सिसकती मानवता :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

09 दिसम्बर 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (449 बार पढ़ा जा चुका है)

सिसकती मानवता :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म की मान्यता है कि महाराज मनु से मनुष्य की उत्पत्ति इस धराधाम पर हुई है इसीलिए उसे मानव या मनुष्य कहा जाता है | मनुष्यों के लिए अनेकों प्रकार के धर्मों का पालन करने का निर्देश भी प्राप्त होता है | प्रत्येक मनुष्य में दया , दान , शील , सौजन्य , धृति , क्षमा आदि गुणों का होना परमावश्यक है इन गुणों से ही मिलकर बना है मानव धर्म जिसे मानवता कहा गया है | जिस मनुष्य में मानवता नहीं है उसे पशु धर्म का अनुयायी या दानवी धर्म का पोषक कहा जा सकता है | प्रत्येक मनुष्य में रहने वाला असाधारण धर्म है मनुष्यत्व | हमारे शास्त्रों में स्पष्ट किया गया है कि अनंत उज्ज्वल , स्वच्छ गुण विशिष्ट मनुष्य ही मानवता का पोषक हो सकता है | मनुष्य में प्राकृतिक रूप से तीन प्रकार के गुण (सत्त्व , रज , तम) पाये जाते हैं सत्त्वगुण की प्रधानता जिनमें होती है उनमें त्याग , तपस्या , सत्य , सदाचार , परोपकार एवं अहिंसा एवं समता आदि गुण स्वाभावत: पाये जाते हैं और यही गुण मानवता के लिए आवश्यक भी है | मानव धर्म "आत्मवत् सर्वभूतेषु" की भावना से प्राणिमात्र से अपनत्व समझकर उन पर दया और प्रेमभाव का प्रसार करना ही बताया गया है | हमारे पूर्वजों ने परोपकार और सद्भावना मूलक समाज की स्थापना करके "सर्वे भवन्ति सुखिन:" की कामना की थी | यही कारण था कि पूर्वकाल में हमारा समाज उन्नतिशील एवं समतामूलक था | प्राचीनकाल के मनुष्य मानवता की सर्वात्मना रक्षा करते थे एक दूसरे के सुख एवं दु:ख में बराबर के सहयोगी की भूमिका एवं मानवता के बल पर ही अपना और समस्त विश्व का कल्याण करने में सक्षम व समर्थ हुआ करते थे | हमारे महान ऋषियों ने मानवता की रक्षा के लिए ही कठिन से कठिन से तपस्या करके मानवमात्र के लिए अनेक विधान बताये इसमें उन दिव्यात्माओं का कोई स्वार्थ नहीं होता था , परन्तु धीरे - धीरे समय परिवर्तित हो गया और हम एक तमोगुणी समाज का हिस्सा बन गये |*


*आज हम आधुनिक परिवेश में जीवन यापन कर रहे हैं जहां मनुष्य अपने मूल कर्तव्यों को भूल गया है | आज समस्त विश्व के साथ - साथ हमारे दिव्य देश भारत में जो अनर्थ - अन्याय अत्याचार व्यभिचार आदि कुकृत्य हो रहे हैं उसका मूल कारण यही है कि आज मनुष्य में मानवता नहीं रह गई है | मनुष्य होने का आधार मानवता ही है , मनुष्य आज अपने मूल धर्म मानवता एवं अपने आदर्शों को तिलांजलि दे चुका है | आज तमोगुण प्रधान समाज है पाप का स्रोत प्रबलता से प्रवाहित हो रहा है और इस पाप के प्रवाह में प्रवाहित मनुष्य अपने वास्तविक धर्म कर्म से विमुख होता जा रहा है | आज मनुष्य के कर्मों से मानवता सिसक रही है , मनुष्य के कर्म इतने विकृत हो गए हैं कि आज चारों तरफ मानवता लज्जित हो रही है | आज जो हो रहा है उसका वर्णन बहुत पहले गोस्वामी तुलसीदास जी ने कर दिया था बाबाजी मानस में लिखते हैं कि :- "कलिकाल बिहाल किए मनुजा ! नहीं मानत क्वौ अनुजा तनुजा !!" अर्थात कलयुग में वह समय आएगा जब मनुष्य को छोटे बड़े का भान होना बंद हो जाएगा और उसको कन्या या वृद्धा स्त्री में नारी का भोग्या शरीर दिखाई पड़ेगा | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" आज यह कह सकता हूँ कि जहां पूर्वकाल में हमारे पूर्वज मानव मात्र का कल्याण करने की कामना से कर्म किया करते थे वही मनुष्य आज स्वयं का कल्याण करने में भी असमर्थ लग रहा है उसका कारण एक ही है कि मनुष्य ने अपनी मानवता का त्याग कर दिया है और जब मानवता का ह्रास होता है तो देश एवं समाज दोनों की क्षति होती है | मानवता की रक्षा एवं उसका ज्ञान प्रत्येक मनुष्य को होना चाहिए क्योंकि मानवता ही मानव और अमानव में भेद करते हुए उनका परिचय कराती है | आज मनुष्य रूप में अनेक भेड़िए समाज में मानवता को कलंकित करने वाले कृत्य कर रहे हैं | आज मानवता एक दिवास्वप्न बनकर रह गई है इसके कारण मनुष्य समय-समय पर अनेकों प्रकार के आपत्ति विपत्ति , धोखा कष्ट का शिकार भी हो रहा है | यदि मनुष्य को इनसे बचना है तो पुनः मानव धर्म को स्थापित करते हुए मानवता के विषय में जानना होगा क्योंकि मानवता ही मानव को स्वाभिमान की प्रेरणा देती है | मानवता ही एक सभ्य समाज की नींव कही गई है परंतु आज मानवता बिलख रही है |*


*मानव जीवन में मानवता की विशेष आवश्यकता है और आज मानवता के रक्षण और पालन पर सब को विशेष ध्यान देकर उसको धारण करने की आवश्यकता है तभी मानव धर्म , मानव समाज तथा राष्ट्र की रक्षा हो सकती है | अतः मानवमात्र को मानवता गुण विशिष्ट धर्म को धारण करने की आवश्यकता है |*

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