भगवान श्रीराम के आदर्श :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

05 जनवरी 2020   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (403 बार पढ़ा जा चुका है)

भगवान श्रीराम के आदर्श :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*भारत देश आदिकाल से अपनी संस्कृति , सभ्यता एवं संस्कारों के लिए जाना जाता रहा है | समय-समय पर यहां अनेकों महापुरुषों ने जन्म लेकर समाज को नई दिशा दिखायी है | समय - समय पर इस पुण्यभूमि में ईश्वर ने अनेकानेक रूपों में अवतार भी लिया है | इन्हीं महापुरुषों (भगवान) में एक थे रघुकुल के गौरव , चक्रवर्ती सम्राट महाराज दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र , भगवान श्री हरि विष्णु के अवतार श्री राम | जिनके मानवोचित आदर्शों के कारण उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहा गया | मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने अपने संपूर्ण जीवन काल मे एक आदर्श प्रस्तुत किया है | प्रात:काल उठकरके अपने माता पिता की चरण वंदना करने के बाद गुरुओं का आशीर्वाद लेकर के अपने दिन का प्रारंभ करते थे | जिस समय उनके राज्याभिषेक की तैयारी हो रही थी उसके एक दिन पहले मंझली माता कैकेई के द्वारा मांगे गये वरदानों को पूर्ण करने एवं अपने पिता का वचन बनाए रखने के लिए विशाल साम्राज्य का त्याग करके चौदह वर्षों के लिए बनवासी का जीवन जीना स्वीकार किया | बनवासी का जीवन कैसा होता है इसका दर्शन बी हमें भगवान श्री राम के क्रियाकलापों से मिलता है | अयोध्या के राजकुमार एवं युवराज होते हुए भी बिना खड़ाऊं के नंगे पैरों वल्कल वसन पहन के वन यात्रा प्रारंभ की | चौदह वर्ष कठोर साधना तो उन्होंने की ही साथ ही पत्नी के लिए पति का क्या कर्तव्य होता है यह भी उन्होंने बताया | रावण के द्वारा अपहरण की गयी अपनी भार्या सीता को रावण का वध करके पुनः प्राप्त किया | अयोध्या के राजा होने के बाद अपने सुख की परवाह किये बिना मात्र प्रजारंजन के लिए अपनी प्राण प्यारी भार्या का त्याग कर दिया और राजा होकर भी त्यागी का जीवन जिया | मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जी ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में एक मर्यादा स्थापित की | यह हमारी संस्कृति का एक दिव्य इतिहास रहा है | प्रत्येक मनुष्य यदि भगवान श्री राम के आदर्शों को अनुकरण करने लग जाय तो इस धरती पर पुनः राम राज्य की स्थापना हो सकती है | हमारा भारत देश यूं ही महान नहीं कहा जाता है यहां समय-समय पर महापुरुषों के द्वारा दिया गया मार्गदर्शन आम जनमानस को अपने परिवार , समाज एवं राष्ट्र के प्रति क्या कर्तव्य करना चाहिए इसकी शिक्षा देता रहा है , और हम उनसे शिक्षा ग्रहण करके अपने जीवन नई दिशा और दशा देते रहे हैं | परंतु आज परिवेश परिवर्तित हो गया है शायद इसीलिए मानव मानव कहने योग्य नहीं रह गया है |*


*आज के वर्तमान युग में भगवान श्री राम के आदर्शों पर चलने वालों की संख्या बिल्कुल समाप्त हो गई है | आज के बच्चे सुबह उठकर के अपने माता पिता को प्रणाम नहीं करना चाहते हैं | घर - घर में सम्पत्ति / जायदाद के लिए महाभारत चल रही है | माता-पिता के द्वारा किसी को दिए गए वचन को पूरा करने की बात ही छोड़ दीजिए आज की संतान अपने माता पिता की किसी बात को नहीं ही मानना चाहती है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" देख रहा हूं कि समाज मे लोग भगवान श्री राम के चरित्र का अध्ययन एवं गायन तो खूब कर रहे हैं परंतु उनके आदर्शों पर चलने को कोई भी तैयार नहीं दिखता है | पत्नी यदि किसी संकट में पड़ जाय तो पति उसे छोड़कर दूसरी पत्नी के चक्कर में लग जाता है | यदि राजा के रूप में भगवान श्री राम जी ने अपनी पत्नी का त्याग मात्र प्रजारंजन के लिए कर दिया था वहीं आज हमारे शासक अपने परिवार को बचाने के लिए पूरे देश को हिंसा की अग्नि झोंकने को तैयार दिख रहे हैं | आज यदि राम जैसे आदर्श हमारे देश में नहीं देखने को मिल रहे है तो उसका एक कारण यह भी है कि आज माता पिता भी दशरथ एवं कौशल्या की तरह नहीं हो पा रहे हैं | यदि श्री राम की तरह पुत्र पाना है तो पहले दशरथ बनना पड़ेगा , और यदि सीता की तरह बहू की कामना है तो कौशल्या की तरह सास बनना ही होगा अन्यथा भगवान राम के चरित्रों का गायन करने का कोई लाभ नहीं है | भगवान राम का चरित्र गायन करने से अधिक पालन करने योग्य है | दुर्भाग्य है कि आज लोग दूसरों को शिक्षा देना तो खूब जानते हैं परंतु स्वयं उसका पालन नहीं करना चाहते | आज लोगों को अपनी संतानों से बहुत शिकायत होती है | अपनी बहुओं से रुष्ट होकर के पूरे मोहल्ले में उनकी शिकायत करने वाली सासोंं की समाज में कमी नहीं है परंतु इन सास ससुर को भी विचार करना चाहिए कि क्या वे भी अपने पुत्र एवं पुत्रवधू के साथ दशरथ कौशल्या की तरह व्यवहार कर रहे हैं | जब तक हम स्वयं दशरथ एवं कौशल्या की तरह नहीं बनेंगे तब तक राम जैसी संतान एवं सीताजी जैसी बहू का मिलना असंभव है | मानवमात्र को भगवान राम क आदर्शों को हृदय में उतार कर के उसका सतत पालन करने का प्रयास करना चाहिए |*


*जहां रामायण में छोटे भाई भरत के लिए राज्य का त्याग कर दिया गया और दूसरे भाई भरत के द्वारा भी उस राज्य को नहीं ग्रहण किया गया वहीं आज समाज में एक-एक टुकड़ा जमीन के लिए भाई भाई युद्ध में हो रहा है | ऐसा करके हम भगवान श्री राम के किन आदर्शों का पालन कर रहे हैं यह हमें सोचना ही होगा |*

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जय जय सियाराम
आचार्य श्री

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