माता - पिता के महत्त्व को समझें :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

09 जनवरी 2020   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (4448 बार पढ़ा जा चुका है)

माता - पिता के महत्त्व को समझें :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म भारतीय संस्कृति का मूल है | भारतीय संस्कृति , संस्कार एवं सभ्यता का उद्गम स्रोत सनातन धर्म ही है | सनातन धर्म नें मानव मात्र के लिए एक सशक्त मार्गदर्शक की भूमिका निभाई है | अनेक मान्यताओं , परंपराओं के साथ ही हमारे यहां माता-पिता का विशिष्ट स्थान बताया गया है | यदि जीवन में माता पिता को विशेष महत्वपूर्ण बताया गया है तो उसका एक विशेष कारण भी है | मनुष्य अपने जीवन काल में अनेक लोगों से संबंध बनाता है परंतु उसका यह संबंध इस धरती पर जन्म लेने के बाद उसके क्रियाकलापों के अनुसार बनते हैं परंतु मनुष्य का अपने माता-पिता से संबंध तो जन्म के पूर्व ही बन जाता है | इसीलिए माता पिता को सृष्टि का मूल मानते हुए उन्हें जीवित मनुष्य ना कह कर देवता की संज्ञा दी गई है | जीव का सबसे पहला संबंध माता एवं पिता से ही बनता है यही कारण है किस सनातन संस्कृति में माता-पिता को सर्वोच्च स्थान दिया गया है | मां के त्याग को भला कैसे भुलाया जा सकता है ? जन्म देने में जो असहनीय कष्ट वह सहन करती है उसकी अभी बात छोड़ दिया जाए तो उसके पहले जब जीव गर्भ में आता है तो उस गर्भ को सुरक्षित रखने के लिए उसके किए गए त्याग की भरपाई कर पाना कठिन ही नहीं बल्कि असंभव है | यदि किसी से कह दिया जाय कि एक फूल नौ दिन तक हाथ में लिए रहे और वह फूल मुरझाने ना पाए तो शायद मनुष्य के लिए यह प्रतीत होगा , परंतु मां अपने शिशु को नौ महीने तक अपने पेट में रखकर प्रसन्नता पूर्वक उस भार का वहन करती है | माता पिता जन्मदाता कि नहीं जीवनदाता भी होते हैं | जब बालक रात में रोने लगता है तो माँ खिन्न नहीं होती बल्कि उसे पुचकार कर , दुलार कर , लोरियां सुनाकर सुलाने का प्रयास करती है | अपने बालक को सुलाने के लिए माँ ने कितनी रातें जागकर बिताई होगीं , समाज में स्थापित करने के लिए एवं सन्तान का पेट भरने के लिए पिता ने कितने दिन उपवास किया होगा यह जान पाना कठिन ही है | जिस प्रकार खेत में बीज डाल देने के बाद समय-समय पर उनमें खाद पानी की आवश्यकता होती है उसी प्रकार माता पिता एक किसान की भांति समय-समय पर अपने संतान की आवश्यकताओं का ध्यान रखते हुए उनका विकास करने में सतत प्रयत्नशील रहते हैं | माता पिता के अनंत उपकार अपनी संतान के ऊपर होते हैं जिन्हें भुला देना कृतघ्नता ही होती है , माता - पिता के अनंत उपकारों एवं नि:स्वार्थ प्रेम के कारण ही सनातन संस्कृति में माता-पिता को सर्वोच्च स्थान दिया गया है |*


*आज का युग परिवर्तित हुआ है | सनातन संस्कृति से अलग होकर स्वयं को स्वतंत्र मानकर जीवन यापन करने वाले आज के युवा अपने माता-पिता को वह सम्मान नहीं दे पाते हैं जो उनको मिलना चाहिए | प्राय: समाज में देखा जा रहा है कि आज माता पिता अपनी संतानों के अनादर और उपेक्षा के पात्र बनते जा रहे हैं | उपेक्षित जीवन ही होता तब भी ठीक था परंतु उपेक्षा का स्तर इतना ज्यादा बढ़ गया है कि लोग अपने वृद्ध माता-पिता को वृद्धाश्रम में भी छोड़ कर आ रहे हैं | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" आज के वृद्ध माता - पिता की इस दुर्दशा को देखकर के यही कहना चाहूंगा कि आज की युवा पीढ़ी ने शिक्षा भले बहुत ज्यादा ग्रहण कर ली हो परंतु यदि उनके माता-पिता यह दुर्दशा है तो यह उनके शिक्षित होने का उदाहरण नहीं बल्कि घृणित की मानसिकता का उदाहरण है | जो अपने जीवित माता-पिता के अस्तित्व को मृत मान लेते हैं उनका जीवन पशु के समान ही है | आज के युवक-युवतियों की प्रायः शिकायत होती है कि हमारे माता-पिता का स्वभाव नहीं ठीक है , वे अनपढ़ हैं या फिर उनका आचरण नहीं ठीक है | कुछ लोग तो यह भी कहकर अपने माता-पिता को ठुकरा देते हैं कि मेरी मां का स्वभाव मेरी पत्नी से नहीं मिलता है तो एक साथ निर्वाह कैसे होगा ? इसे आधुनिक शिक्षा माना जाय या कि मनुष्य की मूर्खता ? जिस शिक्षा एवं ज्ञान के बल पर आज का मनुष्य अपने माता पिता को अनपढ़ एवं गंवार कह रहा है उस ज्ञान और शिक्षा को दिलाने के लिए माता-पिता ने कितना परिश्रम किया होगा यह भी विचार अवश्य करना चाहिए | समय-समय पर बुरी संगत एवं बुराई से बचा कर के एक योग्य पुरुष बनाने में माता पिता ने अपना सब कुछ न्योछावर करने का प्रयास किया है | यदि माता पिता ने बचपन से ध्यान ना दिया होता , सन्तान के अंदर संस्कार ना पिरोए होते तो आज लोग शिक्षित होकर के समाज में ना स्थापित हो पाते , परंतु आज इसका ध्यान कोई नहीं देना चाहता है | यद्यपि संसार में अभी भी माता-पिता का सम्मान करने वाले हैं परंतु उनकी संख्या बहुत कम दिखाई पड़ती है क्योंकि यदि न ऐसा होता तो वृद्धाश्रम भरे ना मिलते | अपने बच्चों के द्वारा उपेक्षित एवं पीड़ित अनेक माता-पिता कराहकर यह भी कह देते हैं कि ऐसे पुत्र को जन्म देने से अच्छा तो हम नि:संतान ही ठीक थे | ऐसी स्थिति में मैं यही कहना चाहूंगा कि अपने वृद्ध माता-पिता का सम्मान करो क्योंकि आज वह बृद्ध हैं तो कल तुमको भी वृद्ध होना है | जिस दिन इस बात का ध्यान हो जाएगा उसी दिन लोग अपने माता पिता का सम्मान करने लगेंगे | मनुष्य को अपनी संतान पर बड़ा गर्व होता है | विचार कीजिए कि जो लोग आज अपने माता पिता का तिरस्कार करके अपनी संतान पर गर्व कर रहे हैं कि वृद्धावस्था में वह उनकी सेवा करेगी तो उन मूर्खों को यह भी विचार करना चाहिए कि यही विचार तो उनके माता-पिता ने भी उनके प्रति किया होगा |*


*जहां माता-पिता को अपनी संतान से सामंजस्य बनाना चाहिए वही संतानों को भी चाहिए कि अपने माता पिता को पिछड़ा , अनपढ़ , गंवार कहकर के उनकी उपेक्षा ना करें बल्कि उनके अनुभवों का लाभ लेते हुए उन्हें यथोचित सम्मान एवं सत्कार दें | तभी यह जीवन धन्य हो सकता है |*

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