उम्र भर सफर में रहा : दिनेश डॉक्टर

03 फरवरी 2020   |  दिनेश डॉक्टर   (496 बार पढ़ा जा चुका है)

उम्र भर सफर में रहा : दिनेश डॉक्टर

अगली सुबह मार्ग्रेट का, जो मुझे साल्जबर्ग के किले से उतरते वक़्त टकराई थी और जिसने मुझे वियना की घूमने वाली जगहों की लिस्ट बना कर दी थी, फोन आ गया । जब मैंने बताया की मैं वियना में ही हूँ तो बहुत खुश हुई और दोपहर को लंच पर मिलने का प्रस्ताव दिया । मैं बहुत भाग्यशाली हूँ कि मुझे अपनी सारी विदेश यात्राओं में सब देशों के स्थानीय लोगों का बहुत स्नेह सम्मान मिला है । पिछले छत्तीस बरसों में अड़तालीस से ऊपर देशों की यात्राएं कर रहा हूँ , सैंकड़ो विदेशी शहरों में घूम चुका हूँ, हज़ारों विदेशियों से मिल चुका हूँ , उनके घरों में ठहर चुका हूँ पर आज तक एक भी बुरा अनुभव नही हुआ । उनके प्रेम और सौहार्द ने बार बार मुझे अंदर तक छुआ है और अभिभूत किया है ।

उसी दिन दोपहर तय समय और स्थान पर जब मार्ग्रेट को मिलने पहुंचा तो स्थानों के मिलते जुलते नामों की वजह से थोड़ी ग़लतफ़हमी हो गयी । मैं उसे कहीं और ढूंढ रहा था और वो कहीं और थी । खैर फाइनली बीस मिनट देर से जब हम मिले तो एक दूसरे को देख कर मोबाइल फोन्स टेक्नॉलजी का, जिसकी वजह से हम एक दूसरे को ढूंढ पाए, शुक्रिया अदा करते हुए हंसने लगे । मार्ग्रेट मुझे अपने आफिस ले गयी और वहीं आफिस कैंटीन में बैठ कर लंच किया । बात बात में जब उसने बताया कि उसका मंगेतर मार्टिन मुझे दो दिन बाद डिनर पर इनवाइट करना चाहता है तो बड़ा सुखद आश्चर्य हुआ । मार्ग्रेट ने मार्टिन से फोन पर बात करवाई और डिनर तय हो गया । सदा मुस्कराते हुए हैंडसम और सौम्य मार्टिन से डिनर पर मिलकर बहुत अच्छा लगा । भावुक लमहों में विदा लेते वक़्त मैंने दोनों को भारत यात्रा का निमंत्रण दिया और वादा लिया कि मुझे भी उनकी आवभगत करने का मौका मिलेगा ।

अगले सात दिनों में विएना में इतने म्यूजियम देखे, इतने पुराने किले और तकनीकी रूप से इतनी पुरानी पर उत्कृष्ट इमारते देखी और इतना घूमा देखा कि एक पूरी किताब उस पर आराम से लिखी जा सकती है। दुनियाभर के बहुत सारे म्यूजियम देख चुका हूँ और अब और नए म्यूजियम देखने में कुछ नया नज़र न आने की वजह से ऊब सी हो जाती है । प्रकृति और प्राकृतिक सौंदर्य जितना भी देख लूँ , मन ही नही भरता ।
एक बड़ी खास बात जो महसूस की वो ये कि ऑस्ट्रियन लोग स्वभाव से बहुत बिंदास, खुले दिल के और गर्मजोश होते हैं । संगीत और नृत्य के बहुत प्रेमी होते हैं । जम कर खाते पीते है और स्वास्थ्य के प्रति भी बहुत सजग रहते हैं । मैं स्विस और नॉर्वेजियन लोगो के बारे में ऐसा नही कह सकता जो ज्यादातर स्वभाव से शुष्क और ठंडे होते है और जल्दी से आप से घुलते मिलते नही हैं । दरअसल पूरे पूर्वी यूरोप की, चाहे वो हंगरी हो या चेकोस्लोवाकिया, पोलैंड हो या क्रोएशिया - बात ही कुछ और है । हो सकता है मैं ग़लत होऊं पर मुझे लगता है कि मौसम का असर लोगों के स्वभाव पर पड़ता है । जिन जगहों में हमेशा बर्फ पड़ी रहती है और सूरज सिर्फ चार छह महीने ही ठीक से दिखता है वहां के लोगो के स्वभाव में एक सर्द एकाकी पन और डिप्रेशन जैसा कुछ उतर जाता है ।

सात दिन बाद बैक पैक संभाले विएना के हब्तबाहनहॉफ यानी के मुख्य स्टेशन से जब ट्रेन पकड़ी तो न जाने क्यों विएना को छोड़ते हुए मन भारी हो गया ।

फिर ट्रेन पकड़ी । बेहद नकचढ़ी और गुस्सैल ट्रेन परिचारिका ठंडी बेस्वाद चाय का कप थमा गयी । उसके बुरे स्वभाव को सहयात्रियों ने भी महसूस किया और उसके जाने के बाद मजाक में टिप्पणियां भी की कि शायद अपने घर से लड़ कर निकली है ।

पूर्वी और पश्चिमी यूरोप की ट्रेन्स में खासा फर्क है । पश्चिमी यूरोप की ट्रेन्स जहां फ़ास्ट और मॉडर्न हैं, वहीं पूर्वी यूरोप की ट्रेन्स अपेक्षाकृत धीमी और कम आधुनिक हैं । हालांकि पेंट्री कार और हाई स्पीड इंटरनेट वाई फाई लगभग सभी ट्रेन्स में मौजूद है पर पश्चिमी यूरोप की ट्रेन्स के इंजिन और पूरी ट्रेन की बनावट ही पूरी तरह एयरोडायनामिक है। खास तौर से फ्रांस और जर्मनी की ट्रेन्स साढ़े तीन सौ किलोमीटर प्रति घंटे की स्पीड पर आराम से दौड़ती है और अंदर पता भी नही चलता । पूर्वी यूरोप की अधिकांश ट्रेन्स डेढ़ दो सौ किलोमीटर प्रति घंटे की स्पीड से ही चलती हैं ।

साफ सफाई तो चुस्त दुरुस्त है । लोग भी जागरूक हैं और गंदगी नही फैलाते । टॉयलेट्स भी साफ सुथरे रहते हैं । वाश बेसिन्स में भी पानी रहता है और फ्लश में भी । हाथ सुखाने के लिए गर्म हवा का ब्लोअर भी ज्यादातर ट्रेन्स के टॉयलेट्स में रहता है । सहयात्रियों के सम्मान के लिए यात्री ऊंची ऊंची आवाज में मोबाइल फोन्स पर बात नही करते । किसी को फोन पर बात भी करनी होती है तो धीमे स्वर में संक्षिप्त सा वार्तालाप या ट्रेन के छोर पर जाकर बात । ट्रेन में स्क्रीन्स पर आने वाले स्टेशन्स की, पहुंचने के समय की अग्रिम सूचना आती रहती है ।

विएना में भी, चाहे सड़क के बीचों बीच चलने वाली ट्राम सर्विस हो या जमीन के नीचे गहरे गर्भ में चलने वाली अंडर ग्राउंड ट्यूब रेलवे, तकनीकी श्रेष्ठता हर जगह नज़र आएगी । हर स्टेशन पर लगी स्क्रीन्स पर पता चलता रहेगा कि ट्यूब ट्रेन या ट्राम कितनी देर में आएगी । आप अपनी घड़ी मिला लीजिए । मजाल है कि ट्यूब ट्रेन या ट्राम एक मिनट भी लेट हो जाये । अंदर ट्राम या ट्यूब ट्रेन की व्यवस्था और साफ सफाई भी बेहद दुरस्त रहती है । सब कुछ साफ सुथरा चमकता दमकता । वृद्ध लोगों के प्रवेश करते ही कई लोग लपककर अपनी सीट की पेशकश कर देते हैं । ट्राम और ट्यूब ट्रेन के भीतर भी स्क्रीन आने वाले स्टेशन्स की सूचना क्रम से आती रहती है । बावजूद इसके कि आप पहली बार इन देशों की यात्रा पर है और आपको इन देशों की भाषा भी नही आती, हर व्यवस्था तकनीकी रूप से इतनी सम्पूर्ण है कि जल्दी से आपको कोई परेशानी नही होने वाली ।

सहयात्रियों में ब्राजील का एक खूबसूरत युवा जोड़ा है और साथ साथ यात्रा कर रही दो जर्मन औरतें । ब्राजील जोड़ा बर्लिन जा रहा है । जर्मन औरतें आपस ही में कुछ बतिया रहीं हैं जर्मन भाषा में । रास्ता बहुत खूबसूरत है । दोनों तरफ हरी भरी पहाड़ियां है, बीच बीच में खूबसूरत मैदान हैं और ट्रेन के दायीं तरफ एक नदी भी साथ साथ चल रही है । यात्री अब ऊंघते ऊंघते झपकी ले रहे हैं और बीच बीच में उनींदी आँखें खोल कर छह सीटों वाले इस कूपे का जायजा भी ले लेते हैं ।

पश्चिमी और पूर्वी, दोनों ही यूरोप बहुत खूबसूरत हैं । कितना भी देख लो मन ही नही भरता । पिछले पच्चीस छब्बीस सालों में अनगिनत बार यूरोप की यात्रा कर चुका हूँ पर दिल है कि मानता ही नही । फिर फिर लौट आता हूँ इधर । हालांकि पूर्वी यूरोप पहली दफा ही जा रहा हूँ पर नब्बे के दशक में रूस की यात्रा और बाद में फिर यूक्रेन की यात्रा कई बार करने का अवसर भी मिला ।

इसी बीच ट्रेन चैक गणराज्य में प्रवेश कर गयी । इमिग्रेशन पुलिस ने सब यात्रियों के पासपोर्ट वगैरा चेक किये । अब कुछ दिनों तक प्राग घूमना है ।

अगला लेख: मिराबेल पैलेस का महिला वायलन बैंड - दिनेश डॉक्टर



Dr Balvir
03 फरवरी 2020

बहुत शानदार कथा है। ख़ुश रहे आबाद रहे

राहदे बाबा बलबीर पंडित

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