चाँद की रोशनी में।

03 जनवरी 2020   |  जानू नागर   (402 बार पढ़ा जा चुका है)

गेहूँ की पकी फसल में गिरती चाँद की रोशनी एकदम साफ थी। हवा के बहने से गेंहूँ की बालियां आपस मे रगड़ कर बज रही थी। घर बहुत दूर छूट गया था। रास्ता लंबा था। अनगिनत खेत पार कर चुके थे। हाथ मे लटकती लालटेन में जल रही बाती भभक कर तेज हो जाती तो कही बिल्कुल डिम हो जाती। दूसरे हाथ मे नीम के पेड़ की पतली छड़ी को हाथ से झटकते तो उसमें एक आवाज सटाक की जो कानों में स्पंद पैदा करती। दूर गाँव से मुर्गे की बांग कानो से टकराई। लालटेन की रोशनी में दो परछाई साथ चल रही थी। एक भारी भरकम दूसरी छोटी चाँद की रोशनी में दूर तक का बिलकुल साफ सही दिख रहा था। धूल भरा बटहा ठंडा पड़ चुका था। चप्पलें धूल में लिथड़ गई थी। सियार हुकर्ता हुआ सामने से गुजर गया। अब मन में डर भली भांत बैठ गया था। खेतों में गेहूँ की पकी सुनहली बालियों के सिकुर बिल्कुल मूँछों की तरह टाईट थी। सरसो के पेड़ों में पकी छिहा हवा से छनक रही थी। खरगोश दुपका पानी के बरहा में पैरों बीच मुँह दबाए लेटा था। माँ की जुबान ने बड़े बेटे से कहा लगता है रात काफी है। अभी मुर्गे ने बांग नही दिया है। यह सोच कदम आगे को नही पीछे को लौटने लगे।गली गाँव अभी भी शांत था। आँगन में खाली पड़े बिस्तर में थके शरीर गिर गए माँ ने लालटेन की लौव को धीमा कर छपरे से सटी थुनिहा के कनभ्भे में फसा कर लटका दिया। करवटें लेते हुए माँ किसान को गाली देते हुए की देखो में मिला नही अगर कोई हाला हरामजादा मिल जाता तो क्या होता? यह सवाल लेकर वह भी औघा गई।

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