साल्जबर्ग में आखिरी दिन : दिनेश डॉक्टर

22 जनवरी 2020   |  दिनेश डॉक्टर   (438 बार पढ़ा जा चुका है)

साल्जबर्ग में आखिरी दिन : दिनेश डॉक्टर

केबल कार सुबह साढ़े सात बजे चलनी शुरू होती थी । नाश्ता सुबह साढ़े छह बजे ही लग जाता था । जल्दी जल्दी नाश्ता कर वापस पच्चीस नम्बर बस के स्टैंड पर पहुंच गया । बस भी जल्दी ही मिल गयी और साढ़े आठ बजे तक केबल कार स्टेशन पर पहुंच गया । मन प्रसन्न हो गया जब देखा कि केबल कार पर्यटकों को ऊपर ले जा रही है । हवा भी आज शान्त थी और आसमान खुला हुआ था । पर्वतों में नीचे से ऊपर जाने का अनुभव वाकई बहुत नूतन और आह्लादकारी होता है । टूरिस्टस, जिनमे बहुत सारे एक दिन पहले वाले ही कोरियन और चाइनीज लोग थे, आज भी लाइन में लगे सेल्फियां खींच रहे थे । केबल कार बड़ी थी और एक बार में पंद्रह से बीस लोग समा सकते थे । जहां एक ओर ज्यादातर जापानी पर्यटक बहुत सौम्य, विनम्र, शांत और अंतर्मुखी होते है वहीं दूसरी तरफ अधिकांश  कोरियन, चाइनीज और वियतनामी टूरिस्ट्स ठीक विपरीत होते हैं । 

केबल कार ऊपर उठनी शुरू हुई तो नीचे के दृश्य पेनारोमिक होते चले गए । धीरे धीरे पूरे साल्जबर्ग शहर का फैलाव और सिटी लाइंस नज़र आने लगी । थोड़ी देर बाद ही केबल कार बर्फ से ढकी चोटियों के बीच से गुजरने लगी । चारो तरफ सफेद झक्क बर्फ । कई जगह तो ऐसा भी लगा कि हाथ बढ़ा कर बर्फ समेट लो । बारह मिनट बाद सबसे ऊंची चोटी पर बने स्टेशन पर पहुंच कर केबल कार रुक गयी । परिचालक ने दरवाजा खोला तो खून जमा देने वाली हवा के हल्के से झौंके ने चेहरे को सुन्न कर दिया । बिल्डिंग से बाहर निकले तो चारों तरफ बस बर्फ ही बर्फ । दूर पहाड़ी पर एक दो लोग आइस स्केटिंग करते भी नज़र आये । सोचा कि बर्फ के रास्ते ऊपर चोटी तक पैदल चल कर जाया जाए । जैसे ही कदम बढ़ाए तो फौरन समझ आ गया कि बर्फ पर आइसिंग हो गयी है । बर्फ पर आइसिंग हो जाये तो खतरनाक रूप से फिसलन हो जाती है और उस पर चलना बहुत ही मुश्किल हो जाता है । एक कम उम्र की चाइनीज़ लड़की कुछ ज्यादा ही उत्साह में आगे बढ़ी तो दस कदम बाद ही धड़ाम से फिसल कर गिर गयी । वापस जल्दी उठने के चक्कर में तीन चार बार वापस फिसल कर गिरी । किस्मत से दांयी तरफ नही फिसली क्योंकि उस तरफ ढलान और गहरी खाई थी और मौत पक्की थी । हालांकि वहां पतली सी रेलिंग तो थी पर रेलिंग के बीच के गैप को देखकर मुझे शक था कि तेज़ फिसलते आदमी को वहां कोई सहारा मिलेगा । मेरा हौसला जवाब दे गया और मैं वापस बिल्डिंग की डेक पर बने केफिटेरिया में, जहां से पूरी घाटी का बड़ा सुंदर अवलोकन हो रहा था, आकर काफी पीने लगा । चीनी लड़की हौसले वाली थी । उसने हार नही मानी और जैसे तैसे गिरती पड़ती पहाड़ की चोटी पर पहुंच कर बड़े गर्वपूर्ण आनंद से सेल्फियां लेने लगी । 

मुझे याद हो आया ख्वाजा मीर दर्द का वो मशहूर शेर ;

सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ ।
ज़िंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहाँ ।।

मैं अपवादों की बात नही कर रहा पर मुझ जैसे सामान्य लोगों की एक उम्र ऐसी भी होती है जब अनाप शनाप खतरे लेने का हौसला पता नही कहाँ से आता है और फिर उम्र के ढलान पर एक वक्त ऐसा भी आता है कि बहुत सारे बेसिर पैर के भय घेरने लगते हैं । आज बर्फ की आइसिंग पर कदम फिसलते ही ऐसे ही भय ने मुझे कैफेटेरिया में हार मान कर काफी पीने बैठा दिया । अपने टूटे हौसले से रुबरु होकर अच्छा तो नही लगा पर ये सोचकर कि मैं अब कोई तीस पैंतीस साल का जवान पट्ठा नही बल्कि चौसठवें बरस में प्रवेश करने वाला अधेड़ व्यक्ति हूँ और अकेले ही यात्रा कर रहा हूँ और अगर खुदा ना खास्ता कुछ हो गया तो खामख्वाह लेने के देने पड़ जायेंगे, यही सोचकर चुपचाप काफी सुड़कने में ही भलाई समझी । आस पास की तस्वीरें उतारी और केबल कार पकड़कर नीचे लौट आया । बस छूटने ही वाली थी । 

समय से वापस साल्जबर्ग शहर के केंद्र में पहुंच गया । पास ही टूरिस्ट ऑफिस से पता चला कि पचास कदम पर ही मोज़ार्ट का घर है, जो कि अब एक म्यूजियम में तब्दील हो गया है । उसे भी देख लिया । मोजार्ट के कपड़े, कंघे, कुर्सी, बिस्तर, पियानो और वायलिन देखने में मेरी कोई खास रुचि नही थी, फिर भी अनमने भाव से बिल्डिंग में चक्कर लगा कर रसोई, सोने के कमरे, म्यूजिक रूम वगैरा देख लिए । मोजार्ट का संगीत जहां उसकी शाश्वत जीवन्तता का प्रतीक है तो ये सब प्रतीक उसकी मृत्यु की खबर दे रहे थे । थोड़ी ही देर में बाहर आ गया । हाँ ! कुछ पुराने पारिवारिक चित्र और पेंटिंग्स को ज़रूर थोड़ी उत्सुकता से देखता रहा । 

साल्ज़ाश नदी के किनारे बसे इसी पुराने शहर के दूसरे छोर पर एक भव्य और खूबसूरत प्राचीन केथेड्रेल था । कुछ प्रार्थना जैसी हो रही थी । मैँ भी बन्द आंखों से शांत होकर बैठ गया । थोड़ी देर बाद वहां से निकल कर लव लॉक ब्रिज के पास से साल्ज़ाश नदी के किनारे बसे पुराने शहर का जल मार्ग से क्रूज़ कराने वाली एक बड़ी बोट में सवार हो गया। जो साल्जबर्ग कार्ड मैंने खरीदा था, यह क्रूज़ भी उसी में शामिल था । डेढ़ घंटे तक बड़ी बोट में सवार सभी टूरिस्ट्स क्रूज़ का मज़ा लेते रहे । दोनों क्रूज़ गाइड्स ने बड़ी अच्छी तरह जर्मन और अंग्रेजी भाषा में हर बिल्डिंग और रास्ते में पड़ने वाले सभी पुलों के बारे में बड़ी विस्तृत जानकारी दी । ज्यादातर पुल लगभग पांच सौ साल पुराने थे । बिल्डिंग्स भी हालांकि बहुत पुरानी ही थी फिर भी कई बार उनका जीर्णोद्धार हो चुका था । गाइड्स यह बताना भी नही भूले कि नदी के किनारे दूर तक बसे वे मकान शहर के सबसे महंगे इलाके में स्थित हैं और पुराने वक्त से ही उनमें बड़े अमीर व्यापारी और राज परिवार के खास लोग ही रहते आये हैं । 

धीरे धीरे एक मोड़ काट कर क्रूज़ बोट शहर की बस्ती से बाहर निकल आयी । अब साल्ज़ाश नदी की मीलों लंबी सीधी धार के ठीक सामने बर्फ से ढकी वही ऊंची पर्वत श्रंखला नज़र आ रही थी, जिस पर आज सुबह ही मै केबल कार द्वारा हो आया था । दृश्य बहुत सुंदर और अप्रतिम था इसीलिए सब पर्यटकों के कैमरे खटाखट हरकत में आ गए । मैंने भी अपने कैमरा फोन से कई तस्वीरें खींची । थोड़ा आगे जाकर क्रूज़ बोट वापसी की यात्रा पर रवाना हो गयी । इस बार गति थोड़ी तेज़ थी क्योंकि गाइड्स पहले ही सब कुछ दिखा चुके थे । वापस लव लॉक ब्रिज के पास पहुंचकर बोट के कैप्टन ने पर्यटकों के मनोरंजन के लिए बोट को कई बार तेज़ गति से गोल गोल उल्टा सीधा घुमा कर अच्छा खासा थ्रिल पैदा किया और बोट को धीरे धीरे किनारे लगा दिया ।

साल्जबर्ग में आज मेरी आखिरी शाम थी । कल सुबह दस बजे मुझे विएना के लिए ट्रेन पकड़नी थी । लगभग सारी खास खास जगहें देख ही ली थी । काफी देर नदी के किनारे इधर उधर घूम कर पुराने शहर को और गहराई से देखता रहा । थक गया तो वापस होटल आकर सो गया ।अगली सुबह जल्दी उठ कर पैकिंग कर ली । ऐसी यात्राओं में सामान जितना कम हो उतना ही सुभीता रहता है । तीन जोड़ी अंतर्वस्त्र या अंडर गारमेंट्स, तीन कमीज़ें, दो जोड़ी जुराब, एक अदद आल वेदर जैकेट और एक जीन बहुत है । पर्यटन का जज़्बा अच्छा जंचने दिखने का मोहताज नही होता । कपड़े ऐसे हों कि प्रेस वगैरा करने की ज़रूरत न हो । बस धोओ और पहन लो । कपड़े धोने सुखाने की मशीनें अक्सर मिल ही जाती हैं । अब तो जब से एयर बी एन्ड बी मतलब ऑनलाइन बेड एंड ब्रेकफास्ट सर्विस का कंसेप्ट आया है तो बड़ी सुविधा हो गयी है । किराया तो खैर होटल से कम होता ही है साथ ही कपड़े धोने की मशीन, फ्रिज, पूर्ण सज्जित रसोई की सुविधा भी मिल जाती है । विएना और प्राग, जो मेरे अगले मुकाम थे, वहाँ के लिए मैंने एयर बी एन्ड बी का ही आवास बुक कर लिया था । 

 ट्रेन स्टेशन क्योंकि पंद्रह बीस मिनट की पैदल की दूरी पर ही था, बैक पैक कमर पर लादा और आठ बजे ही होटल से चेक आउट कर निकल पड़ा । खूबसूरत साल्जबर्ग को छोड़ते हुए मन थोड़ा उदास सा हो आया । जब से मेरे महान भारत की जनसंख्या बेसाख्ता बढ़ी है और सोशल सेनिटेशन की जागरूकता के अभाव में जगह जगह कूड़े और गंदगी के भद्दे अनियंत्रित ढेरों के साथ साथ सामाजिक व्यवहार में बदतमीज़ी, भोंडेपन और भद्देपन का बोलबाला हुआ है तब से जैसे ही ऐसे खूबसूरत स्थलों पर पहुंचता हूँ , वहीं बसने का मन होने लगता है । खैर !!! यूरोप घूमना है तो ट्रेन से ही घूमने का मज़ा है । अपने देश में तो ट्रेन यात्राओं का सौम्यतापूर्ण रोमांस बेसाख्ता बढ़ती जनसंख्या की वजह से सालों पहले ही खत्म हो चुका है । भले ही बुलेट ट्रेन चला दीजिये या सुपर लक्जरी गाड़ियां, हर सरकारी चीज़ को मिस यूज़ करने की, उसे नष्ट करने, गंदी करने और उसमे चोरी करने की जो घटिया मानसिकता दिनों दिन बढ़ रही है , उसके चलते सब अच्छे प्रयास नैराश्यपूर्ण अवसाद की भेंट चढ़ जाते हैं ।

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आपने वास्तव में सारा साल्जबर्ग घुमा दिया, बहुत सुन्दर शब्दचित्र...

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