पाव भर जलेबी - जिव्हा सुख या आनंद । दिनेश डॉक्टर

02 जनवरी 2020   |  दिनेश डॉक्टर   (771 बार पढ़ा जा चुका है)

पाव भर जलेबी - जिव्हा सुख या आनंद । दिनेश डॉक्टर

कुछ अरसे पहले , हिंदी फिल्मों के मशहूर लेखक और प्रसिद्ध अभिनेता मरहूम कादर खान साहेब ने एक इंटरव्यू में मज़ाहिया अंदाज़ में एक बहुत बड़ी और गहरी बात कही । उन्होंने कहा एक वक़्त था हमेशा कुछ न कुछ खाने की भूख लगती थी पर जेब खाली थी और आज जेब में खूब पैसा है, जो चाहे जब चाहे खा लूँ पर ख्वाहिश ही नही होती, भूख ही नही लगती ।

दरअसल किसी भी चीज़ का मज़ा और उसका खास होना - उसके मिलने की उम्मीद में जितना है उतना मिलने में नही । मिलने के बाद तो बड़ी से बड़ी चीज़ भी आम हो जाती है और वो उसका मज़ा भी नही रहता । जब तक ख्वाहिशें और उम्मीदें रहती है तो जीने का मज़ा रहता है पर जैसे ही धीरे धीरे सारे सपने पूरे होने लगते है तब दिक्कतें पेश आनी शुरू हो जाती हैं । अमेरिका का पूरा हिप्पी मूवमेंट भौतिकवाद या कंज्यूमर कल्चर से ऐसी ही ऊब के चलते पैदा हुआ था । आज भी महंगे लेबल वाली फ़टी हुई जीन्स पहनना एक तरह की वैसी ही उद्घोषणा है । कच्चे फूस की झोपड़ी में रहने वाले के लिए भौतिक वस्तुओं की हर छोटी से छोटी उपलब्धि जहां आनंद और उत्सव का विषय है, करोड़ों के मकान में रहने वाले के लिए एक करोड़ की नई कार खरीदना भी कोई खास खुशी का मौका नही बनता । इसलिए दोस्तों को बुलाकर शैम्पेन की बोतल खोलकर - कुछ घंटो की खुशी पैदा की जाती है ।

जहां ऐश्वर्य के भौतिक साधनों का अभाव एहसास ए कमतरी और डिप्रेशन पैदा कर सकता है - उनकी बहुतायत एक अजीब किस्म का स्ट्यूपोर और ऊब पैदा करती है । पैसे वाली इलीट क्लास में मानसिक रोगों की संख्या बेतहाशा बढ़ रही है । हज़ारों रुपये खर्च करके एक घंटे के सेशन में वे लोग सिर्फ ये जवाब ढूंढने आते है कि जो चाहा था सब मिल गया पर पता नही अभी भी खुशी क्यों नही मिलती ? अब क्या करूँ ?

दरअसल जो सुख हमें किसी वस्तु के द्वारा मिलता है वो असल में सुख नही सुविधा है । असली सुख या आनंद दरअसल वो है जो हमें अपने खुद के किये हुए काम से मिलता है - चाहे वो कुछ अच्छा लिखना हो, या पेंटिंग बनाना , या नृत्य संगीत के द्वारा अपनी रचनाधर्मिता को बाहर लाना, या अच्छा खाना पकाना, या बागबानी करना । किसी ने हमारी महंगी गाड़ी, बड़े घर या महंगे जेवर कपड़ों की या और किसी बात की तारीफ कर दी - तो यह खुशी स्थायी नही होगा । थोड़ी देर रहेगी और मिट जाएगी। इसलिए सच्चा आनंद वही है जो अंदर से पैदा होता है किसी बाहरी वस्तु या व्यक्ति पर निर्भर नही होता ।

इसको थोड़ा सरलता से समझाता हूँ । खुद एक पाव जलेबी खाने से जिव्हा के जरिये स्वाद का सुख थोड़ी ही देर में समाप्त हो जाएगा पर यही पाव भर जलेबी अगर आप किसी गरीब और भूखे आदमी को खिला दें तो उसके चेहरे पर जो भाव उभरेंगे उनकी स्मृति आपको बरसों तक आनंद देती रहगी।

अगला लेख: राजनेता उतने ही सच्चे है जितनी खुद को वर्जिन बताने वाली वेश्याएँ - दिनेश डॉक्टर



सही बात है. ..

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
21 दिसम्बर 2019
मुझे पता है उसने मुझे देख लिया था पर फोन की स्क्रीन पर आंख जमाये शो ऐसे किया जैसे मै कमरे में हूँ ही नही । फिर खिड़की की तरफ देखते हुए फोन कान पर लगा कर उसने बात करनी शुरू कर दी ऐसा दिखा कर जैसे कोई बहुत ज़रूरी काल है । दरअसल दूसरी तरफ लाइन पर कोई था ही नही बावजूद इसके कि उसने हैलो हैलो बोलकर बातचीत ऐ
21 दिसम्बर 2019
26 दिसम्बर 2019
हा
ग्रहण को लेकर जितने वहम हिंदुस्तानियों ने - वो भी खास तौर पर हिंदुओं ने पाल रक्खे है उनका मुकाबला दुनिया भर में नही । ग्रहण सीधे सीधे एक एस्ट्रोनॉमिकल या खगोलीय घटना है जो घूमते घूमते कभी पृथ्वी के बीच में आने से चन्द्रमा के साथ तो कभी चंद्रमा के बीच में आने से सूर्य के साथ घटती है । इसको किन किन ची
26 दिसम्बर 2019
11 जनवरी 2020
मानहाइम आकर चला गया । कुछ लोग उतरे कुछ चढ़े । आजकल बिना किसी अपवाद के हर देश शहर में सबलोग अपने मोबाइल में ही मस्त रहते हैं । ट्रेन पर समस्त उद्घोषणा तीन भाषाओ में बारी बारी से होती है । पहले फ्रेंच फिर जर्मन और सबसे अंत में अंग्रेजी में । ट्रेन मिनट मिनट के हिसाब से एकदम सटीक समय पर चल रही है। रास्त
11 जनवरी 2020
सम्बंधित
लोकप्रिय
31 दिसम्बर 2019
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x