आतंकवाद के साये में कमजोर होता दक्षेस

24 दिसम्बर 2019   |  रमेश कुमार जोगचन्द   (362 बार पढ़ा जा चुका है)

आतंकवाद के साये में कमजोर होता दक्षेस

शबांग्लादेश के तात्कालिक राष्ट्रपति जियाउर रहमान द्वारा 1970 के दशक में एक व्यापार गुट सृजन हेतु किए गए प्रयासों के परिणामस्वरूप दिसम्बर 1985 में दक्षिण एशियाई देशों के उद्धार के लिए दक्षेस जैसे संगठन को विश्व पटल पर लाया गया। यह संगठन सार्क या दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (दक्षेस) नाम से जाना जाता है।आठ देशों का यह संगठन सार्थकता और उद्देश्यों के परिदृश्य में आज कमजोर होता नजर आ रहा है। लम्बे समय से साम्राज्यवाद से पीड़ित रहे इन देशों में साझी समस्याओं के समाधान के लिए इस संगठन ने महत्वपूर्ण प्लेटफार्म की भूमिका निभाई है तथा वर्तमान वैश्विकरण में उत्पादन तथा निर्यात में भी यह संगठन लाभकारी सिद्ध हुआ है। जैसे भारत-बांग्ला जूट उत्पादन तथा भारत-श्रीलंका में चाय-काॅफी के उत्पादन व निर्यात आदि के संन्दर्भ में। दक्षिण एशिया के जन कल्याण व जीवन स्तर को सुधारने के साथ कई उद्देश्यों को लेकर इस संगठन का निर्माण किया गया था। जिसके मुख्य उद्देश्य इस क्षेत्र में सामुदायिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना विकासशील देशों के साथ सहयोग बढाना, समान हित के विषयों पर अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर सहयोग करना, सामाजिक आर्थिक विकास द्वारा मनुष्यों को सम्मान से साथ जीने के अवसर प्रदान करना, समान उद्देश्यों वाले क्षेत्रीय और आर्थिक संगठनों के साथ सहयोग करना आदि लक्ष्य जो दक्षिण एशियाई देशों की दशा और दिशा में सुधार के लिए महत्वपूर्ण समझे जाते रहे हैं। विकास और आर्थिक हालातों से जूझ रहे उन देशों की स्थिति को सुधारने के उद्देश्य से ही दक्षेस का मुख्यालय काठमांडू नेपाल में स्थापित किया गया। जिससे नेपाल, भूटान, बांग्लादेश जैसे अल्पविकसित देशों की स्थिति बेहतर हो सके लेकिन आतंकवाद और इसके सदस्य राष्ट्रों के बीच सम्बन्धों का सेतु कमजोर होने के कारण आज दक्षिण एशियाई देशों का उद्धारक कहे जाने वाले इस संगठन पर निराशा के काले बादल मंडरा रहे हैं,क्योंकि हर वर्ष होने वाले शिखर सम्मेलनों का इस प्रकार रद्द होना हमें आभास करवाता है कि दक्षेस निष्क्रिय होने के साथ-साथ कठिन परिस्थितियों का सामना कर रहा है।
राजनैतिक मतभेद, सीमा विवाद, सदस्य देशों की खराब आर्थिक स्थिति, आतंकवाद जैसे कारणों के चलते पिछले वर्षों में दक्षेस अपने महत्वकांक्षी उद्देश्यों की प्राप्ति में लगभग विफल रहा है।
19वें सार्क शिखर सम्मेलन का आयोजन साल 2016 में पाकिस्तान में किया जाना था लेकिन भारत समेत बांग्लादेश, भूटान और अफगानिस्तान ने इस सम्मेलन में हिस्सा नहीं लिया था। बांग्लादेश घरेलू परिस्थितियों का हवाला देते हुए इस सम्मेलन में शामिल नहीं हुआ था। जिसके बाद ये सम्मेलन रद्द करना पड़ा था। अब पाकिस्तान में 20वें दक्षेस सम्मेलन के सफल आयोजन की सम्भावना नजर नहीं आ रही क्योंकि पाकिस्तान ने आतंकवाद को रोकने के लिए जरूरी कदम नहीं उठाए हैं,जब तक वह ऐसा नही करेगा भारत सम्मेलन में शामिल होना नहीं चाहेगा। हालांकि 2016 में पाकिस्तान में आयोजित शिखर सम्मेलन के बहिष्कार के बाद भारत दक्षेस से विमुख होकर बिम्सटेक में गहरी रुचि के साथ सक्रिय हो गया है। भारत ही नहीं पाकिस्तान और नेपाल इन दो देशों के अलावा अब अन्य देशों की दक्षेस में रुचि नहीं रह गई है। चूंकि पाकिस्तान बिम्सटेक का सदस्य नहीं हो सकता इसलिए पाकिस्तान के लिए दक्षेस का बहुत अधिक महत्व है। हमने दक्षेस की सफलता और असफलता के बारे में कई विद्वानों की प्रतिक्रिया और लेख देखें है जिसमें उन्होंने कई जटिलताओं का उल्लेख किया होगा लेकिन वर्तमान में सिर्फ आतंकवाद और आपसी विवाद ही दक्षेस की विफलता का उत्तरदायित्व निभा रहे है जो कि दुर्भाग्यपूर्ण है। अगर इन विकासशील देशों को महाशक्ति राष्ट्रों के शोषण से बचना है तो दक्षेस को मजबूत करना बहुत जरूरी होगा। कुछ राष्ट्रों का आपसी कलह और अनबन के चलते दक्षेस से दूरी बनाना भविष्य में हानिकारक होगा। हम अलगाव की भावना से कोई दूसरा विकल्प नये उप क्षेत्रीय संगठन में तलासने की कोशिश करेंगे तो दक्षिण एशिया के उन देशों से दूरी बन जाएगी । यह दूरी भविष्य में वैश्विक स्तर पर इन देशों को कमजोर कर देगी जिसने दक्षिण एशिया में अपने परस्पर सहयोग और विकास के उद्देश्य से एक होकर यूरोपीय देशों का ध्यान आकर्षित कर दिया था। हालांकि भारत और पाकिस्तान के मध्य आतंकवाद का मुद्दा दक्षेस के भविष्य के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। अब सार्क की नई ऊंचाइयों के लिए पाकिस्तान को आतंकवाद के खिलाफ प्रतिबद्धता के साथ-साथ भारत से सम्बन्धों को सुधारने की कोशिश करनी चाहिए जिससे दक्षिण एशिया के देशों का उद्धारक दक्षेस फिर से खड़ा हो सकें।

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