हेलब्रुन्न पैलेस और पानी का जादू : दिनेश डॉक्टर

15 जनवरी 2020   |  दिनेश डॉक्टर   (466 बार पढ़ा जा चुका है)

हेलब्रुन्न पैलेस और पानी का जादू : दिनेश डॉक्टर

कल से आगे ;


अच्छी गहरी नींद के अगली सुबह उठ कर खटाखट तैयार होकर होटल के रेस्तरां में मुफ्त का हल्का सा नाश्ता करने के बाद रिसेप्शन पर तहकीकात की तो अल्टास्टड होफव्रट होटल की खूबसूरत और समझदार रिसेप्शनिस्ट ने दो महत्वपूर्ण सुझाव दिए। पहला साल्जबर्ग कार्ड खरीदने का, जिसके द्वारा न सिर्फ शहर के भीतर समस्त पब्लिक ट्रांसपोर्ट में मुफ्त में यात्रा करने की सुविधा थी बल्कि अधिकांश दर्शनीय स्थलों की एंट्री भी मुफ्त थी । दूसरे जितना हो सके शहर को घूम कर पैदल देखने का, जिससे कि शहर के स्थापत्य और इतिहास को बारीकी और आराम से समझा जा सके ।

होटल के रिसेप्शन से ही साल्जबर्ग कार्ड खरीद लिया । तय किया कि आज साल्जबर्ग के उत्तर पश्चिम में स्थित बर्फीली चोटियों की तरफ जाया जाए । वहां ऊपर ऊंची चोटी पर जाने के लिए केबल कार की व्यवस्था थी । सुबह से ही तेज़ ठंडी हवा चल रही थी । गर्म फ्लीस के ऊपर जैकेट पहनी और पडिस्ट्रीयन स्ट्रीट की तरफ तेज़ कदमों से चल पड़ा । साल्ज़ाश नदी पार करते ही बांयी तरफ पुलिस चौकी के सामने से ही 25 नम्बर की बस पकड़नी थी और उसके अंतिम स्टाप पर उतर कर रोप वे केबल कार लेकर ऊपर पहाड़ी पर पहुंचना था । बस में बहुत सारे चीनी, ताइवानी और कोरियन पर्यटक थे । जब से साउथ ईस्ट एशिया में अभूतपूर्व औद्योगिक उन्नति के कारण आर्थिक सम्पन्नता बढ़ी है, हर घूमने लायक देश में चीनी, ताइवानी और कोरियन टूरिस्ट्स बहुत नज़र आते हैं ।

साल्जबर्ग शहर के भिन्न भिन्न स्टॉप्स पर सवारी लेती उतारती बस शहर से बाहर के खूबसूरत हरे भरे खेतों से निकल कर केबल कार के अंतिम स्टाप पर पहुंच ही गयी । उतर कर अंदर गया तो पाया कि तेज़ हवा की वजह से केबल कार आज बन्द है । और अधिक पूछने पर ज्ञात हुआ कि जब भी केबल कार की बिल्डिंग के ऊपर लगे तीन गुब्बारे जोर जोर से हिलने लगते हैं तो केबल कार का संचालन रिस्क की वजह से बंद कर दिया जाता है । क्योंकि ऊंचाई पर पहाड़ी दर्रों और घाटियों से गुजर कर इस हवा की तीव्रता बहुत बढ़ जाती है जिससे केबल कार के उलट कर भयंकर एक्सीडेंट होने खतरा पैदा हो जाता है ।

थोड़ी निराशा हुई पर कोई रास्ता नही था । जिस बस से हम आये थे , कुछ ही देर में वो ही बस शहर की तरफ वापस जाने वाली थी । बस स्टैंड पास ही था । और भी बहुत से टूरिस्ट थे । सब दौड़ कर वापस उसी बस में सवार हो गए । अगले स्टाप पर एक भारतीय सा दिखने वाला परिवार बस में सवार हुआ । परिवार में एक युवक, उसकी पत्नी और पांच बरस की एक लड़की थी । वो भी उत्सुकता से मुझे ही देख रहे थे । मैंने ही बातचीत शुरू की । परिवार नेपाल से था । युवक साल्जबर्ग में ही किसी प्रतिष्ठान में कार्यरत था । ऑस्ट्रिया में चार बरस पहले ही परिवार के साथ आकर बसा था । जब मैंने उसे कहा कि उसका परिवार कितना भाग्यशाली है कि इतने खूबसूरत देश में आकर बस गया है तो उसने कहा कि नेपाल तो और भी सुंदर है पर वहां दुर्भाग्य से काम के अवसर नही हैं इसलिए उसे यहां मजबूरन रहना पड़ रहा है । रास्ते में एक स्टाप पर काफी सवारियां उतर रही थी । पूछा तो पता लगा हेलब्रुन्न स्टाप है । पास ही चार सौ बरस पुराना बारोक शैली का हेलब्रुन्न पैलेस था । इससे पहले कि बस के स्वचालित दरवाजे खटाक से बंद होते , फुर्ती से नीचे उतर गया ।

कई सौ एकड़ में फैले विशाल हेलब्रुन्न पैलेस का निर्माण चार सौ बरस पहले साल्जबर्ग के प्रिंस आर्चबिशप मार्कस सिटीकस ने गर्मी के मौसम में सिर्फ और सिर्फ दिन के आमोद प्रमोद के लिए कराया था । इतने बड़े महल में एक भी सोने का कमरा या बेड रूम नही है । रात को पूरा राजसी परिवार और उसके मेहमान वापस साल्जबर्ग शहर में मुख्य किले में लौट जाते थे । महल के पास ही पहाड़ी पर एक मीठे जल का झरना था । उसी के जल को प्रयोग कर बहुत से सरप्राइज़ फव्वारों का निर्माण आर्चबिशप मार्कस सिटीकस ने कराया था । इसमे कोई शक नही कि आर्चबिशप मार्कस सिटीकस वाकई बहुत मजाकिया और दिलचस्प इंसान था । सारे फव्वारों में एक दिलचस्प एंगल है । जैसे कि बाग में बनी खाने की मेज के चारों तरफ बनी कुर्सियों में एक छेंक छुपा हुआ था । जैसे ही मेहमान भोजन समाप्त करते थे उसी छेंक द्वारा अचानक तेज़ रफ़्तार से निकलता पानी मेहमानों के नितम्बो को पानी से सरोबार कर देता था ।

ऐसे ही बहुत से चौंकाने वाले फव्वारे जगह जगह मौजूद थे । पानी के ही प्रेशर से चलने वाली एक विशालकाय झांकी भी थी । जिसमे सैंकड़ो छोटे छोटे इंसानी पुतले काम करते, वजन ढोते, परेड करते, आगे पीछे चक्कर काटते, ऑर्गन के संगीत पर नृत्य करते, चक्का चलाते और न जाने क्या क्या करते नज़र आते थे । यहां तक कि ऑर्गन भी पानी के बहाव से ही बज रहा था । चार सौ साल पहले पानी से चलने वाली तकनीक से ऐसी आश्चर्यचकित करने वाली झांकी की परिकल्पना और निर्माण देखकर कोई भी दांतो तले उंगली दबा ले । जैसे ही झांकी का शो समाप्त हुआ वैसे ही चारों तरफ छुपे हुए छेदों से निकलती पतली पतली पानी की धाराओं ने दर्शकों को भिगोना शुरू कर दिया । मैं पहले से ही फर्श पर पानी के निशानों को देख कर सावधान था तो बच गया ।

जिन्हें बरसों पुरानी हॉलीवुड की मशहूर फिल्म 'साउंड ऑफ म्यूजिक' याद है, उनकी जानकारी के लिए बता दूं कि उस फिल्म के बहुत बड़े हिस्से की शूट साल्जबर्ग के बेइंतहा खूबसूरत हरे भरे मैदानों और विशाल हेलब्रुन्न पैलेस के परिसर में ही हुई थी ।

पास ही थोड़ी चढ़ाई चढ़ कर पैलेस का ही एक छोटा सा म्यूजियम था । म्यूजियम तो खैर कोई खास नही था पर वहां ऊपर से नीचे की बिल्डिंग्स और हरे भरे पार्कों का दृश्य बहुत सुंदर और अद्भुत था । काफी देर वहीं बैठा सारी प्राकृतिक और मनुष्य निर्मित सुंदरता का रस पीता रहा । अब तक दोपहर के तीन बजे चुके थे । म्यूजियम के मैनेजर ने मेरे प्रार्थना करने पर केबल कार के ऑफिस में फोन कर पूछा कि केबल कार आज शुरू होगी या नही । पता चला कि हवा तेज़ होने के कारण आज ऑपरेशन की कोई संभावना नही है ।

और भी है .....

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