मकर संक्रान्ति का रहस्य :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

15 जनवरी 2020   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (409 बार पढ़ा जा चुका है)

मकर संक्रान्ति का रहस्य :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस सृष्टि में समस्त चराचर जगत को जीवन प्रदान करने भगवान सूर्य निरंतर चलायमान हैं | अपनी दैनिक यात्रा में वे कभी उत्तरायण तो कभी दक्षिणायन हुआ करते हैं | जिस प्रकार मनुष्यों के लिए दिन एवं रात्रि का विधान ब्रह्मा जी ने बनाया है उसी प्रकार देवताओं के लिए दिन - रात्रि का चयन हुअा है | जब भगवान सूर्य दक्षिणायन होते हैं तो देवताओं की रात्रि मानी जाती है और इस समय कोई भी शुभकार्य नहीं किया जाता है | दक्षिणायन का समय व्यतीत कर जब सूर्यदेव मकर राशि में प्रवेश करते हैं तो देवताओं की सुबह होकर उनके दिन प्रारम्भ हो जाते हैं और सारे शुभकार्य प्रारम्भ हो जाते हैं | सूर्य जब एक राशि से दूसरी राशि में जाते हैं तो उसे संक्रांति कहा जाता है | वैसे तो वर्षभर में बारह संक्रान्तियां होती हैं परंतु मकर संक्राति का इन सबमें विशिष्ट स्थान है | मकर संक्रान्ति सम्पूर्ण सृष्टि में जीवन का संचार करने वाले भगवान सूर्य की उपासना का पर्व तो है ही साथ यह जन आस्था एवं लोकरूचि का पर्व भी है | आज के दिन प्रात:काल नदियों में स्नान करने का विशेष महत्व है ऐसी मान्यता है कि मकर संक्रान्ति के दिन नदियों में होने वाली वाष्पन क्रिया से अनेक प्रकार के रोग नष्ट हो जाते हैं | सूर्य के उत्तरायण होने के महत्व को अनेक शास्त्रों में देखा जा सकता है | ऐसी हमारी मान्यता रही है कि प्रकाश अर्थात उत्तरायण में इस पंचभौतिक शरीर का त्याग करने वाला पुनर्जन्म नहीं लेता है वहीं अन्धकार अर्थात दक्षिणायन में शरीर का त्याग करने वाले व्यक्ति को पुन: जन्म लेना पड़ता है | इसी तथ्य को आधार बनाकर पितामह भीष्म शरशैय्या पर तब तक पड़े रहे जब तक सूर्यदेव उत्तरायण नहीं हो गये | सूर्य के उत्तरायण होने के बाद ही उन्होंने अपने प्राणों का त्याग किया | मकर संक्रान्ति के महत्व को मात्र पुराणों ने ही नहीं बल्कि विज्ञान ने भी महिमामण्डित किया है | आज के ही "खिचड़ी पर्व" भी लगभग पूरे भारत में भिन्न - भिन्न नामों से मनाया जाता है |*


*आज के वर्तमान युग में जहां धीरे-धीरे लोगों ने पौराणिक मान्यताओं को मानना लगभग बंद कर दिया है और विज्ञान को ही सब कुछ मानने लगे हैं | ऐसे लोग आज के दिन खिचड़ी भी नहीं मनाना चाहते हैं जबकि खिचड़ी पर्व मान्यता को विज्ञान ने भी स्वीकार किया है | यदि ध्यान दिया जाय तो खिचड़ी पर्व अनेकता में एकता का प्रतीक बनकर एक दिव्य संदेश प्रसारित करती है | अनेक प्रकार की सामग्रियों एक में ही मिलाकर बनाने को खिचड़ी कहा जाता है , वही विज्ञान का भी मानना है खिचड़ी पाचन को दुरुस्त रखती है | अदरक और मटर मिलाकर खिचड़ी बनाने पर यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है और अनेक प्रकार के संक्रमण को तोड़ने में सहायक होती है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" खिचड़ी पर्व की मान्यता पर यही कहना चाहूंगा कि जिस प्रकार खिचड़ी में अनेक सामग्रियां मिलकर एक हो जाती है उसी प्रकार भिन्न भिन्न संस्कृति या मिलकर हमारे देश भारत का निर्माण करती है | ऐसी मान्यता है कि आज के दिन मुगलों से लड़ते हुए गुरु गोरखनाथ के योगियों ने दोपहर में समय ना मिलने के कारण अनेक प्रकार के भोजन ना बना करके सभी सामग्रियां एक में डालकर के एक नए पकवान को बनाया जिसे खिचड़ी कहा गया | मकर संक्रांति एवं खिचड़ी पर्व को भारतवर्ष के लगभग सभी प्रांतों में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है | छत्तीसगढ़ , गोवा , उड़ीसा , हरियाणा , बिहार , झारखंड , आंध्र प्रदेश , तेलंगाना कर्नाटक , केरल , मध्य प्रदेश , महाराष्ट्र , मणिपुर , राजस्थान , उत्तर प्रदेश , उत्तराखंड , पश्चिम बंगाल और जम्मू आदि में इसे "मकर संक्रांति" कहा जाता है तो तमिलनाडु में "ताई पोंगल" एवं "उझवर तिरुनल" के नाम से भी जाना जाता है | गुजरात में इसे "उत्तरायणी" , हरियाणा हिमाचल प्रदेश वा पंजाब में इसे "माघी" तो असम में "भोगाली बिहू" कश्मीर घाटी में "शिशुर सेंक्रांत" उत्तर प्रदेश और पश्चिम विहार में "खिचड़ी" , पश्चिम बंगाल में "पौष संक्रांति" कर्नाटक में "मकर संक्रमण" के रूप में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है | इस प्रकार पूरे भारत में मकर संक्रांति का पर्व भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता है और मनाया जाता है | भारतीय मान्यता स्वयं में दिव्य रही है इसे मानना ना मानना व्यक्ति का अधिकार है परंतु इससे बाहर भी नहीं जाया जा सकता है |*


*मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी बनाने खाने के पहले स्नान एवं दान का बहुत बड़ा महत्व है | सूर्य उपासना का यह पर्व जीवन में एक नई ऊर्जा का संचार करता है |*

अगला लेख: अहंकार से बचने का उपाय :-- आचार्य अर्जुन तिवारी



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
05 जनवरी 2020
*इस धरती पर जन्म लेने के बाद मनुष्य अपने सम्पूर्ण जीवनकाल में अनेकों लोगों से मिलता है जीवन के भिन्न - भिन्न क्षेत्र में भिन्न - भिन्न प्रकार के लोग मिला करते हैं जो कि जीवन में महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं | अनेक महत्त्वपूर्ण लोगों के बीच रहकर मनुष्य जीवन में सफलता - असफलता प्राप्त करता रहता है | जीवन
05 जनवरी 2020
31 दिसम्बर 2019
*आदिकाल में जब सृष्टि का विस्तार हुआ तब इस धरती पर सनातन धर्म के अतिरिक्त और कोई धर्म नहीं था | सनातन धर्म ने मानव मात्र को अपना मानते हुए वसुधैव कुटुंबकम की घोषणा की जिसका अर्थ होता है संपूर्ण पृथ्वी अपना घर एवं उस पर रहने वाले मनुष्य एक ही परिवार के हैं | सनातन धर्म की जो भी परंपरा प्रतिपादित की
31 दिसम्बर 2019
17 जनवरी 2020
*इस संसार में जन्म लेने के बाद मनुष्य के अनेकों मित्र एवं शत्रु बनते देखे गए हैं , परंतु मनुष्य अपने सबसे बड़े शत्रु को पहचान नहीं पाता है | मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु कहीं बाहर नहीं बल्कि उसके स्वयं के भीतर उत्पन्न होने वाला अहंकार है | इसी अहंकार के कारण मनुष्य जीवन भर अनेक सुविधाएं होने के बाद भी
17 जनवरी 2020
12 जनवरी 2020
*किसी भी राष्ट्र के निर्माण में युवाओं की मुख्य भूमिका होती है | जहां अपनी संस्कृति , सभ्यता एवं संस्कारों का पोषण करने का कार्य बुजुर्गों के द्वारा किया जाता है वहीं उनका विस्तार एवं संरक्षण का भार युवाओं के कंधों पर होता है | किसी भी राष्ट्र के निर्माण में युवाओं का
12 जनवरी 2020
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x