खीज - दिनेश डॉक्टर

30 दिसम्बर 2019   |  दिनेश डॉक्टर   (472 बार पढ़ा जा चुका है)

खीज - दिनेश डॉक्टर

सामने झक्क सफेद कलफदार कुर्ते पायजामें नेता जी बैठे थे । इंडिया किंग्स की सिगरेट की डब्बी सामने मेज पर पड़ी थी । शाम का वक्त था । स्कॉच की बोतल आधी हो चुकी थी । वो बोल रहे थे और मैं सुन रहा था । वो कह रहे थे कि उन्हें देश के लिए बहुत काम करना है । युवा पीढ़ी को नई दिशा देनी है । कौमी एकता मज़बूत करनी है । धर्म और जातिवाद के ज़हर से समाज को मुक्त करना है । मोहब्बत और भाईचारे की एक नई क्रांति का सूत्रपात करना है । और ऐसा कुछ करना है कि आने वाली कई पीढियां उन्हें याद रक्खें । क्योंकि जगह भी उनकी थी और शराब भी तो मैं पूरे उत्साह से उनका हौसला बढ़ाता रहा ।

ऐसी महफिले महीने में एकाध बार सज ही जाती थी । क्योंकि उनका व्यक्तित्व आकर्षक था, अच्छे वक्ता भी थे और देश के शीर्ष राजनीतिक घरानों में उनकी गोटी फिट थी, कुछ सालों बाद एक दिन वो मंत्री भी बन गए ।
महफिलें सजती रही । उदार भाव से पिलाते हमेशा वही थे । अब और भी महंगी विदेशी स्कॉच चलती थी पर उनका लहजा बदलना शुरू हो गया था । धीरे धीरे बातों में अहंकार का पुट आना शुरू हो गया था । प्रेम और भाईचारे की क्रांति की बात अब नही होती थी । युवा पीढ़ी के लिए कुछ कर गुजरने की बातें भी नही होती थी । धर्म और जाति की राजनीति खत्म करने के चर्चे भी अब नही होते थे । अब इस बात के चर्चे ज्यादा होते थे कि कौन कौन बड़ा आदमी उनसे मिलने आता है, किस फिल्मी एक्टर के फोन उनके पास आते हैं, मुख्य मंत्री क्यों उनके बढ़ते कद से इनसिक्योर हो रहा है वगैरा वगैरा ।

एक दिन उनके कलफ किये सफेद कुर्ते की जेब में मैंने सोने का महंगा पैन टंका देखा । अगली बार जब मिला तो रोलेक्स की महंगी घड़ी कलाई पर झूल रही थी । उनके दफ्तर में देश के प्रधान मंत्री के साथ अन्तरंगता दिखाते हुए बड़ी फोटो भी टंग चुकी थी । हर दूसरे तीसरे दिन वो अखबारों और टेलीविजन में भी नज़र आने लगे थे । उनका पेट बढ़ना शुरू हो गया था । अब उनसे बात करने से पहले सेक्रेटरी से बात करनी पड़ती थी । वक्त लेना पड़ता था । दरअसल अब वो बड़े नेता हो गए थे । संघर्ष के दिनों के मेरे जैसे मुफ्त की पीने वाले दोस्त धीरे धीरे क्या तो खुद ही दूर हो गए या फिर कर दिए गए ।

अब उनसे मिलना नही होता था । बस खबरें ही पढ़ने को मिलती थी उनके बारे में । या कभी कभार टेलीविजन पर उनके दर्शन हो जाते थे । उनके विदेश दौरे भी शुरू हो चुके थे इसी बीच ।

कई बरस वो सत्ता के आकाश में चमकदार पतंग की तरह उड़ते रहे । फिर एक दिन उनकी पार्टी और वो चुनाव हार गए । सत्ता का खुमार शराब की तरह होता है । ज्यादा पी लो तो कई दिनों तक हैंगओवर बना रहता है । सत्ता भी अगर पन्द्रह बीस सालों तक भोगी हो तो उसका हैंगओवर भी पंद्रह बीस महीनों तक तो रहता ही है ।

ऐसे ही एक हैंगओवर काल में फिर महफ़िल सजी । क्योंकि अब वो भले ही भूतपूर्व थे पर थे तो बड़े राजनेता । तो हर आदमी के साथ खुलकर न तो बैठ सकते थे और न ही पी सकते थे। ऐसे में पुराने दोस्तों की याद उन्हें फिर सताने लगी । सत्ता के वक़्त रोज़ रोज़ दरबार में हाज़िरी देने वाले बड़े उद्योगपति और पूंजीपति सत्ता के साथ ही विदा हो चुके थे। कई सालों बाद फिर मुलाकात हुई । पेट बहुत बढ़ गया था, खूबसूरत चेहरे पर मोटे मांस की परतें चढ़ गई थी, गर्दन गायब हो गयी थी, प्रभावशाली ओजस्वी वाणी फूलती सांसो के बीच खरखराहट में गुम हो चुकी थी । तीन तीन महंगी गाड़ियां उनके पोर्टिको में खड़ी थी । अब वो बहुत कम बोलते थे या कहूँ के बोल पाते थे । हाँ हूँ जैसे कुछ शब्द या खोखली उदास हंसी । परिवार के हाल चाल पूछ कर सिगरेट सुलगा ली और टेलीविजन ऑन कर दिया । अब न वो अखबारों में छपते थे और न ही टेलीविजन पर नज़र आते थे । कुछ देर यू हीं चैनल बदलते रहे । फिर फूलती सांस पर काबू पा कर बोले "शहर का बेड़ा गर्क हो रहा है , ये कमीना सब कुछ फ्री में बांट कर बहुत गंदी सियासत कर रहा है । अब मुल्क की राजनीति बर्बाद होने से कोई नही बचा सकता" कह कर गुस्से से कांपते हाथों से अपने लिए और मेरे लिए तीसरा पैग बनाने लगे ।
क्योंकि शराब भी उनकी थी और घर भी उनका था - मैंने काजू चबाते हुए हाँ में हाँ मिलाई और लंबा घूंट लेकर गिलास खाली कर के वापस मेज पर रख दिया ।

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