धर्म की आस्था पर हम सभी एक हैं

29 जनवरी 2020   |  सुखमंगल सिंह   (5911 बार पढ़ा जा चुका है)

धर्म की आस्था पर हम सभी एक हैं

"धर्म की आस्था पर हम सभी एक हैं"

धर्म की आस्था पर हम उड़े तो क्या हुआ ,

कबूतरों के पंख इस तरह काटे नहीं जाते |


यूं देखा जाय तो यह कटु सती है कि पूरा देश धर्मांधता और दुराग्रह के वातावरण की आंधी मेन फंस कर रह गया है | हाथवादियों और धर्मांध शक्तियों को खुश करने की नीति के कारण हमारी दशा गंभीर बन गयी है | धर्म -परायण जनता की बेचैनी देखि जा रही है |

जंबू कश्मीर मे मुस्लिम धर्मांध एक खतरनाक ताकत बनकर उभरे थे | इसका जबाब था हम चाहते तो इसका जबाब धर्मनिरपेक्षता और सहिष्णुता की ताकतों से दे सकते थे | जब तब इन्हीं शक्तियों से मजबूत होकर हमने जवाब दिया है | हमने सद्भावना के ध्वज को फहराया है |विश्व्बंधुत्व का परचम लहराया है |देश की वर्तमान परिस्थिति मे मिल बैठकर विचार करें | समाज के प्रत्येक धर्म के मतावलंबियों को इस संदर्भ मेन सोचना होगा -

हम हैं कहाँ ? जाती-धर्म के नाम पर हम कब तक टूटते रहेंगे !हमारी यह टूटन हमें कहाँ ले जा रही है | वस्तुत : देखा जाय तो हमारे राजनेताओं ने समय -समय पर तुष्टीकरण की राजनीति कर धर्म और जाति के नाम पर घिनौना खेल खेला है , उससे सामाजिक परिवेश अति दूषित हुआ है | हमें सड़ी-गली पुरानी मान्यताओं को तोड़ देना चाहिए तथा परस्पर कटुता बैरभाव का परित्याग कर मनीषियों के बताये मार्ग पर चलाने का संकल्प लेना चाहिए | राजा राममोहन राय ने एक ऐसी परंपरा की नीव डाली थी कि जिससे व्यक्ति की स्वतन्त्रता और समानता का आदर्श निहित था | परंपरा और धर्म के मायाजाल से हमें बाहर निकलना होगा | चाहे कोई भी धर्म हो ,संप्रदाय हो, पंथ हो, हमें उससे घृणा नहीं करनी चाहिए | सभी धर्मों का आदर करना चाहिये | हमें उनके मूल तत्वों को ग्रहण करना चाहिए | जिससे हमारे भेद मिट सकें | हिन्दू।मुस्लिम,सिख,ईसाई भेद के लिए कोई आधार नहीं है |इसमें दो राय नहीं कि हिन्दू मंदिरों मे पूजा करने जाते हैं मुसलमान मस्जिदों मे,तो ईसाई गिरजा घरों मे |इसका तात्पर्य यह नहीं कि वे समाज से अलग हैं | वे इसी समाज के अंग हैं इस पर किसी को आपत्ति नहीं करनी चाहिए |

उपन्यास सम्राट मुंसी प्रेमचंद ने ठीक ही कहा था कि हिन्दू और मुस्लिम दो विरोधी दलों मे विभाजित रहे है -यह कहना सती का गला घोंटना है | हम जिन्हें अपना शत्रु समझते हैं वे भी हमारे भाई हैं | हमें अपनी इच्छानुसार धर्म ग्रहण करने का अधिकार है किन्तु बलात इच्छा से बचना होगा | किसी धर्म विशेष की निंदा या बुराई नितांत अनुचित है |

ऊंच नीच का भेदभाव सामाज को खोखला कर देता है | हमारा देश धर्म निरपेक्ष राज्य है | यहाँ सभी धर्मों को महत्व प्राप्त है | सभी को अपनी अपनी ध्वजा फहराने का अधिकार है | आत्म सम्मान पर कुठाराघात नहीं करना चाहिए | हमें मिलजुलकर एक दूसरे के उत्थान के लिए प्रयत्न करना चाहिए | यह बात क्रिश्चियन ,ईसाई धर्मानुयायियों के लिए महत्वपूर्ण है | ईसाई धर्म के मानने वाले तो बस यही जानते हैं कि सब धर्म सामान है | दृष्टि अपनी है ,इच्छा अपनी है ,रीति अपनी है - फिर भेद-भाव कैसा ?

लोगों में सर्वधर्म -समभाव की भावना होनी चाहिए | सभी धर्म को अलग-अलग लोगों में प्रेम ,आस्था और विश्वास की भावना विकसित होगी | यही हमारा आदर्श होना चाहिए | हम सभी एक सर्वशक्तिमान के बन्दे हैं | सबका आदर होना चाहिए | इसी भावना में वसुधैव कुटुम्बकम का आदर्श एवं राष्ट्र -निर्माण ,कल्याण की भावना निहित है |

- सुखमंगल सिंह ,अवध निवासी

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सभी सुधी पाठकों और शब्दनगरी के प्रबंधन का आभार !

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