किला और वो खूबसूरत ऑस्ट्रियन लड़की - दिनेश डॉक्टर

13 जनवरी 2020   |  दिनेश डॉक्टर   (405 बार पढ़ा जा चुका है)

किला और वो खूबसूरत ऑस्ट्रियन लड़की - दिनेश डॉक्टर

कल से आगे -

नदियों, नहरों से मुझे बहुत लगाव है । पानी का हर स्रोत मुझे बांध लेता है । जिस शहर के बीच से कोई नदी या नहर निकलती है मन होता है कि बस यहीं बस जाऊं । भले ही फ्रांस में सीन नदी के किनारे बसे शहर हों या जर्मनी में बेहद खूबसूरत और चौड़ी राइन नदी के किनारे बसे शहर, ये हमेशा मुझे अंदर तक छूते रहते हैं । कभी मेरे ऋषिकेश की गंगा भी बहुत ही खूबसूरत नदी थी पर दुर्भाग्य से जिस तरह जगह जगह गंदगी के सीवर बिना रोकटोक इसके किनारे बसे कस्बों शहरों से इसमें गिर रहे हैं, इसका भविष्य भी धीरे धीरे यमुना की तरह गंदे नाले में तबदील होने के अलावा कुछ नज़र नही आता ।

साल्ज़ाश नदी के दूसरी तरफ एक पहाड़ी पर साल्जबर्ग का प्राचीन भव्य किला पीछे ढलते सूर्य की रोशनी में चमक रहा था । लगभग एक हज़ार बरस पहले बनने शुरू हुए साल्जबर्ग कासल यानी किले को इतिहास के बहुत संघर्षमय दौर से गुजरना पड़ा । सैंकड़ो बार बहुत कारणों से काम बंद हुआ , फिर शुरू हुआ, फिर बन्द हुआ और सैंकड़ो बरसों में जाकर पूरा हुआ । पूर्वी और पश्चिमी दोनों ही यूरोप में ऐसा ही मिलता जुलता इतिहास बहुत सारे भव्य चर्चों, खूबसूरत पुलों और महत्वपूर्ण भवनों का है ।

नदी पर बने हेलब्रुन पुल के इस तरफ ही एक सड़क नदी के साथ साथ चल रही थी । मैं सीढिया उतर कर उसी सड़क पर आ गया । यह सड़क सिर्फ साइकिल सवारों और पैदल चलने वालों के लिए ही थी । गहन ट्रैफिक से हमेशा व्यस्त रहने वाला हेलब्रुन पुल पार किया । दांयी तरफ ऊपर जाकर साल्जबर्ग किले को जाने वाला रास्ता चढ़ रहा था । बांयी तरफ पैदल का रास्ता था और दांयी तरफ ट्रेक ट्रेन वाला एस्केलेटर । टिकट ज्यादा महंगी नही थी । वापसी में क्योंकि ढलान का रास्ता था तो सिर्फ एक तरफा टिकट खरीद कर ऊपर पहुँच गया । ऊपर पहाड़ी पर कलात्मक ढंग से बने लगभग एक हज़ार बरस पुराने खूबसूरत प्राचीन साल्जबर्ग किले की बनावट को देखकर मन प्रसन्न हो गया । किले की प्राचीर से नीचे पूरा साल्जबर्ग शहर और सांप की तरह बल खाती और शहर को लिपटी धूप में चमकती सालज़्बाश नदी नज़र आ रही थी । हर एंगल से तस्वीरे लेता रहा । जब से स्मार्ट फोन्स में कैमरे के ऑप्शंस आने शुरू हुए हैं और उनकी तकनीकी गुणवत्ता में अच्छी खासी प्रगति हो गयी है तब से बड़े कैमरे ले जाने का झंझट ही नही रहा । मुझे याद है कि अस्सी के दशक में जब मैंने पहली विदेश यात्रा की थी, उस समय 36 फोटुओं वाली रील आती थी । बहुत सोच समझ कर फोटुएं खींचनी पड़ती थी क्योंकि रीलें धुलवाने, डेवलप करवा कर प्रिंट करवाने का सिरदर्द और खर्च अच्छा खासा होता था ।
अब तो एक स्मार्ट फोन के मेमोरी कार्ड में हजारों की तादाद में फोटुएं खींच कर सेव कर सकते है, बिना किसी फिक्र के । और उन्हें लेपटॉप कम्प्यूटर में आराम से ट्रांसफर कर सकते हैं, टेलीविजन की बड़ी स्क्रीन पर देख सकते हैं तो प्रिंट करवाने की जहमत भी कौन उठाये ।

साल्जबर्ग किले में बहुत पुराने और महत्वपूर्ण कक्ष, पुरानी पेंटिंग्स, पुराने फर्नीचर, पुरानी सज्जाएँ और किले से नीचे की बस्ती को निहारने वाले भव्य गवाक्ष और झरोखे थे । किले के दांयी तरफ साल्जबर्ग की वादी के पार उत्तर पश्चिम में झकाझक सफेद बर्फ से ढकी पहाड़ियों की पूरी श्रृंखला थी । पूरा दृश्य ही मनोहर था । हालांकि आज सुबह तीन बजे उठा था और रात में भी बड़ी उचटती उचटती नींद आयी थी और साथ में लंबे सफर की थकान भी थी पर पूरा दृश्य सारी थकान दूर कर मन को तरोताज़ा कर गया । वहीं एक तरफ एक बड़ा टुरिस्टिक टाइप का रेस्टोरेंट था । दिल किया कुछ पी लिया जाए पर मीनू कॉर्ड में रेट्स देख कर हौसला जवाब दे गया । टूरिस्म का असली मज़ा लेना हो तो सस्ते पर साफ सुथरे होटलों में रहें और महंगे टुरिस्टिक रेस्तरां से दूर ही रहें और जहां तक सम्भव हो टेक्सियों, बसों का इस्तेमाल कम से कम करके पैदल ही सफर करते हुए शहर से परिचित होने का मज़ा लें ।

खैर सब कुछ देखते देखते आभास ही नही हुआ कि धीरे धीरे अंधेरा घिर आया है और किला वीरान सा हो गया है । सब कुछ देख ही लिया था तो विचार हुआ कि अब नीचे शहर की तरफ उतरा जाए । नीचे जाने के रास्ते का कोई साइनबोर्ड ही नज़र नही आया । इधर उधर कई चक्कर लगाए पर रास्ता ही नही दिखा । वापस ट्रेन ट्रेक एस्केलेटर की तरफ गया तो वो भी बंद हो चुका था और वहां ताला लगा था । थोड़ी देर को संशय की स्थिति बन गयी कि क्या करूं । वापस रेस्टोरेंट की तरफ चलना शुरू ही किया था कि उनसे ही वापसी का रास्ता पूछा जाएगा कि सामने से फॉर्मल ऑफिस ड्रेस में एक लम्बी सी लड़की आती दिखाई दी । सोचा कि शायद ये यहीं कार्यरत होगी तो उसी को रोक कर नीचे वापस जाने का रास्ता पूछा तो उसने बताया कि वो भी मेरी ही तरह परेशान हैरान काफी देर से इधर उधर चक्कर लगाती नीचे उतरने का रास्ता तलाश कर रही है ।

अब दोनों ने मिलकर तलाश किया तो एक पतली सी अंधेरी गली की तरफ से रास्ता मिल ही गया और आपसी परिचय प्राप्त करते बतियाते हम दोनों नीचे उतरने लगे । उत्साह और आत्मविश्वास से लबालब छब्बीस बरस की मारग्रेट लम्बी स्वस्थ तगड़ी लड़की थी और विएना में एक वकील के साथ कार्यरत थी । कार्य के ही सिलसिले में आज ही सुबह विएना से साल्जबर्ग आयी थी और अगले रोज़ बाकी काम निबटा कर वापस विएना लौट जाने वाली थी । यह पता लगते ही कि मैं साल्जबर्ग से विएना जाने वाला हूँ , मेरे निवेदन पर उसने मुझे विएना के प्रमुख दर्शनीय स्थलों के बारे में लिस्ट बना कर देने का आश्वासन दिया ।

मेरे निमंत्रण पर नीचे उतर कर वहीं पास ही में हम एक रेस्तरां में बैठ गए और बतियाने लगे । मैंने अपने लिए स्कॉच और मार्ग्रेट ने अपने लिए रेड वाइन मंगवाई । मैंने उसे अपनी पत्नी और बेटी के बारे में बताया और उसने मुझे अपने भाई बहिनो, माँ और मंगेतर मार्टिन के बारे में । तीस बरस का मार्टिन इंडस्ट्रियल सॉफ्टवेयर डेवलपर था । मार्ग्रेट को यात्राओं का खासा शौक था और अभी कुछ महीने पहले ही अपने मंगेतर के साथ न्यूज़ीलैंड घूम कर आई थी । भारत के बारे में भी जानने की मार्ग्रेट को वहुत रुचि थी । कागज और पैन हम दोनों के ही पास नही था । वेटर को निवेदन कर मंगवाया गया । मार्ग्रेट ने बड़े उत्साह से बारह महत्वपूर्ण स्थलों की एक विस्तृत लिस्ट, उन सब स्थलों की खूबियों के साथ बना कर दी, अपना टेलीफोन नम्बर भी लिखा और वायदा लिया कि विएना पहुंच कर मैं उसे ज़रूर फोन करूंगा । अब तक थकावट, नींद की खुमारी और स्कॉच के असर से मेरी आँखें बोझिल होने लगी थी । मार्ग्रेट से क्षमा मांग कर मैंने विदा ली और होटल के रास्ते मे ही एक स्टोर से सेन्डविच खरीद कर उसे खाते खाते होटल की तरफ चल पड़ा ।

बाकी कल ....

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