हम एवं हमारी संस्कृति :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

24 दिसम्बर 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (349 बार पढ़ा जा चुका है)

हम एवं हमारी संस्कृति :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*हमारा देश भारत आदिकाल से सनातन संस्कृति का वाहक रहा है | परिवर्तन सृष्टि का नियम रहा है इसी परिवर्तन के चलते हमारे देश में समय-समय पर भिन्न - भिन्न संस्कृतियों की स्थापना हुई एवं सनातन धर्म से विलग होकर के अनेक धर्म एवं संप्रदाय के लोगों ने अपनी - अपनी संस्कृति की स्थापना की | आज हमारे देश के प्रत्येक धर्म एवं संप्रदाय के अलग अलग देवी - देवता , रहन - सहन , वेशभूषा , रीति - रिवाज एवं धार्मिक ग्रंथ आदि है | इन सब के भिन्न होने पर भी सबकी अपनी अपनी संस्कृति है , अपनी संस्कृति को बचाए रखने एवं बनाए रखें के लिए प्रत्येक धर्म के लोग सतत प्रयासरत रहे हैं | अनेकता में एकता का उदाहरण हमारे भारत देश में ही देखने को मिलता है | भारत देश की संस्कृति इस बात की पुष्टि करती है कि हमारे शासकों ने सदैव सर्वधर्म समभाव की नीति अपनाई थी | पूर्व काल में जहां अनेक शासकों ने हमारे देश भारत पर शासन किया वही उनके द्वारा यह भी प्रयास किया जाता रहा भारत की संस्कृति अक्षुण्ण बनी रहे | भिन्न-भिन्न आदर्शों को मानने वाले लोग अपनी संस्कृति का संरक्षण इसलिए करते हैं क्योंकि संस्कृति ही एक ऐसा विस्तृत स्थान है जहां मनुष्य एवं देवता दोनों शरण पाते हैं , इसलिए किसी भी देश की संस्कृति एवं सभ्यता का संरक्षण होना परम आवश्यक है , क्योंकि जिसकी संस्कृति नष्ट हो जाती है वह स्वयं पतित हो जाता है , उसकी पहचान खो जाती है | हमारे देश भारत ने आदिकाल से अपनी संस्कृति का संरक्षण अनेक विधाओं से किया है परंतु अब समय परिवर्तित हो गया है और पुरातन / सनातन संस्कृति अपनी पहचान खोती जा रही है |*


*आज के आधुनिक युग में मनुष्य आर्थिक दासता को झेल रहा है | एक तरफ तो देश की सरकारें कहती हैं कि उनको अपने देश की संस्कृति का ध्यान है तो दूसरी ओर दिन पर दिन देश के लोगों के द्वारा अपनी संस्कृति को नष्ट किया जा रहा है | आज हमारे आदर्श एवं सांस्कृतिक मूल्य नष्ट होते जा रहे हैं | संस्कृति किसी की दास नहीं अपितु एक ऐसा विस्तृत विषय जिसे किसी भी धर्म या संप्रदाय की चारदीवारी में कैद नहीं किया जा सकता | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" आज के भारत को देख रहा हूं जहां संस्कृति को बचाने के लिए समय-समय पर अनेक संस्थाएं तो बनी परंतु उन संस्थाओं ने संस्कृति को बचाने के लिए कार्य न करके धन उगाही का कार्य प्रारंभ कर दिया | आज देश एवं समाज संस्कृति को बचाने के नाम पर अपरिपक्व प्रयोगों में फंसकर अनेक प्रकार की विकट समस्याओं को जन्म दे रहा है | संपन्नता के साए में पनपती और पलती विकृतियों से संतृप्त पश्चिमी जीवन शैली आज हमारे देश की संस्कृति को नष्ट करने में मुख्य भूमिका निभा रही है | आज हमारी वही स्थिति है कि ना हम पूरब के रह गए हैं और ना ही पश्चिम के , और इसका कारण सिर्फ हम और हमारे मार्गदर्शक की कहे जा सकते हैं जिन्होंने अपने संस्कारों की तिलांजलि दे दी है |*


*जिस प्रकार कहानत कही जाती है कि "धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का" वही स्थिति आज हमारी हो गई है | ना तो हम अपनी संस्कृति को बचा पा रहे हैं और ना ही पूर्ण रूप से आधुनिक ही हो पा रहे हैं | यही स्थिति हमको निरंतर पतन की ओर लेकर जा रही हैं |*

अगला लेख: भ्रम से बचने का प्रयास करें :--- आचार्य अर्जुन तिवारी



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
21 दिसम्बर 2019
*इस धरती पर मानव समाज में वैसे तो अनेकों प्रकार के मनुष्य होते हैं परंतु इन सभी को यदि सूक्ष्मता से देखा जाय तो प्रमुखता दो प्रकार के व्यक्ति पाए जाते हैं | एक तो वह होते हैं जो समाज की चिंता करते हुए समाज को विकासशील बनाने के लिए निरंतर प्रगतिशील रहते हैं जिन्हें सभ्य समाज का प्राणी कहा जाता है ,
21 दिसम्बर 2019
14 दिसम्बर 2019
*इस धराधाम पर जन्म लेकर के मनुष्य सभी प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ है तो इसके कई कारण हैं | इन्हीं कारणों में मुख्य है मनुष्य का जीवनमूल्य | मनुष्य जीवन की उत्कृष्टता और सार्थकता का मानदंड जीवन मूल्य ही है | हमारी सनातन संस्कृति मैं हमारे ऋषियों - महर्षियोंं का महत्वपूर्
14 दिसम्बर 2019
09 दिसम्बर 2019
*इस संपूर्ण विश्व में प्रारंभ से ही भारत देश अपने क्रियाकलापों एवं दूरदर्शिता के लिए जाना जाता रहा है | विश्व के समस्त देशों की अपेक्षा भारत की सभ्यता , संस्कृति एवं आपसी सामंजस्य एक अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करता रहा है | यहां पूर्व काल में एक दूसरे के सहयोग से दुष्कर से दुष्कर कार्य मनुष्य करता रहा है
09 दिसम्बर 2019
15 दिसम्बर 2019
*इस धराधाम पर सर्वश्रेष्ठ योनि मनुष्य की कही गई है , देवताओं की कृपा एवं पूर्वजन्म में किए गए सत्संग के फल स्वरुप जीव को माता-पिता के माध्यम से इस धरती पर मनुष्य योनि प्राप्त होती है | इस धरती पर जन्म लेने के बाद मनुष्य तीन प्रकार से ऋणी हो जाता है जिन्हें हमारे शास्त्रों में ऋषिऋण , देवऋण एवं पितृऋ
15 दिसम्बर 2019
17 दिसम्बर 2019
*किसी भी देश का निर्माण समाज से होता है और समाज की प्रथम इकाई परिवार है | परिवार में आपसी सामंजस्य कैसा है ? यह निर्भर करता है कि हमारा समाज कैसा बनेगा | परिवार में प्राप्त संस्कारों के माध्यम से ही मनुष्य समाज में क्रियाकलाप करता है | हम इस भारत देश में पुनः रामराज्य की स्थापना की कल्पना किया करते
17 दिसम्बर 2019
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x