हिंदी भाषा और अशुद्धिकरण की समस्या

03 फरवरी 2020   |  अभिलाषा चौहान   (3884 बार पढ़ा जा चुका है)

हिन्दी भाषा का मानक रूप आज अशुद्ध शब्दों के प्रयोग के कारण लुप्त सा होता जा रहा है।यह चिंतनीय विषय है।हिंदी विस्तृत भू-भाग की भाषा है। क्षेत्रीय बोलियों के संपर्क में आने से शुद्ध शब्दों का स्वरूप बदल जाता है।

अहिंदी भाषियों के द्वारा भी हिंदी का प्रयोग संपर्क भाषा के रूप में किया जाता हैजिसके कारण शब्द अपना मूल रूप खो देते हैं। इसका कारण क्या है?

'उच्चारण' इस समस्या का मूल कारण है।हम जैसा बोलते हैं, वैसा ही लिखते हैं।बिना ये जाने कि मात्राओं के हेर-फेर से शब्द का स्वरूप तो विकृत होता ही है ,उसका अर्थ भी बाधित हो जाता है।ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या किया जाए ?कैसे हिंदी भाषा को अशुद्धिकरण से दूर रखा जाए?कैसे शब्दों के शुद्ध रूप को व्यवहार में लाया जाए ।

इसके लिए" व्याकरण"का व्यावहारिक ज्ञान होना बहुत आवश्यक है।आज यह समस्या व्यापक हो चुकी है।पहले समाचार पत्रों की भाषा या आकाशवाणी -दूरदर्शन की भाषा को शुद्ध भाषा माना जाता था ,लेकिन बढ़ते

व्यवसायीकरण के कारण वहाँ भी भाषा उपेक्षा की पात्र बन गई है।मुद्रण संस्थानों में भी भाषा की शुद्धता पर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता ,इसलिए मुद्रित सामग्रियों में भी त्रुटियाँ स्पष्ट दिखाई देती हैं,साथ ही शिक्षण संस्थानों में भाषा की शुद्धता पर विशेष ध्यान न दिए जाने के कारण छात्रों में भी अशुद्ध लेखन की प्रवृति बढ़ रही है। इसका दोष हम किसके माथे मढ़ें? क्या दोषारोपण करने से इस समस्या से निजात मिल जाएगी??कदापि नहीं।बल्कि हम सभी प्रतिबद्धता के साथ अपनी लेखन शैली में अशुद्ध शब्दों के प्रयोग से बचें तो शायद कुछ सुधार संभव है।

इन दिनों सोशल मीडिया पर हिंदी साहित्यिक रचनाओं की बाढ़ सी आ गई है।जो एक तरह से हिंदी भाषा और साहित्य के पुनरुत्थान का कार्य कर रही है ,बस कमी यही है "भाषा का अशुद्धिकरण"इस पर वहाँ भी विशेष ध्यान नहीं दिया जा रहा है।यह मेरी दृष्टि मेंअनुचित है।अगर कोई व्यक्ति लेखन कार्य से जुड़ा है और उसको पढ़ने वालों की संख्या लाखों में हो तथा उसकी भाषा में अशुद्ध शब्दों का प्रयोग हो तो निस्संदेह वह समाज को ग़लत संदेश दे रहा है।हम सबका उद्देश्य यही होना चाहिए कि हिंदी भाषा का साहित्य में प्रयोग उसके मानक रूप में हो ,ताकि वह खिचड़ी भाषा न बनें।हिंदी भाषा में तत्सम, तद्भव ,देशज और विदेशज शब्दों की भरमार है।हर शब्द का अपना सौंदर्य होता है।यदि शब्द को अपने हिसाब से तोड़-मरोड़ कर , मात्राओं में हेर-फेर कर प्रस्तुत किया जाताहै तो शब्द का मूल सौंदर्य नष्ट हो जाता है।हमारी कोशिश यही होनी चाहिए कि शब्द का मूल रूप नष्ट न हो,हम किसी भी शब्द को प्रयोग में लें पर अशुद्धि के साथ नहीं।तभी हम सच्चे मन से मातृभाषा हिंदी के स्वरूप को बचा कर रख पायेंगे।


क्रमशः


अभिलाषा चौहान

स्वरचित मौलिक



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