दूरी...... !

26 दिसम्बर 2019   |  परमजीत कौर   (4348 बार पढ़ा जा चुका है)

दूरी...... !

उस कंपकंपाती रात में वह फटी चादर में

सिमट- सिमट कर, सोने का प्रयास कर रही थी ,

आँखों में नींद ही नहीं थी ,

शरीर ठंड से कांप जो रहा था।

एक ही चादर थी , जो ओढ़ी थी, दोनों बहनों ने ,

तभी बाहर से आती मधुर आवाजों से,

वह बेचैन हो ,खिंचती चली गई।

झोपड़ी की बंद खिड़की के सुराख़ से दो आँखें बाहर झाँकने लगी ।

दूर रौशनी से नहाई, ऊँची इमारत से जैसे परियों की आवाज़ें सुनकर

वह मुस्काई ।

तो आज दीवाली है ! वह बुदबुदाई ,

तभी पीछे से हँसने की आवाज़ आई।

पगली , आज के दिन वहाँ कोई संत आते हैं ,

. और बच्चों को उपहार देते हैं। बड़ी कहती हुई जाकर सोने लगी।

अच्छा। … उसने ख़ुशी से बड़ी का हाथ पकड़ लिया।

क्या मुझे भी उपहार मिलेगा ?

मैं भी तो बच्ची हूँ न ?वह ख़ुशी से छटपटाई.......

हाँ , तुम भी अपने तकिये के नीचे अपनी इच्छा लिख दो।

बड़ी सो गई, दुबारा वही फटी चादर ओढ़ कर ,

छोटी मुस्काई , झट से एक कागज़ के टुकड़े पर

आढ़ा-तिरछा लिखा -मुझे भी चाहिए ‘रौशनी’

वह सो गई , चेहरे पर मुस्कान थी।

सुबह उठी, तो देखा, बहन खाना बना रही थी।

झोपड़ी में वही सीलन , बदबू ,अँधेरा था।

संत आए थे क्या ?

उम्मीद से नींद भरी आँखों से बहन के पास जाती है।

बहन मायूसी से मुस्कुराती हुए बाहर की तरफ़ इशारा करती है

ये दूरी देख रही है ? इमारत से झोपड़ी तक !

ये संत भी पार नहीं करते ।

छोटी (7 वर्ष)अपनी बहन (11 वर्ष)को प्रश्नभरी आँखों से देखती है।

क्यों है ये दूरी ........ ? छोटी बुदबुदाती हुई बाहर आकर इमारत को देखती है !

मेरी कलम से

परमजीत कौर

25 . 12 . 19

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Rishabh kumar
12 जनवरी 2020

nice

रेणु
29 दिसम्बर 2019

बहुत मार्मिक शब्द चित्र है , पर म जीत जी , कभी कभी सोचती हूँ कितना कलपता होगा ऐसे लोगों का मन , आखिर एसङ्ख्य छतों में एक छत क्यों उनके नाम की ना हो सकी ??

परमजीत कौर
30 दिसम्बर 2019

भारत वह नहीं जो ऊँची इमारतों की रंगीनियों में गुम है . असली भारत आज भी झोपड़पट्टियों में अपने अच्छे दिन आने का इंतज़ार कर रहा है .....

वाह क्या बात है ! ! !

परमजीत कौर
28 दिसम्बर 2019

धन्यवाद !

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