भारत में “मी टू” आंदोलन की प्रासंगिकता

12 दिसम्बर 2019   |  शिल्पा रोंघे   (8716 बार पढ़ा जा चुका है)

मी टू मूवमेंट जिसकी शुरुआत दक्षिण अफ्रीका से शुरु हुई इसके बाद अमेरिका में इसने अपना प्रभाव दिखाया जिसका उद्देश्य यौन उत्पीड़न जैसे मामलों पर प्रकाश डालना था, ताकि महिलाएं खुलकर अपनी बात बिना डरे सबके सामने रखे। इसके बाद इस मूवमेंट ने भारत जैसे देश में असर दिखाना शुरु किया, पश्चिमी देशों की तुलना में भारत की संस्कृति काफी रुढ़ीवादी है इसके बावजूद कई महिलाओं ने उनके खिलाफ़ होने वाले अत्याचार के खिलाफ़ आवाज़ उठाई और आने वाली पीढ़ी के लिए मिसाल कायम की है। भारत में भी कई प्रसिद्ध हस्तियों पर आरोप लगाए गए और जिन महिलाओं ने आरोप लगाए वो भी प्रसिद्ध और प्रतिभाशाली थी ऐसे में लोगों ने उनकी बातों को गंभीरता से लिया।

कई महिलाओं ने ये स्वीकार किया कि उनसे काम के बदले ऐसी शर्तों को पूरा करने की पेशकश की गई जो उनके लिए संभव नहीं था या उनकी गरिमा को ठेस पहुंचता था।

तो वहीं कुछ लोगों ने इस मूवमेंट का यह कहकर समर्थन नहीं किया कि आरोप सिद्ध करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं थे। इन कठिनाईयों के बावजूद कई महिलाएं न्याय के लिए लंबी लड़ाई लड़ रही है।

अगर मी टू मूवमेंट को गहराई से समझने की कोशिश करे तो इसका यही अर्थ निकलता है कि किसी महिला को काम उसकी प्रतिभा के आधार पर दिया जाना चाहिए ना कि कोई गलत पेशकश की जानी चाहिए, साथ ही कार्यस्थल पर उनके लिए अभ्रद भाषा का प्रयोग नहीं होना चाहिए। उन्हें भी सम्मान और गरिमा के साथ काम करने और जीने का अधिकार है।

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