नारी-सम्मान पर डाका ?

08 दिसम्बर 2019   |  Shashi Gupta   (469 बार पढ़ा जा चुका है)

  नारी-सम्मान पर डाका ?

नारी-सम्मान पर डाका ?

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पुत्र के मामले में माता-पिता और पति के मामले में पत्नी की दृष्टि जबतक सजग नहीं होगी , पुरुषों के ऐसे पाशविक वृत्ति एवं कृत्य पर अंकुश नहीं लग सकेगा

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" तुम्हारी दोनों मौसी नहीं दिख रही हैं.. क्या वे दार्जिलिंग वापस चली गयी हैं..अच्छा,अब फिर कब आएँगीं..। "

वह दुग्ध सामग्री विक्रेता जब भी यह प्रश्न करता था , मैं कुछ भी नहीं समझ पाता था और समझता भी कैसे, मात्र दस वर्ष का ही तो था। छं

बनारस में मेरे मोहल्ले में ही उसकी बड़ी- सी दुकान थी और ठंड के मौसम में जब भी दार्जिलिंग वाले नानाजी का परिवार पूरे माहभर के लिये यहाँ नटराज होटल आता था , तो ये मौसियाँ मेरी मम्मी से मुलाकात करने घर पर आया करती थीं। रास्ते में लस्सी पीने अथवा रबड़ी- मलाई खाने के लिये वे मुहल्ले के उसी दूध की दुकान पर जाती थीं, जहाँ उनकी अनुपस्थिति में मुझसे ये सवाल पूछे जाते थें। मेरा बालमन उनकी मंशा को भला क्या समझ पाता, फिर भी मौसियों को लेकर उनकी हँसी- ठिठोली मुझे बिल्कुल नहीं भाती थी।

दरअसल , मेरी ये मौसियाँ न सिर्फ काफी खूबसूरत थीं, बल्कि जींस-शर्ट पहना करती थीं, बिल्कुल, सिने जगत की हीरोइन वे लगती थीं।

चार दशक पूर्व काशी जैसी सांस्कृतिक नगर में इस तरह के परिधान में युवतियों का दर्शन दुर्लभ था, इसीलिए जब भी वे आती थीं, मेरे मोहल्ले में वे आकर्षक का केंद्र बन जाती थीं। हाँ, तब काशी की संस्कृति का यह प्रभाव था कि महिलाओं को देख छींटाकशी कोई नहीं करता था।

अब मैं समझ सकता हूँ कि उनके ऐसे परिधान , हमारे गली, मोहल्ले शहर के वातावरण के अनुरूप नहीं थें। जिस कारण ही ये युवक चाहकर भी अपने मनोभाव को नहीं दबा पाते थें। संभव है कि प्रबुद्ध वर्ग का एक तबका इसे सांस्कृतिक राजधानी काशी के वासियों का तब आधुनिक परिधान के मामले में पिछड़ापन कह सकता है और ऐसे लोगों ( दुग्ध विक्रेता) को मानसिक रूप से बीमार भी बता सकता है।

अतः मैं इससे आगे कुछ नहीं कहना चाहूँगा , क्यों कि स्त्री के परिधान पर चर्चा करूँगा ,तो तथाकथित आधुनिक सभ्य समाज के रखवाले ठंडा लिये बैठें हैं। वे मुझे दकियानूसी प्रवृत्ति का बता न सिर्फ उपहास करेंगे , वरन् नारी संगठनों के झंडाबरदार मुझे आधी आबादी का विरोधी बताकर सामाजिक बहिष्कार तक का फतवा जारी करा सकते हैं।

सत्य तो यह भी है कि यदि हम पुरुषों ने अपने पारम्परिक परिधानों का त्याग कर दिया है,तो फिर स्त्रियों को हमें यह कहने बिल्कुल अधिकार नहीं है कि वे क्या पहने अथवा नहीं पहने। बस मैं इतना कहना चाहता हूँ कि यदि कोई युवती साड़ी अथवा सलवार सूट में है , तो उसे " बूढ़ी अम्मा " इस आधुनिक समाज के नुमाइंदे न कहें।

हाँ, जो हालात है उस पर एक शे'र आपसभी के लिए यहाँ पेश है-


रखो जिस्मों को ढक के एहतिआतन,

सड़क पर भूखे कुत्ते घूमते हैं !

संभल के घर से तुम बाहर निकलना

यहाँ हर तरफ दरिन्दे घूमते हैँ !


हमारे मीरजापुर नगर के युवा शायर खुर्शीद भारती का यह शे'र समसामयिक है, नारी-सम्मान में 'यंत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमन्ते तत्र देवता' के निरन्तर उद्घोष वाले देश में उन सभी महिलाओं के लिए , ताकि वे पशुवत आचरण की ना शिकार हो। पता नहीं क्यों अपने देश में जहाँ पुरुषों का परिधान बड़ा होता जा रहा है, वहीं स्त्रियों के वस्त्रों में निरंतर कटौती होती जा रही है, मानों देश की सारी गरीबी की मार इनके कपड़ों पर ही पड़ी हो।


दूषित वातावरण सृजन में मीडिया भी पीछे नहीं

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अध्यात्म, साहित्यिक एवं सामाजिक सरोकार पर स्पष्ट विचार रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार सलिल पांडेय जी का इस संदर्भ में कहना है कि ऐसे दूषित वातावरण के सृजन में मीडिया भी कम जिम्मेदार नहीं है। इस मामले में खासकर दृश्य मीडिया की जिम्मेदारी है कि वह सिर्फ न्यूज ही नहीं ऐसे विज्ञापनों के प्रसारण से बचें जो भारतीय संस्कारों का चीरहरण कर रहा हो । कुछेक चैनलों की एंकर तक एडल्ट फ़िल्म के ड्रेस में दिखती है । न्यूज पढ़ते समय फिल्मी अंदाज कहाँ तक उचित है? इस पर चिंतन की जरूरत है । महिला पुलिस अधिकारी, जज तो ड्रेस कोड में ही ड्यूटी करती हैं ! न्यूज को प्रोडक्ट बनाने से बचें या नैतिकता की दुहाई न दें । अन्यथा यह तीरघाट और मीरघाट एक करने की असफल कोशिश कहीं जाएँगी ।

उनका यह भी कहना रहा कि बड़ा नारा लगता है -"भारत में रहना है तो हर काम भारतीय रिवाज और परंपराओं से किए जाएँ ।" तो पहनावे के मामले में भी महिलाएँ समझें कि वे भारत में रहती हैं न कि योरप में ।

जरा विचार करें आप भी कि पाशविकता की शिकार तेलंगाना की महिला चिकित्सक के साथ हुये इस जघन्य अपराध से पहले दिसम्बर 2012 में निर्भया के साथ क्या हुआ था । अकेले नई दिल्ली में ही नहीं, बल्कि पूरे देश में निर्भया की मौत की सहानुभूति में बहुत सारी मोमबत्तियाँ जली थीं । जिसके पश्चात ऐसी जघन्य घटनाओं को रोकने के लिए शासन स्तर पर अनेक होमवर्क किये गये थें। परंतु कठोर सत्य तो यही है कि निर्भया कांड के बाद ऐसी घटनाओं की बाढ़-सी आ गई है । इलेक्ट्रॉनिक/प्रिंट मीडिया में इस तरह की खबरें निरन्तर चल/छप भी रही हैं । सच तो यह है कि किसी भी अमानवीय घटना में दिखावा ज्यादा होता है । सामान्य और कम पढ़े लिखे से ज्यादा तथाकथित बुद्धिमान लोग ऐसे कामों में लिप्त पाए गए । इसमें बहुत से ऐसे लोग चाहे शासन-सत्ता में बैठे हों, आश्रम चलाने वाले संत-महंत हों, मंचों पर नैतिकता पर भाषण देने वाले हों या न्यूज चैनल चलाने और उसमें बहस करने वाले ही क्यों न हों ?


पुरुष क्या विषय वासना का पुतला मात्र !

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मैं इसी चिंतन में डूबा हूँ कि विवाह- बारात के इस मौसम में जहाँ शहनाई की गूंज चहुँओर सुनाई पड़ रही है,वहीं ये कुछ अनसुनी भयावाह चीखें आधुनिक सभ्य समाज के पहरुओं तक क्यों नहीं पहुँच रही हैं,जिनसे मानवता शर्मसार हो गयी है।

महिला चिकित्सक की सामूहिक दुष्कर्म कर हत्या और शव को जला देने की घटना से नारी संगठन ही नहीं हर संवेदनशील व्यक्ति हतप्रभ है ।

इस आधुनिक (अर्थ) युग में मानवीय गुणों का पतन इसतरह से क्यों हो रहा है। इसे स्वछंदता कहें अथवा मनोविकार , मैं तो यह कहना चाहता हूँ कि आधुनिक सभ्य समाज ने हमें नैतिक मूल्यों से वंचित कर दिया है। ऐसी घटनाओं के संदर्भ में क्या कहा जाए..।

सिर्फ वासना की दृष्टि से औरतों को देखने की पुरुषों की यह कैसी प्रवृत्ति है .. ? इस व्यभिचार से क्या वह स्वयं को कभी भी ऊपर नहीं उठ सकता ? मानव को सभी प्राणियों में श्रेष्ठ कहा गया है , किन्तु सच तो यह है कि वह " विषय वासना" का एक पुतला मात्र है। जो अपनी ऐसी दुर्बलता पर कभी भी नियंत्रण नहीं पा सका है।

प्रश्न यह भी है कि वासना की वस्तु त्याग कर और वनवासी होकर भी क्या वासना से पिंड छूट जाता है ..? नासूर बना यह मर्ज क्या लाइलाज़ है.. ?


नारी संगठनों ने जो नहीं किया प्रतिकार

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ऐसी दिल को दहलाने वाली अनेक घटनाएँ विगत 26 वर्षों में जब से पत्रकारिता में हूँ, अपने जनपद में देखता आ रहा हूँ। इनमें से कुछ मामलों में दुष्कर्मी हत्यारे पकड़े जाते हैं , कुछ में नहीं और कई में तो पीड़िता के शव की पहचान तक नहीं हुई है ।

जब मैं मिर्ज़ापुर आया था ,तब पहली घटना शास्त्री सेतु के नीचे देखने को मिली थी। एक युवती के साथ ऐसा घृणित कार्य कर दुराचारियों ने बड़ी निर्ममता से उसकी हत्या की थी। उस अभागी युवती के शव की शिनाख्त अंततः नहीं हो सकी। दूसरी जघन्य घटना और भी भयानक रही, जिला मुख्यालय पर ही घर में सो रहे एक चिकित्सक के आँखों के समक्ष ही उसकी दोनों अविवाहित युवा पुत्रियों के साथ दुष्कर्म कर तीनों की ही निर्ममतापूर्वक हत्या कर दी गयी। इसके पश्चात अनेक घटनाएँ होती रहीं, यहाँ तक अबोध बालिका संग दुराचार कर उसकी हत्या की गयी।

एक बात मुझे समझ में नहीं आयी कि अपने ही जनपद में होने वाली ऐसी घटनाओं के पश्चात यहाँ की नारी संगठनों ने क्यों नहीं प्रतिकार किया ? वे कभी पुलिस अधीक्षक कार्यलय पर यह नहीं पूछने गयी कि ऐसी घटनाओं में पुलिस का होमवर्क कहाँ तक पहुँचा है। उन्होंने अपने जनपद में बच्चों को संस्कारी बनाने के लिये वृहद स्तर पर कोई कार्यक्रम किया हो , ऐसा कोई अभियान उनका जारी हो, ऐसा कोई मंच मुझे इन ढाई दशक में नहीं दिखा।

हाँ , समय- समय पर संस्कार भारती जैसी संस्थाएँ कुछ कार्यक्रम करवा दिया करती हैं, किंतु मार्डन सोसाइटी में उसके सांस्कृतिक कार्यक्रम आधुनिक विचारधारा वाले जेंटलमैनों के लिये उनके फेसबुक ( सोशल मीडिया) की शोभा बन कर रह गया है।


कैसे सुधरेंगे लोग और क्या होना चाहिए ?

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जब मैं समझदार हुआ और धार्मिक कथाओं के अध्ययन के क्रम में उससे यह वर्णन पढ़ने को मिला कि अमुक अत्याचारी दानव एवं राक्षस अपनी पतिव्रता स्त्री के सतित्व के कारण अजेय हैं और वे महिला सम्मान तक पर डाका डाला करते थें।

ऐसे में एक प्रश्न मैं सदैव ऐसी स्त्रियों से पूछना चाहता था कि क्या उनका कोई कर्तव्य समाज के प्रति नहीं बनता था, क्यों जालंधर वध के लिए पतिव्रता वृंदा का सतीत्व उसके ही आराध्य देव विष्णु को भंग करना पड़ा, इसलिए न कि शिव पत्नी पार्वती पर भी उसकी कुदृष्टि पड़ गई थी और पतिव्रता पत्नी के कारण वह अजेय था।

मेरा प्रश्न वृंदा से यह है कि यदि स्वयं का सतीत्व भंग होने पर वह अपने शरीर का त्याग कर सकती है,तो उसने अन्य स्त्रियों के साथ ऐसा ही दुष्कृत्य कर रहे अपने पति जालंधर का परित्याग क्यों नहीं किया ? इंद्र ने जब अहिल्या के साथ छल किया ,तब इंद्राणी (शची) क्यों मौन रही ? राज्यसभा में द्रौपदी चीरहरण के समय गांधारी आदि सभी महिलाएँँ कहाँँ थींं, वे क्यों मौन थींं और उन्होंने दुर्योधन और दुशासन को दंडित क्यों नहीं किया और परिणाम क्या निकला महाविनाश?अपनों द्वारा किये जा रहे अन्याय के विरुद्ध नारी समाज का मौन कब मुखरित होगा,इस आधुनिक सभ्य समाज को इसकी प्रतीक्षा है।

ऐसे उदहारण प्रस्तुत कर मैं यह कहना चाहता हूँ कि नारी -सम्मान को आहत करने के मामले में पुरुष यदि अविवाहित हो तो उसके माता-पिता इसके लिए स्वयं को भी जिम्मेदार माने और

संस्कारहीन अपने दुष्कर्मी पुत्र का सार्वजनिक रूप से परित्याग करें। इसी प्रकार से पति की दुश्चरित्रता में पत्नी को भी अर्धांगिनी होने के कारण स्वयं को दोषी मानते हुये , उसका (पति) परित्याग करना ही चाहिए।

यह पारिवारिक एवं सामाजिक बहिष्कार ही ऐसे कुकर्मियों की सबसे बड़ी सजा होगी , साथ ही कानून और सख्त हो।

पुत्र के मामले में माता-पिता और पति के मामले में पत्नी की दृष्टि जबतक सजग नहीं होगी , पुरुषों के ऐसे पाशविक वृत्ति एवं कृत्य पर अंकुश नहीं लग सकेगा।

यदि नारी सचमुच सामर्थ्यवान बनना चाहती है,तो उसे वृंदा ,इंद्राणी और गांधारी की तरह जब स्त्रियों पर अत्याचार हो ,तो मौन नहीं रहना होगा और न ही मंदोदरी और सुलोचना की तरह अपने पतियों को उनके कुकृत्य के लिए स्वामी एवं नाथ कह कर समझाना होगा ,बल्कि सार्वजनिक रूप से उसकी भर्त्सना करनी होगी ।


एनकाउंटर विकल्प नहीं

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गत शुक्रवार की सुबह यह खबर आयी कि महिला चिकित्सक के साथ दुष्कर्म करने वाले चारों आरोपी पुलिस एनकाउंटर में मारे गये हैं। जिसे लेकर प्रबुद्धवर्ग का एक तबका सवाल उठा रहा है , लेकिन मातृ शक्तियों ने ही नहीं आम जनता ने भी पुष्प वर्षा कर पुलिस कार्रवाई का स्वागत किया है।

फिर भी बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब राष्ट्र के संविधान द्वारा तय न्याय व्यवस्था से इतर यदि " दरोगा ही न्यायाधीश " बन जाए और किसी के जीवन-मृत्यु का निर्णय लेने लगे , तो क्या यह व्यवस्था लोकतंत्र के लिए अत्यंत घातक साबित नहीं होगी ?

यह भीड़तंत्र आज भले ही ऐसे त्वरित न्याय पर "जय हो " का उद्घोष कर रहा है, लेकिन भविष्य में इसके गंभीर परिणाम सम्भव है।खाकी वाले फिर तो परम स्वतंत्र हो जाएँगे ?

एनकाउन्टर पर प्रबुद्धजनों ने तमाम सवाल किये हैं। पहला यह कि क्या जिन आरोपियों को पकड़ा गया वही बलात्कारी थे? दूसरा ,सैकड़ों पुलिसवालों के साथ मुंह ढांककर हथकड़ी लगाकर जिन आरोपियों को हिरासत के सात दिन बाद घटनास्थल पर ले जाया गया क्या उनके पास कोई हथियार थे? क्या उन्होंने बंद गाड़ी में पुलिस वालों पर हमला किया था? तीसरा आरोपियों को रात के तीन बजे पुलिस को घटना स्थल पर ले जाने की क्या जरूरत थी? चौथा क्या एनकाउन्टर सुनियोजित था तथा तेलंगाना पुलिस के मुखिया एवं मुख्यमंत्री के निर्देश पर प्रायोजित किया गया था? पांचवां महत्वपूर्ण सवाल यह है कि पीयूसीएल वेर्सेस स्टेट ऑफ़ महाराष्ट्र, सीडीजे 2014 एससी 831 प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पुलिस इनकाउन्टर को लेकर जो 16 गाइडलाइन दी गई थी, उनका पालन किया गया है या नहीं?

डाक्टर सुनीलम जो कि मध्यप्रदेश के पूर्व विधायक (दोबार)और समाजवादी पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय सचिव वर्तमान राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं , का कथन है कि एनकाउंटर के नाम पर सुनोयोजित हत्याएं महिलाओं के खिलाफ अपराध रोकने का कोई स्थायी हल नहीं है। उनका यह भी कहना है कि देश में औसतन हर वर्ष पचीस हजार से तीस हजार बलात्कार के प्रकरण दर्ज किये जाते हैं। 98 प्रतिशत बलात्कारी पीड़िता के पूर्व परिचित होते हैं,तो मुख्य सवाल यह है कि क्या जिस पर बलात्कार का आरोप लगे उसका एनकाउन्टर कर दिया जाना चाहिये?

वैसे, हाईकोर्ट ने इस मामले को संज्ञान में लिया है और पोस्टमार्टम का वीडियो मांगा है। 9दिसंबर तक चारों शव सुरक्षित रखने का आदेश भी दिया है। तेलंगाना मुठभेड़ की जाँच राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की विशेष टीम भी करेगी।

वहीं, चीफ जस्टिस बोबड़े का यह बयान - " बदला न्याय नहीं हो सकता, न्याय जल्दबाजी में नहीं होता, न्याय का चरित्र खराब ना करें । "

देश की जनता को इस पर गंभीरता से चिंतन करना चाहिए।


- व्याकुल पथिक

अगला लेख: BB13: Hindustani Bhau की भड़की पत्नी ने Police में दर्ज कराई FIR...जानिए मामला



हमने माना एनकाउंटर कोई स्थायी हल नहीं है ऐसे जघन्य अपराधों का । हम भी देश की क़ानून व्यवस्था का सम्मान करते हैं । लेकिन फीस लेने के चक्कर हमारे वक़ील वर्ग को क्या कहेंगे जो तारीख़ों पर तारीखें लगवाए जाते हैं ? निर्भया काण्ड में तो दोषियों को फाँसी सुना दी गई है पर अभी तक दी क्यों नहीं गई ? ऐसे ही न जाने कितने कैसेज़ अभी कोर्ट में चल रहे हैं बरसों से, बेचारी पीड़िता के परिवार वाले थक जाते हैं अदालतों के चक्कर लगाते । क्यों नहीं एक महीने के भीतर ऐसे दरिंदों को इस तरह की सज़ा दी जाती है कि दूसरे लोग दहशत के कारण ऐसा करने से पहले दस बार ? और फिर इस तेलंगाना के केस में तो इनके वक़ील बोल देते कि सबूत क्या है ? क्योंकि लड़की को जलाकर सुबूत तो सारे नष्ट कर दिए इन थे इन लोगों ने । निर्भया काण्ड में सुबूत होते हुए भी अभी तक कुछ नहीं हुआ, और एक तो किशोर वय के कारण कम सज़ा में ही छूट गया जबकि सुनने में आया कि उसने तो उसके साथ सबसे भयानक काम किया था । क्या इन तथ्यों की ओर उन लोगों का ध्यान नहीं जाता जो इन वहशी दरिंदों के लिए मानवाधिकारों की बात करते हैं ?

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