मन

13 दिसम्बर 2019   |  डॉ कवि कुमार निर्मल   (454 बार पढ़ा जा चुका है)

यादों का उँचा पहाड़
सिमट कर मन में छुप
कर रह जाता है।
मन अटके मगर मन
चुपके से बोझिल हो
लुप्त हो जाता है।।
डॉ. कवि कुमार निर्मल

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