विध्वंसक आस्था - इंसानियत की मौत -दिनेश डॉक्टर

27 दिसम्बर 2019   |  दिनेश डॉक्टर   (432 बार पढ़ा जा चुका है)

विध्वंसक आस्था - इंसानियत की मौत -दिनेश डॉक्टर

फेथ यानी आस्था बडी अजीब शै है । हम मनुष्यों के पास जीवन की अनसरटेनिटी या अनिश्चितता से पार पाने के लिए आस्था या फेथ का ही सबसे बड़ा सहारा होता है । वो चाहे किसी गुरु में हो, मंदिर गुरुद्वारे में हो , अपने पूजा घर में हो, किसी प्रसिद्ध तीर्थ स्थान में हो या अपनी खुद की प्रार्थनाओं में हो । लेकिन जब हमारी आस्था अंधी श्रद्धा में बदल जाती है तब मामला गड़बड़ा सकता है ।

ज़रूरी नही आस्था या फेथ किसी गुरु, देवता या मंदिर ही में हो । यह किसी बिजनेस कॉर्पोरेशन, पोलिटिकल सिस्टम या पोलिटिकल पर्सन में भी हो सकती है । भारत की आज़ादी के मूवमेंट में पूरा देश गांधी जी को बापू और राष्ट्रपिता मानकर पूरी आस्था से उनके पीछे खड़ा हो गया । पिछले सात दशकों से चीन के लोगों ने कम्युनिज़्म को ही सबसे बड़ा धर्म मानकर उसमे फेथ या आस्था रखते हुए बड़े गज़ब की तरक्की की है और आज चीन दुनिया का सबसे धनी और ताकतवर देश बन गया है । आप सब को तो पता ही होगा कि चीन की कम्युनिस्ट सरकार ने सत्तर वर्ष पहले ही किसी भी प्रकार के धर्म और धार्मिक पूजा को गैरकानूनी घोषित कर दिया था । चीनियों ने धीरे धीरे माओत्से तुंग और कम्युनिस्ट पार्टी में ही सम्पूर्ण आस्था स्थापित कर दी । जर्मनी में हिटलर का नाज़ीवाद एक विचार से शुरू होकर जबरदस्त आस्था का प्रतीक बन गया और लाखों यहूदियों की हत्या की वजह भी ।

अपनी आस्था या विश्वास जब दूसरों से बेहतर और ज्यादा सही लगी तो यही आस्था डिस्ट्रक्टिव या विध्वंसक बन जाती है । ज्यादा पुरानी नही - अभी हाल ही कुछ शताब्दियों में नाज़ीवाद, क्रूसेड और ज़िहाद की वजह से लाखों के कत्लेआम का इतिहास हमारे सामने है । इसी आस्था को हथियार बना कर जिन्ना जैसे इंसान की वजह से, जिसका इस्लाम से अपने टाइप राइटर और सेक्रेटरी के अलावा दूर दूर तक कोई लेना देना नही था- लाखो लोग कत्ल किये गए और अपने घरों और शहरों से उजड़ने को मजबूर हुए ।

जब आस्था का मामला होता है तो ज्यादातर लोग जानने के बजाय मानने को तरजीह देते है । जो लोग बच्चो और धर्मांध लोगो को जन्नत की हूरें या स्वर्ग में खूबसूरत मकान के सपने दिखाकर टेरेरिस्टऔर सुसाइड बॉम्बर्स बनाते है उन्हें यह बात अच्छी तरह पता होती है और वो लोगों सवाल पूछने की इजाज़त नही देते। वो किसी धार्मिक पुस्तक या पोलिटिकल आइडियोलॉजी का सहारा लेकर अंध श्रद्धा पैदा करने में माहिर होते हैं ।

आस्था को और भी हल्के फुल्के ढंग से समझे तो जैसे कोई किसी से कहे कि फलाँ फलाँ मज़ार पर चादर चढ़ाने, या उस गुरुद्वारे में मत्था टेकने या पहाड़ी पर बने उस मंदिर में प्रसाद चढ़ाने से मन की मुराद पूरी हो जाती है और उन्ही दिनों वो शख्स किसी परेशानी में उलझा हुआ हैं तो वो बिना ज्यादा सोचे विचार वहां जाने को फौरन तैयार हो जाएगा । इसे ही मानने की आस्था कहते है । ज्यादातर लोग ऐसा ही करते है । कोई ही बिरला होगा जो यह सोचेगा कि मेरा भगवान या खुदा तो मेरे अपने भीतर है , मुझे कहीं जाने की क्या ज़रूरत है ।

आज धार्मिक प्रार्थना स्थल हो, गुरुओं के डेरे हों या बाबाओं के आश्रम, यहां वहां के तीर्थ स्थल हों या साल दर साल बढ़ती कांवड़ियों की भीड़ इनके सबके पीछे 'गतानुगता' वाली आस्था से उपजी अंध श्रद्धा ही है । यानि के तुम गए थे तो हम भी जाएंगे । एक मित्र ने एक बड़ा अच्छा उदाहरण दिया कि रेलवे लाइन के ऊपर बने पुल पर अगर चार आदमी इकट्ठे होकर नीचे झांकना शुरू कर दें, तो थोड़ी देर में वहां सैंकड़ो की भीड़ लग जाएगी, स्कूटर कारें रुक जाएंगी और सब लोग एक दूसरे की देखा देखी नीचे झांकना शुरू कर देंगे ।

यह भी एक किस्म की आस्था का ही एक रूप है कि इतने लोग वहाँ रुक कर नीचे देख रहे हैं तो ज़रूर कुछ होगा ।

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सही बात है. .. आस्था सी ही अन्धी होती है. ..

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