पितृदोष :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

15 दिसम्बर 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (426 बार पढ़ा जा चुका है)

पितृदोष :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धराधाम पर सर्वश्रेष्ठ योनि मनुष्य की कही गई है , देवताओं की कृपा एवं पूर्वजन्म में किए गए सत्संग के फल स्वरुप जीव को माता-पिता के माध्यम से इस धरती पर मनुष्य योनि प्राप्त होती है | इस धरती पर जन्म लेने के बाद मनुष्य तीन प्रकार से ऋणी हो जाता है जिन्हें हमारे शास्त्रों में ऋषिऋण , देवऋण एवं पितृऋण कहा गया है | प्रत्येक मनुष्य को इन तीन प्रकार के ऋणों से उऋण होने का प्रयास करना चाहिए | जिस प्रकार मनुष्य किसी से उधार के रूप में धन ले लेता है तो उसे चुकाने की चिंता लगी रहती है उसी प्रकार इन तीन प्रकार के ऋणों को भी प्रत्येक मनुष्य को चुकाने की चिंता करनी चाहिए | जिन मनुष्यों के द्वारा इन ऋणों को नहीं चुकाया जाता है उनके जीवन में अनेकों प्रकार की व्याधियों असमय उत्पन्न हो जाती है | वैसे तो पितृऋण के विषय में लिखा है कि संतान उत्पन्न कर देने के बाद मनुष्य पितृऋण से उऋण हो जाता है परंतु इतना ही पर्याप्त नहीं है | जो मनुष्य पितृऋण नहीं उतारने का प्रयास करता वह जीवन भर पितृदोष से पीड़ित रहता है | पूर्वकाल में मनुष्यों का संस्कार इतना दिव्य था कि वे अपने माता-पिता एवं अपने सगे संबंधियों का आदर सम्मान एवं सेवा करके पितृदोष से बचे रहते थे , पूर्व काल में बहुत कम ही लोग ऐसे मिलते हैं जो पितृदोष से पीड़ित रहे हो | पितृऋण कई प्रकार का होता है जैसे हमारे कर्मों का , आत्मा का , पिता का , भाई का , बहन का , मां का , पत्नी का , बेटी और बेटे का | आत्मा के ऋण को स्वयं का ऋण भी कहते हैं यह सभी पितृदोष के रूप में मनुष्य को पीड़ित करते रहते हैं , इसलिए प्रत्येक मनुष्य को अपनी माता पिता के प्रति एवं परिवार के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन ईमानदारी से करते रहना चाहिए और यह तभी संभव है जब मनुष्य के भीतर ऐसा करने के संस्कार विद्यमान होंगे , अन्यथा मनुष्य अनेक प्रकार की आधि - व्याधियों से पीड़ित होकर कष्टमय जीवन व्यतीत करने पर विवश रहेगा |*


*आज के आधुनिक युग में जिस प्रकार संस्कारों का लोप हो रहा है उसी अनुपात में लोग पितृदोष से पीड़ित भी मिल रहे हैं , इसका मुख्य कारण यही है कि आज लोगों ने अपने सम्माननीयों एवं आदरणीयों का आदर करना लगभग बंद कर दिया है | जिस माता-पिता के माध्यम से इस संसार में मनुष्य का जन्म हुआ है उन्हीं को आज तिरस्कृत होकर जीवन जीने पर विवश होना पड़ रहा है | मेरा "आचार्य अर्जुन तिवारी" का स्पष्ट कथन है कि पितृदोष से यदि बचना है तो पितृऋण से उऋण होने का पूरा प्रयास करना चाहिए | आज का मनुष्य धन वैभव से परिपूर्ण तो दिखाई पड़ता है परंतु सुखी भी हो यह आवश्यक नहीं | आज यदि चारों ओर दुख ही दुख दिखाई पड़ रहा है तो उसका कारण यही है कि मनुष्य अपने संस्कारों से दूर हो रहा है | आज प्राय: कुंडलियों में देवदोष व पितृदोष देखने को मिलता है इसका कारण यही है कि मनुष्य सनातन से चले आ रहे अपनी तीनो ऋणों को चुकता करना भूलता चला जा रहा है | अपने माता - पिता , सगे - संबंधी , देवताओं एवं ऋषियों की अवहेलना करके सुख की कामना करना महज मूर्खता के अतिरिक्त और कुछ नहीं है | जीवित माता-पिता को असहनीय कष्ट देकर उनके मरने पर उनके नाम से विशाल भंडारा करवाकर कोई भी पितृदोष से बच नहीं सकता है | आज समाज में वृद्ध माता - पिताओं का जो हाल है वह प्रत्येक व्यक्ति की कुंडली में पितृदोष पैदा करने के लिए पर्याप्त हैं | यदि पितृदोष नामक घातक बीमारी से बचना है तो समय-समय पर पितृऋण को चुकता करने का प्रयास तो करना ही चाहिए साथ ही अपने माता-पिता के प्रति पूर्ण समर्पण भाव से उनकी सेवा करके भी इस दोष से बचा जा सकता है |*


*मनुष्य अनेकों प्रकार के कृत्य समाज को दिखाने के लिए तो करता रहता है परन्तु अपने परिवार एवं माता - पिता के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन नहीं कर पा रहा है , यही कारण है कि आज अधिकांश लोगों की कुण्डली में पितृदोष मिल रहा है |*

अगला लेख: लुप्त होती परम्परायें :---आचार्य अर्जुन तिवारी



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
27 दिसम्बर 2019
*इस संपूर्ण सृष्टि में जितने भी जड़ चेतन देखने को मिल रहे हैं सब उस परमपिता परमात्मा की सृष्टि कहीं जाती है | कण-कण में परमात्मा का निवास है | संपूर्ण सृष्टि को मार्गदर्शन प्रदान करने वाले हमारे वेदों ने उस परमपिता परमात्मा के लिए एकोहम् बहुस्याम लिखा है जिसका अर्थ यही होता है कि जब उस परमात्मा की इ
27 दिसम्बर 2019
09 दिसम्बर 2019
*इस संपूर्ण विश्व में प्रारंभ से ही भारत देश अपने क्रियाकलापों एवं दूरदर्शिता के लिए जाना जाता रहा है | विश्व के समस्त देशों की अपेक्षा भारत की सभ्यता , संस्कृति एवं आपसी सामंजस्य एक अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करता रहा है | यहां पूर्व काल में एक दूसरे के सहयोग से दुष्कर से दुष्कर कार्य मनुष्य करता रहा है
09 दिसम्बर 2019
09 दिसम्बर 2019
*सनातन धर्म की मान्यता है कि महाराज मनु से मनुष्य की उत्पत्ति इस धराधाम पर हुई है इसीलिए उसे मानव या मनुष्य कहा जाता है | मनुष्यों के लिए अनेकों प्रकार के धर्मों का पालन करने का निर्देश भी प्राप्त होता है | प्रत्येक मनुष्य में दया , दान , शील , सौजन्य , धृति , क्षमा आदि गुणों का होना परमावश्यक है इन
09 दिसम्बर 2019
23 दिसम्बर 2019
*आदिकाल से ही इस धरती पर अनेकों भक्त हुए हैं जिन्होंने भगवान की भक्ति करके उनको प्राप्त करने का अनुभव किया है | अनेकों भक्तों तो ऐसे भी हुए जिन्होंने साक्षात भगवान का दर्शन भी किया है | भक्ति की महत्ता का विस्तृत वर्णन हमारे शास्त्र एवं पुराणों में देखने को मिलता है | भक्ति क्या होती है ? इसको बता
23 दिसम्बर 2019
23 दिसम्बर 2019
*संपूर्ण विश्व में विविधता में एकता यदि कहीं देखने को मिलती है तो वह हमारा देश भारत है जहां विभिन्न धर्म जाति वर्ण के लोग एक साथ रहते हैं | हमारा देश एकमात्र ऐसा देश है जहां भिन्न-भिन्न जातियों के वंशज एक साथ रहते हैं और इन सब की मूल धरोहर है इनकी संस्कृति , सभ्
23 दिसम्बर 2019
18 दिसम्बर 2019
*किसी भी राष्ट्र के निर्माण में वहां के समाज का बहुत बड़ा योगदान होता है | आदिकाल से हमारे देश भारत की सांस्कृतिक और सामाजिक इकाई का एक वृहद ढांचा राष्ट्र के संस्कार और सचेतक समाज की है | अन्य देशों की अपेक्षा हमारे देश के धर्मग्रंथ और उपनिषद मनुष्य को जीवन जीने की कल
18 दिसम्बर 2019
19 दिसम्बर 2019
*मानव जीवन में अनेकों प्रकार के क्रियाकलाप मनुष्य द्वारा किए जाते हैं | संपूर्ण जीवन काल में मनुष्य भय एवं भ्रम से भी दो-चार होता रहता है | मानव जीवन की सार्थकता तभी है जब वह किसी भी भ्रम में पड़ने से बचा रहे | भ्रम मनुष्य को किंकर्तव्यविमूढ़ करके सोचने - समझने की शक्ति का हरण कर लेता है | भ्रम में
19 दिसम्बर 2019
21 दिसम्बर 2019
*इस धरती पर मानव समाज में वैसे तो अनेकों प्रकार के मनुष्य होते हैं परंतु इन सभी को यदि सूक्ष्मता से देखा जाय तो प्रमुखता दो प्रकार के व्यक्ति पाए जाते हैं | एक तो वह होते हैं जो समाज की चिंता करते हुए समाज को विकासशील बनाने के लिए निरंतर प्रगतिशील रहते हैं जिन्हें सभ्य समाज का प्राणी कहा जाता है ,
21 दिसम्बर 2019
10 दिसम्बर 2019
*इस संपूर्ण सृष्टि की रचना पारब्रह्म परमेश्वर ने अपनी इच्छा मात्र से कर दिया | इस सृष्टि का मूल वह परमात्मा ही है | प्रत्येक मनुष्य को मूल तत्व का सदैव ध्यान रखना चाहिए क्योंकि यदि मूल को अनदेखा कर दिया जाए तो जीवन सुचारू रूप से नहीं चल सकता | जिस प्रकार इस सृष्टि का मूल परमात्मा है उसी प्रकार मनुष्
10 दिसम्बर 2019
12 दिसम्बर 2019
*सृष्टि के आदिकाल से ही इस धरा धाम पर मनुष्य विचरण कर रहा है | मनुष्य ने अपने जीवन को सुचारू ढंग से चलाने के लिए जहां अनेकों प्रकार के संसाधन बनाएं वही समय-समय पर वह ईश्वर का भी आश्रय लेता रहा है इसके लिए मनुष्य ने वैदिक कर्मकांड एवम पूजा पाठ का सहारा लिया | सतयुग से लेकर के त्रेता , द्वापर तक ईश्वर
12 दिसम्बर 2019
11 दिसम्बर 2019
*आदिकाल में परमपिता परमात्मा ने इस धरती पर जीवन की सृष्टि करते हुए अनेकों प्राणियों का सृजन किया | पशु पक्षी जिन्हें हम जानवर कहते हैं इनके साथ ही मनुष्य का भी निर्माण हुआ | मनुष्य ने अपने बुद्धि कौशल से निरंतर विकास किया और समाज में स्थापित हुआ | यदि वैज्ञानिक तथ्यों को माना जाय तो मनुष्य भी पहले प
11 दिसम्बर 2019
20 दिसम्बर 2019
*प्राचीनकाल से ही भारत देश आपसी सौहार्द्र , प्रेम एवं भाईचारे का उदाहरण समस्त विश्व के समक्ष प्रस्तुत करता रहा है | वैदिककाल में मनुष्य आपस में तो सौहार्द्र पूर्वक रहता ही था अपितु इससे भी आगे बढ़कर वैदिककाल के महामानवों ने पशु - पक्षियों के प्रति भी अपना प्रेम प्रकट करके उनसे भी सम्बन्ध स्थापित करन
20 दिसम्बर 2019
02 दिसम्बर 2019
*हमारे देश की संस्कृति इतनी महान रही है कि समस्त विश्व ने हमारी संस्कृति को आत्मसात किया | सनातन ने सदैव नारी को शक्ति के रूप में प्रतिपादित / स्थापित करते हुए सम्माननीय एवं पूज्यनीय माना है | इस मान्यता के विपरीत जाकर जिसने भी नारियों के सम्मान के विपरीत जाकर उनसे व्यवहार करने का प्रयास किया है उसक
02 दिसम्बर 2019
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x