छुटभैय्ये नेताओं की खंडित भारतीयता- दिनेश डॉक्टर

05 जनवरी 2020   |  दिनेश डॉक्टर   (606 बार पढ़ा जा चुका है)

छुटभैय्ये नेताओं की खंडित भारतीयता- दिनेश डॉक्टर

महीने में दो चार बार जाति के नाम पर युवा जोड़ों की, जिन्होंने अंतर्जातीय विवाह करने की हिम्मत जुटायी, हॉनर किलिंग या सम्मान के नाम पर हत्याओं की खबर अख़बार में छप ही जाती हैं । लड़का यदि उच्च जाति का है और लड़की अपेक्षाकृत निम्न जाति की , तो फिर भी लोगों के क्रोध इतने भयंकर नही होते पर यदि स्थिति विपरीत हो तो मामला बहुत बिगड़ जाता है । कुछ अपवाद भी इसमे हैं । यदि जाति प्रचलित सामाजिक व्यवस्था के हिसाब से निम्न है पर आर्थिक सम्पन्नता और पद प्रतिष्ठा ऊंची है, तो इतना बखेड़ा नही होता । हिंदुओ में सदियों पुराने आपस के जातिगत वैमनस्य को भूलना और बिना ऊंच नीच के एक दूसरे का सम्मान करना शहरों में तो सरल हो रहा है पर कस्बों और ग्रामीण अंचलों में अभी भी वैसी ही घृणित सामंतवादी सोच है।
हिन्दू समाज में शास्त्रों की गलत व्याख्या कर जबरदस्ती नीचे धकेले गए समाज को अस्पृश्य या दलित बना कर उन पर सदियों जो अपमान और अत्याचार स्वयं निर्मित सवर्णों द्वारा किया गया वह अत्यन्त कुत्सित और अक्षम्य है । दुर्भाग्य से वर्तमान में भी बहुत से पढ़े लिखे और खुद को उदार मानने वाले लोगों को जातिगत उच्चता या हीनता की वकालत करते देखा जा सकता है ।
हिन्दू पहले भले ही एक भौगोलिक या सांस्कृतिक टर्म रही हो पर आज इसे भी इस्लाम या क्रिस्चियनिटी की तरह ही प्रचलित कर दिया गया है । यदि भौगोलिक आधार पर 'हिन्दू' शब्द की स्वीकार्यता होती तो मुसलमानों, क्रिश्चियनों, सिक्खों आदि को खुद को हिन्दू कहने में कभी भी कोई दिक्कत पेश नहीं आती ।
वर्तमान में जिस संदर्भ में हम हिन्दू शब्द को लेते है वह वैदिक हिन्दू हैं जो चार वर्ण या जातियों और अनेक उपजातियों , उप उपजातियों में बसा हुआ धर्म है जिसके अनेकोनेक देवी देवता है, अवतार है, पुराण और सहिंताए है, रामायण और महाभारत जैसे ग्रन्थ है । हिन्दुओं में एक तरफ स्पष्ट एकेश्वरवाद है तो दूसरी तरफ उतना ही निर्द्वंद्व बहुईश्वरवाद । और कमाल की बात यह है कि वर्तमान में सबकी सबको लेकर स्वीकार्यता भी है । शैव या वैष्णव, सनातनी या आर्यसमाजी कहीं भी एक दूसरे के विरोध में खड़े नजर नहीं आते । ये बात दीगर है कि राजनीतिक पार्टियां सत्ता के लिए कभी इस तो कभी उस अवतार के नाम पर हिंदुत्व और गर्व के नाम पर, जनेऊ माला तिलक तलवार जैसे प्रतीकों के नाम पर हिन्दुओं का भावनात्मक शोषण और खुद का भविष्य रोशन करती रहती हैं ।

आज़ादी मिलने के बाद सत्तर के दशक में राजनीतिक पार्टियों ने सत्ता में अविच्छन्न रूप से कायम रहने के लिए बहुत सोचे समझे षडयंत्र के तहत भारतीयता को बांटने के लिए धर्म और जातियों के बाड़ों का निर्माण शुरू कर दिया । राजनीतिक पार्टियां के घुटे हुए घाघ जिस तफसील से धर्म और धर्मगत जातियों, उपजातियों, उपउपजातींयो की बारीक पेंचीदगियों, मज़बूरियों और संजीगदियो और गणित को जानते समझते है , उसकी आप और मैं कल्पना भी नही कर सकते । बाड़े बनने की देर भर थी, लोग खुद ही जाकर उन बाड़ों में घुस गए ।

एक पार्टी ने शाहबानों का फैसला पलटकर और मंदिर के दरवाजे खोलकर देश को बांटा तो दूसरी ने मंडल मंडल खेल हिंदुओं को । किसी ने तिलक तराजू की बात शुरू करके ब्राह्मण को हाथी पर बैठाया तो दूसरी ने हाथी के पैर को अजगर में लपेट दिया । एक पार्टी ने अयोध्या में गोली चलवा कर मुसलमानों को अपने बाड़े में गोलबंद किया तो दूसरी ने मस्जिद तुड़वा कर दो सीटों से पार्लियामेंट में इतनी अक्सिरियत कर ली मेजों पर हथेलियों की थाप देश के सारे हिंदुओं को सुनाई पड़ गयी ।

पढ़ा लिखा मध्यम वर्ग ब्लेक व्हाइट से कलर TV, पोस्टकार्ड से इंटरनेट, ट्रंक काल के सिर दर्द से 24/7 उंगलियों में नाचते स्मार्ट फोन, सेंसेक्स के ग्राफ, GDP के आंकड़ों, फास्टर कनेक्टिविटी, हवाई अड्डों, विदेशी उड़ानों वगैरा वगैरा को ही देश की तरक्की समझ घर से दफ्तर, दफ्तर से शॉपिंग मॉल , मल्टीप्लेक्स और घर के चक्रव्यूह में फंसा रहा ।

छुटभैय्ये नेताओं ने धर्म और जाति के नाम पर उल जलूल बयानों द्वारा सस्ती लोकप्रियता पाकर राजनीति में जो धंधा सेट करने की रवायत डाल दी है वो बहुत खतरनाक है । देश का कुछ भी हो उन्हें इसकी फिक्र ही नही है क्योंकि इनका पूरा सोच व्यक्तिगत स्वार्थों पर केंद्रित है । कोई किसी का गला काटने पर करोड़ों रुपये के इनाम की घोषणा करता है तो कोई करोड़ों को पाकिस्तान भेजने की । देश और राजनीति में ऐसे गैरजिम्मेदार लोगों की आवाज को दिन रात बढ़ा चढ़ा कर मीडिया कम्पीटिशन भी टी आर पी की दौड़ में अंधा होकर भाग रहा हैं। हम सब अच्छी तरह जानते और समझते है कि किसी भी जातिगत या धार्मिक तुष्टिकरण की जड़ में किसी का कल्याण नही बल्कि वोट बटोर कर सत्ता की कुर्सियों से चिपके रहने की ही मंशा होती है । अब राजनीति एक व्यस्थित व्यापार बन चुका है और उसका कॉरपोरेट लेवल पर उच्च दर्जे का मैनेजमेंट होता है । राजनीतिक प्रबंधन बिल्लो, झंडों , शराब की बोतलों और दो चार सौ रुपये की भेंट से बहुत आगे बढ़ कर लेपटॉप, स्मार्ट फोन को लांघता हुआ सोशल मीडिया के ज़रिये मुख़्तलिफ़ रंगों के ब्रांडस में तब्दील हो चुका है जबकि देश की बडी आबादी अभी भी हिन्दू मुस्लिम, खाप, गोत्र, ब्राह्मण है तो कौन सा ब्राह्मण, दलित है तो कौन सा वाला दलित, गुज्जर जाट आरक्षण जैसे विघटनकारी मुद्दों में ही उलझी है । बीच बीच में हम एकता में अनेकता या अनेकता में एकता, गंगा जमुनी तहज़ीब जैसी घिसी पिटी और उबाऊ लफ़्फ़ाज़ी भी सुन लेते है । पर सच्चाई यही है कि सत्ता के लालच में छुटभैय्ये नेताओं ने भारतीयता को खंडित खंडित कर ही दिया है ।

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बिल्कुल सही लिखा है... सच्चाई यही है कि आज की राजनीति बँटवारे की राजनीति है... लेकिन आम आदमी को भी तो ये समझना चाहिए...

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