भय बिनु होइ न प्रीति :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

21 दिसम्बर 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (373 बार पढ़ा जा चुका है)

भय बिनु होइ न प्रीति :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धरती पर मानव समाज में वैसे तो अनेकों प्रकार के मनुष्य होते हैं परंतु इन सभी को यदि सूक्ष्मता से देखा जाय तो प्रमुखता दो प्रकार के व्यक्ति पाए जाते हैं | एक तो वह होते हैं जो समाज की चिंता करते हुए समाज को विकासशील बनाने के लिए निरंतर प्रगतिशील रहते हैं जिन्हें सभ्य समाज का प्राणी कहा जाता है , वहीं दूसरी ओर कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जिन्हें दुष्ट , शठ , कुटिल एवं कलह प्रिय कहा जा सकता है | इनका मुख्य काम होता है समाज का विघटन करना | किस प्रकार समाज में अराजकता फैलेगी ऐसे लोग इसी पर अपना ध्यान केंद्रित रखते हैं और उसी के अनुसार अपने क्रियाकलाप करते हैं | इस प्रकार के दुष्ट प्रवृति के लोग सभ्य समाज के लोगों के द्वारा समझाए जाने पर अपनी दुष्टता का त्याग नहीं कर पाते हैं | ऐसे लोगों का चरित्र चित्रण करते हुए बाबा गोस्वामी तुलसीदास जी अपने मानस में स्पष्ट कर देते हैं कि शठ के साथ निवेदन कभी नहीं करना चाहिए | वही हमारे संस्कृत सूक्ति में भी लिखा गया है "शठे शाठ्यम् समाचरेत्" अर्थात दुष्ट के साथ दुष्टता का ही व्यवहार करना चाहिए | मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने लंका की यात्रा के समय समुद्र से मार्ग देने के लिए तीन दिन तक प्रार्थना की , समुद्र अपनी उच्छृंखलता मैं व्यस्त रहा और उसने भगवान राम के निवेदन को नकार दिया | तब मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने लक्ष्मण को अपना धनुष बाण लाने के लिए कहा और घोषणा कर दी कि "भय बिनु होइ न प्रीति" | धनुष उठाते ही समुद्र भगवान राम के समक्ष प्रकट हो गया और लंका जाने का मार्ग भी बता दिया | कहने का तात्पर्य यही है कि दुष्ट के साथ यदि निवेदन किया जाता है तो वह निवेदन करने वाले को मूर्ख समझ लेता है और अपनी दुष्टता को समाप्त ना करके उसमें वृद्धि ही करता रहता है | आज चारों ओर यही देखने को मिल रहा है |*


*आज का मनुष्य मनमाने ढंग से सारे कार्य संपन्न करना चाहता है | देश में इतना शक्तिशाली संविधान होने के बाद भी मनुष्य ऐसा लगता है जैसे उसको कोई भय ही नहीं है | यदि ऐसा प्रतीत हो रहा है तो उसका एक मूल कारण है कि हमारे देश के शासक लोगों को समझाने का कार्य कर रहे हैं | आज समाज में जगह-जगह अनैतिक कृत्य हो रहे हैं विरोध , हिंसा , बलात्कार एवं कत्लेआम मचा हुआ है | यह सब देखते हुए मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" यही कहना चाहता हूं इन सभी मुद्दों पर सरकार को कड़ाई से ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है | किसी बच्ची के बलात्कार के बाद उसकी निर्मम हत्या हो जाने पर बलात्कारी एक लंबे कालखंड तक सजा से बचा रहता है जबकि ऐसे किसी व्यक्ति पर उसको तत्काल दंड की आवश्यकता होती है जिससे कि समाज में एक उदाहरण प्रस्तुत हो सके | आज जगह-जगह हो रहे विरोध प्रदर्शनों के कारण आम जनमानस सहमा हुआ है ऐसे में सरकार को एक कड़ा संदेश देते हुए आम जनमानस की सुरक्षा एवं अपराधियों के प्रति दंडात्मक कार्यवाही करने का प्रावधान करना चाहिए , क्योंकि जब तक मनुष्य में किसी के प्रति भय नहीं होगा तब तक उसके क्रियाकलाप इसी प्रकार होते रहेंगे जो कि एक सभ्य समाज के लिए कदापि उचित नहीं कहे जा सकते हैं | मेरे कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि सरकार दमनात्मक कार्यवाही करें परंतु यह भी आवश्यक कि ऐसे शरारती तत्वों के प्रति कड़ाई से कार्यवाही करें जिससे कि समाज में ऐसे तत्व अपने सर न उठा सकें और सौहार्द तथा आपसी सामंजस्य का परवेश निर्मित हो सके |*


*बाबाजी द्वारा लिखित मानस कालजयी रचना है इसके एक-एक शब्द मानव जीवन पर परिलक्षित होते हैं , उनकी लिखी बातों को काटा नहीं जा सकता है |*

अगला लेख: योग: कर्मसु कौशलम् :-- आचार्य अर्जुन तिवारी



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
16 दिसम्बर 2019
*मानव जीवन में मनुष्य को क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए यह सारा मार्गदर्शन हमारे ऋषियों ने शास्त्रों में लिख दिया है | क्या करके मनुष्य सफलता के शिखर पर पहुंच सकता है और क्या करके उसका पतन हो सकता है इसका मार्गदर्शन एवं उदाहरण हमारे पुराण में भरा पड़ा है | जिनके अनुसार मनुष्य सत्कर्म करके सफलत
16 दिसम्बर 2019
15 दिसम्बर 2019
*इस धराधाम पर सर्वश्रेष्ठ योनि मनुष्य की कही गई है , देवताओं की कृपा एवं पूर्वजन्म में किए गए सत्संग के फल स्वरुप जीव को माता-पिता के माध्यम से इस धरती पर मनुष्य योनि प्राप्त होती है | इस धरती पर जन्म लेने के बाद मनुष्य तीन प्रकार से ऋणी हो जाता है जिन्हें हमारे शास्त्रों में ऋषिऋण , देवऋण एवं पितृऋ
15 दिसम्बर 2019
09 दिसम्बर 2019
*इस संपूर्ण विश्व में प्रारंभ से ही भारत देश अपने क्रियाकलापों एवं दूरदर्शिता के लिए जाना जाता रहा है | विश्व के समस्त देशों की अपेक्षा भारत की सभ्यता , संस्कृति एवं आपसी सामंजस्य एक अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करता रहा है | यहां पूर्व काल में एक दूसरे के सहयोग से दुष्कर से दुष्कर कार्य मनुष्य करता रहा है
09 दिसम्बर 2019
17 दिसम्बर 2019
*आदिकाल से मनुष्य में सद्गुण एवं दुर्गुण साथ - साथ उत्पन्न् हुए इस धराधाम पर अनेकों सदुगुणों को जहाँ मनुष्य ने स्वयं में आत्मसात किया है वहीं दुर्गुणों से भी उसका गहरा सम्बन्ध रहा है | मनुष्य में सद्गुण एवं दुर्गुण उसके पारिवारिक परिवेश एवं संस्कारों के अनुसार ही प्रकट होते रहे हैं | सम्मान , सदाचार
17 दिसम्बर 2019
08 दिसम्बर 2019
*सनातन धर्म के अनुसार मनुष्य का जीवन संस्कारों से बना होता है इसी को ध्यान में रखते हुए हमारे पूर्वजों ने मनुष्य के लिए सोलह संस्कारों का विधान बताया है | गर्भकाल से लेकर मृत्यु तक इन संस्कारों को मनुष्य स्वयं में समाहित करते हुए दिव्य
08 दिसम्बर 2019
19 दिसम्बर 2019
*मानव जीवन में अनेकों प्रकार के क्रियाकलाप मनुष्य द्वारा किए जाते हैं | संपूर्ण जीवन काल में मनुष्य भय एवं भ्रम से भी दो-चार होता रहता है | मानव जीवन की सार्थकता तभी है जब वह किसी भी भ्रम में पड़ने से बचा रहे | भ्रम मनुष्य को किंकर्तव्यविमूढ़ करके सोचने - समझने की शक्ति का हरण कर लेता है | भ्रम में
19 दिसम्बर 2019
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x