मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" जहां तक समझ पा रहा हूं उसके अनुसार मात्र आधुनिकता के अतिरिक्त और कुछ नहीं है | आज चकाचौंध कर देने वाली भव्यता में तो हजार गुना वृद्धि हो गई है परंतु पहले का वह विधान कहीं भी देखने को नहीं मिलता है , यही कारण है कि आपसी प्रेम नहीं प्रकट हो पाता और बाराती एवं घराती एक दूसरे को ढंग से पहचान भी नहीं पाते हैं | हमने आज विकास तो बहुत कर लिया है , बहुत से नए ज्ञान विज्ञान प्राप्त कर लिए हैं परंतु इसके विपरीत हमने अपनी सनातन परंपराओं को खोया भी है | कहना गलत ना होगा कि आज हम अपने मूल परंपराओं से बिल्कुल पृथक होते चले जा रहे हैं | अनेक विधान ऐसे हैं जिसे आने वाली पीढ़ी जान ही नहीं पाएगी और इसके दोषी हम स्वयं होंगे | बीता हुआ समय वापस नहीं लौटता है परंतु उसे संजोए रखने का कार्य भी करने की आवश्यकता है |*


*आज की भव्यता एवं दिव्यता के आगे अनेकों परंपरायें लुप्त होती जा रही हैं इनके संरक्षण की जिम्मेदारी युवा पीढ़ी के साथ साथ बुजुर्गों की भी है जो कि हमारे मार्गदर्शक के रूप में हमारे समक्ष उपस्थित रहते हैं | इन परंपराओं को बचाए रखना हम सब की नैतिक जिम्मेदारी है |*

अगला लेख: ईश्वर को समर्पित कर्म ही पूजा है :--- आचार्य अर्जुन तिवारी



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
18 दिसम्बर 2019
*किसी भी राष्ट्र के निर्माण में वहां के समाज का बहुत बड़ा योगदान होता है | आदिकाल से हमारे देश भारत की सांस्कृतिक और सामाजिक इकाई का एक वृहद ढांचा राष्ट्र के संस्कार और सचेतक समाज की है | अन्य देशों की अपेक्षा हमारे देश के धर्मग्रंथ और उपनिषद मनुष्य को जीवन जीने की कल
18 दिसम्बर 2019
28 नवम्बर 2019
*इस समस्त सृष्टि में हमारा देश भारत अपने गौरवशाली संस्कृति एवं सभ्यता के लिए संपूर्ण विश्व में जाना जाता था | अनेक ऋषि - महर्षियों ने इसी पुण्य भूमि भारत में जन्म लेकर के मानव मात्र के कल्याण के लिए अनेकों प्रकार की मान्यताओं एवं परंपराओं का सृजन किया | संस्कृति एवं सभ्यता का प्रसार हमारे देश भारत स
28 नवम्बर 2019
01 दिसम्बर 2019
*आदिकाल से इस धरा धाम पर सनातन धर्म की स्थापना मानी जाती है | सनातन धर्म ने सदैव देव पूजा के साथ-साथ प्रकृति पूजा को भी महत्व दिया है | पृथ्वी पर जन्म लेकर के मनुष्य बड़ा होता है , इसीलिए पृथ्वी को माता की संज्ञा दी गई है , उसी की गोद में मनुष्य का बचपन व्यतीत होता है | इसके अतिरिक्त पहाड़ों , नदिय
01 दिसम्बर 2019
27 नवम्बर 2019
*ईश्वर की बनायी यह सृष्टि बहुत ही विचित्र है , यहां एक ही भाँति दिखने वाले मनुष्यों के क्रियाकलाप भिन्न - भिन्न होते हैं | मनुष्य के आचरण एवं उसके क्रियाकलापों के द्वारा ही उनकी श्रेणियां निर्धारित हो जाती है | वैसे तो मनुष्य की अनेक श्रेणियां हैं परंतु मुख्यतः दो श्रेणियों में मनुष्य बंटा हुआ है |
27 नवम्बर 2019
25 नवम्बर 2019
*ईश्वर ने सृष्टि में सबके लिए समान अवसर प्रदान किये हैं , एक समान वायु , अन्न , जल का सेवन करने वाला मनुष्य भिन्न - भिन्न मानसिकता एवं भिन्न विचारों वाला हो जाता है | किसी विद्यालय की कक्षा में अनेक विद्यार्थी होते हैं परन्तु उन्हीं में से कोई सफलता के उच्चशिखर को छू लेता है तो कोई पतित हो जाता है |
25 नवम्बर 2019
19 दिसम्बर 2019
*किसी भी देश का भविष्य युवाओं को कहा जाता है | युवा शक्ति राष्ट्र शक्ति के रूप में जानी जाती है | भारत के संपूर्ण जनसंख्या का एक चौथाई हिस्सा आज युवा वर्ग है | छात्रों को राष्ट्र का भविष्य एवं भाग्यविधाता कहा जाता है छात्र समाज में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं | विद्यालय में रहकर सामाजिकता , नैति
19 दिसम्बर 2019
25 नवम्बर 2019
*इस धराधाम पर परमपिता परमात्मा ने जलचर , थलचर नभचर आदि योनियों की उत्पत्ति की | कुल मिलाकर चौरासी लाख योनियाँ इस पृथ्वी पर विचरण करती हैं , इन सब में सर्वश्रेष्ठ योनि मनुष्य को कहा गया है क्योंकि जहां अन्य जीव एक निश्चित कर्म करते रहते हैं वही मनुष्य को ईश्वर ने विवेक दिया है , कोई भी कार्य करने के
25 नवम्बर 2019
25 नवम्बर 2019
*इस धराधाम पर परमपिता परमात्मा ने जलचर , थलचर नभचर आदि योनियों की उत्पत्ति की | कुल मिलाकर चौरासी लाख योनियाँ इस पृथ्वी पर विचरण करती हैं , इन सब में सर्वश्रेष्ठ योनि मनुष्य को कहा गया है क्योंकि जहां अन्य जीव एक निश्चित कर्म करते रहते हैं वही मनुष्य को ईश्वर ने विवेक दिया है , कोई भी कार्य करने के
25 नवम्बर 2019
26 नवम्बर 2019
❌ *इस संसार परमात्मा ने अनेकानेक जीवो का सृजन किया | पशु - पक्षी ,कीड़े - मकोड़े और जलीय जंतुओं का सृजन करने के साथ ही मनुष्य का भी सृजन परमात्मा ने किया | सभी जीवो में समान रूप से आंख , मुख , नाक , कान एवं हाथ - पैर दिखाई देते हैं परंतु इन सब में मनुष्य को उस परमात्मा ने एक अमोघ शक्ति के रूप में बु
26 नवम्बर 2019
20 दिसम्बर 2019
*प्राचीनकाल से ही भारत देश आपसी सौहार्द्र , प्रेम एवं भाईचारे का उदाहरण समस्त विश्व के समक्ष प्रस्तुत करता रहा है | वैदिककाल में मनुष्य आपस में तो सौहार्द्र पूर्वक रहता ही था अपितु इससे भी आगे बढ़कर वैदिककाल के महामानवों ने पशु - पक्षियों के प्रति भी अपना प्रेम प्रकट करके उनसे भी सम्बन्ध स्थापित करन
20 दिसम्बर 2019
09 दिसम्बर 2019
*सनातन धर्म की मान्यता है कि महाराज मनु से मनुष्य की उत्पत्ति इस धराधाम पर हुई है इसीलिए उसे मानव या मनुष्य कहा जाता है | मनुष्यों के लिए अनेकों प्रकार के धर्मों का पालन करने का निर्देश भी प्राप्त होता है | प्रत्येक मनुष्य में दया , दान , शील , सौजन्य , धृति , क्षमा आदि गुणों का होना परमावश्यक है इन
09 दिसम्बर 2019
01 दिसम्बर 2019
*सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार मानव जीवन को चार भागों में विभक्त करके उन्हें आश्रमों का नाम दिया गया है | इन चारों आश्रमों में सबसे महत्त्वपूर्ण एवं मुख्य है गृहस्थाश्रम क्योंकि बिना गृहस्थ धर्म के पालन के सृष्टि की निरन्तरता बाधित हो जायेगी | परमात्मा द्वारा सृजित इस मैथुनी सृष्टि में गृहस्थाश्
01 दिसम्बर 2019
26 नवम्बर 2019
*इस संसार परमात्मा ने अनेकानेक जीवो का सृजन किया | पशु - पक्षी ,कीड़े - मकोड़े और जलीय जंतुओं का सृजन करने के साथ ही मनुष्य का भी सृजन परमात्मा ने किया | सभी जीवो में समान रूप से आंख , मुख , नाक , कान एवं हाथ - पैर दिखाई देते हैं परंतु इन सब में मनुष्य को उस परमात्मा
26 नवम्बर 2019
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x