लोहड़ी :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

13 जनवरी 2020   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (379 बार पढ़ा जा चुका है)

लोहड़ी :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*संपूर्ण विश्व में यदि अनेकता में एकता का दर्शन करना है तो वह हमारे देश भारत में ही मिलता है | यहां राष्ट्रीय एवं धार्मिक त्योहारों के साथ-साथ आंचलिक त्योहारों की भी धूम वर्ष भर मची रहती है | समय-समय पर अनेक त्यौहार हमारे देश भारत में मनाए जाते हैं और इन त्योहारों की विशेषता यह है कि इन सभी त्योहारों से कोई न कोई इतिहास अवश्य छुपा रहता है | मकर संक्रांति कि एक दिन पहले मुख्य रूप से हरियाणा एवं पंजाब प्रांत में मनाए जाने वाला "लोहड़ी पर्व" इन्हीं पर्वों में से एक है | ऐसी मान्यता है कि अपने पिता प्रजापति दक्ष के द्वारा उपेक्षित एवं अपने पति भूतभावन भोलेनाथ के द्वारा पत्नी रूप में स्वीकार न किए जाने की प्रतिज्ञा से दुखी भगवती आज के ही दिन अपने पिता के यज्ञ में अपने शरीर की आहुति दे दी थी , इसीलिए आज भी लोहड़ी का पर्व मनाने वाले आज के दिन विवाहित बहन - बेटियों को बड़े आदर के साथ निमंत्रण देकर अपने घर बुलाते हैं और उनका विधिवत आदर सत्कार विभिन्न प्रकार के पकवानों से करते हैं | वहां के लोगों की ऐसी मान्यता है कि पूर्वकाल में महाराज दक्ष के द्वारा किये गये अपनी पुत्री के अपमान का प्रायश्चित आज भी किया जा रहा है | इस प्रकार पौराणिक संदर्भ लेकर बड़े हर्षोल्लास के साथ लोहड़ी का पर्व हमारे देश भारत में मनाया जाता है | भारत की संस्कृति बहुत ही दिव्य रही है भूल हो जाना मानव का स्वभाव है परंतु अपनी भूल का प्रायश्चित करने का इतिहास भी हमारे ही देश में प्राप्त होता है | दक्ष प्रजापति के द्वारा की गई भूल का प्रायश्चित आज भी लोहड़ी पर्व के दिन हम भारतीयों के द्वारा किया जाता है यही हमारी दिव्यता एवं विशेष विशेषता रही है | हमारे भारत देश में प्रत्येक त्यौहार के विशेष व्यंजन होते हैं | लोहड़ी में गजक , रेवड़ी , मुंगफली आदि खाई जाती हैं और इन्ही के पकवान भी बनाये जाते हैं | इसमें विशेषरूप से सरसों का साग और मक्का की रोटी बनाई जाती हैं और खाई एवम प्यार से अपनों को खिलाई जाती हैं |*


*आज जहां संपूर्ण विश्व आधुनिकता की चपेट में आकर के अपनी सांस्कृतिक विरासत को भूलता जा रहा है वही आज भी भारत ने अपनी सांस्कृतिक विरासत को बचा कर रखा है | आदिकाल से हमारा देश भारत कृषि प्रधान देश रहा है आज संपूर्ण देश में मनाया जाने वाला लोहड़ी पर्व कृषि आधारित त्यौहार भी कहा जाता है | लोहड़ी में रबी की फसले कट कर घरों में आती हैं और उसका हर्ष मनाया जाता हैं | किसानों का जीवन इन्ही फसलो के उत्पादन पर निर्भर करता हैं और जब किसी मौसम के फसले घरों में आती हैं हर्षोल्लास से उत्सव मनाया जाता हैं | लोहड़ी में विशेष रूप से इन दिनों गन्ने की फसल बोई जाती हैं और पुरानी फसले काटी जाती हैं | इन दिनों मुली की फसल भी आती हैं और खेतो में सरसों भी आती हैं | इसके साथ ही यह ठण्ड की बिदाई का त्यौहार माना जाता हैं | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" बताना चाहूंगा कि आज मनाये जाने वाले लोहड़ी पर्व में मात्र पौराणिक संदर्भ ही नहीं अपितु ऐतिहासिक संदर्भ भी निहित है | अकबर के शासन काल में पंजाब प्रांत के सरदार थे दुल्ला भट्टी जी | उन्होंने संदलबार (वर्तमान में पाकिस्तान का शहर) में देह व्यापार के लिए लगने वाले लड़कियों के बाजार का विरोध तो किया ही साथ ही वहाँ बेचने के लिए लाई गयी लड़कियों को वहां से बचाकर के सम्मान पूर्वक उनका विवाह भी करवाया | वह दिन आज का ही दिन था अर्थात मकर संक्रांत के एक दिन पहले , इसलिए इसे विजय पर्व के रूप में भी मनाया जाता है और दुल्ला भट्टी जी की शौर्यगाथा गीतों में गुंजायमान होती है | आज लोहड़ी का स्वरूप बदल गया है हर्ष एवं उल्लास तो वैसा ही होता है परंतु पूर्व काल के गांव के उल्लास ने अब पार्टी का रूप ले लिया है | जहां लोग इस पर्व को आधुनिकता के साथ मनाते हुए सोशल मीडिया के माध्यम से एक दूसरे को बधाई संदेश प्रेषित करते हैं | कुछ भी हो पौराणिक एवं ऐतिहासिक संदर्भ स्वयं में समेटे हुए लोहड़ी का पर्व बहुत ही दिव्य एवं आकर्षक है |*


*हमारे देश भारत की संस्कृति संपूर्ण विश्व में फैली हुई है | हमारे लिए गर्व का विषय है कि आज भारत के समस्त त्योहार विदेशों में भी मनाए जाते हैं जिससे विदेशी भी दिव्य भारतीय संस्कृति से परिचित हो रहे हैं |*

लोहड़ी :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

अगला लेख: अहंकार से बचने का उपाय :-- आचार्य अर्जुन तिवारी



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
05 जनवरी 2020
*भारत देश आदिकाल से अपनी संस्कृति , सभ्यता एवं संस्कारों के लिए जाना जाता रहा है | समय-समय पर यहां अनेकों महापुरुषों ने जन्म लेकर समाज को नई दिशा दिखायी है | समय - समय पर इस पुण्यभूमि में ईश्वर ने अनेकानेक रूपों में अवतार भी लिया है | इन्हीं महापुरुषों (भगवान) में एक थे रघुकुल के गौरव , चक्रवर्ती सम
05 जनवरी 2020
02 जनवरी 2020
*इस सृष्टि का सृजन परमात्मा ने पंच तत्वों को मिलाकर के किया है , यह पांच तत्व मिलकर प्रकृति का निर्माण करते हैं | प्रकृति एवं पुरुष मे ही सारी सृष्टि व्याप्त है , पुरुष के बिना प्रकृति संभव नहीं है और प्रकृति के बिना पुरुष का कोई अस्तित्व भी नहीं है | इस प्रकार नर नारी के सहयोग से सृष्टि पुष्पित पल्
02 जनवरी 2020
31 दिसम्बर 2019
*आदिकाल में जब सृष्टि का विस्तार हुआ तब इस धरती पर सनातन धर्म के अतिरिक्त और कोई धर्म नहीं था | सनातन धर्म ने मानव मात्र को अपना मानते हुए वसुधैव कुटुंबकम की घोषणा की जिसका अर्थ होता है संपूर्ण पृथ्वी अपना घर एवं उस पर रहने वाले मनुष्य एक ही परिवार के हैं | सनातन धर्म की जो भी परंपरा प्रतिपादित की
31 दिसम्बर 2019
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x