भारत और अमेरिका रिश्ता

25 जनवरी 2015   |  ठाकुर दीपक सिंह कवि   (126 बार पढ़ा जा चुका है)

भारत और अमेरिका के सुर अतीत में भले ही एक दूसरेसे मेल न खाते रहे हो परंतु आज स्थिति में वांछितबदलाव है। दोनों ही देश के प्रमुख विकास के मुद्दे परआम सहमति रखने वाले है। वैश्विक मंचो परदोनों ही देश गर्मजोशी से मिले है औरविचारधारा में भी आपसी समन्वय है। रिश्तों औरआकांक्षाओं की बात करने से पहले पूर्व में आयेअमेरिकी राष्ट्रपतियों और उनसे हुए फायदे नुकसानपर भी नज़र दौड़ाना लाज़मी है।करीब 55 साल पहले दिसंबर 1959 में डी आइजनहावरसर्वप्रथम भारत की यात्रा पर आये थे। यह वह दौरथा जब भारत और चीन की तकरार चरम पर थी औरअमेरिका का वास्तविक तौर पर भारत की तरफझुकाव था, ये इसलिए नहीं कि भारत के प्रति उनकेदिल में कुछ नमी थी बल्कि इसलिए कि चीन एकसशक्त वैश्विक शक्ति बनकर उभर रहा था औरअमेरिका इसके प्रति चिंता भी दबी जुबां में जाहिरकर चूका था। इसी कड़ी में आइजनहावर ने चीनकी पकिस्तान को हथियारों की आपूर्ति की बाततत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरूको लिखित रूप में कही थी। 


यह भले ही छद्म शुरुआतहो परंतु भारत को वैश्विक तौर पर एक अहम समर्थनथा। हालांकि उनकी यात्रा को हम सफलनही करार दे सकते क्योंकि उन्होंने जाते-जाते येबात कहकर कि भारत के साथ अमेरिका के रिश्तेसबसे ऊपर है लेकिन पाकिस्तान अमेरिका के दिल मेंहै, यात्रा की अहमियत को धूमिल कर दिया।न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार सबसे खास बात तो यहथी कि आजतक यह पता नही चलपाया कि आइजनहावर से नेहरू ने वास्तव में आग्रहकिया था या वे स्वयं भारत यात्रा पर आये थे।1959 के बाद सन् 1969 में लगभग एक दशक बाद जुलाईके महीने में रिचर्ड निक्सन भारत आये। यह वो दौरथा जब कांग्रेस की राजनीति एक-दूसरेकी खींचतान में उलझी हुई थी। 


तत्कालीनप्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पार्टी में वर्चस्व को लेकरकांग्रेस सिंडिकेट नेताओं से मोर्चा ले रही थी।भारत के घरेलू राजनीति में उठापटक के बीच यहयात्रा मात्र एक औपचारिकता तक ही सीमित रहगयी और इस यात्रा से भारत-अमेरिका के खराबहोते रिश्तों में कोई बदलाव नही आया और नतो इंदिरा और न ही निक्सन एक दूसरे सेगर्मजोशी से मिले। चीन, पाकिस्तान औरअमेरिका की भारत के विरूद्धतिकड़ी चिंता का विषय तो था ही तत्पश्चातइंदिरा और निक्सन की शिथिल वर्ता संकट की तरफइंगित करने वाला कदम था।1978 की जनवरी में तत्कालीनअमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर भारत यात्रा परआये। तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई नेउनका गर्मजोशी से स्वागत किया और बदले मेंकार्टर भारत के लिए एक औपचारिकसद्भावना का सन्देश लेकर आये। दोनों ही नेताओ नेएक घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किया और साथही अमेरिकी राष्ट्रपति ने हरियाणा के दौलतपुरगाँव का दौरा किया जिसका नाम बाद में बदलकरकार्टरपुर रख दिया गया। 


यह यात्रा भी सफलनही हुई क्योंकि उनके इस दौरे पर विवादखड़ा हो गया। दरअसल वो अपने एक सहयोगी से कहरहे थे कि परमाणु महत्वाकांक्षा परभारतीयों को बहुत ही कड़ा सन्देशदिया जाना चाहिए और यह बात माइक्रोफोन पररिकॉर्ड हो गयी।एक लंबे अरसे के बाद सन् 2000 में बिल क्लिंटन भारतआये। यह यात्रा वास्तव में ख़ासथी क्योंकि दोनों देश तथाकथित शीतयुद्धकी छाया से बाहर निकलते हुए खुले तौर पर एक दूसरेके साथ नज़र आये। यह पहली बारथा कि अमेरिका निर्देश देने की बजाय आग्रह केअंदाज़ में नज़र आया। वो दिल्ली के साथ-साथमुम्बई, हैदराबाद, जयपुर और आगरा भी गए। उन्होंनेभारत पाक से परमाणु कार्यक्रम रोकने का आग्रहकिया। सबसे अधिक फायदा भारत में रेंगते हुए दौड़नेकी कोशिश करते हुए आईटी सेक्टर को हुआजो अमेरिका के बाज़ारों में दौड़ने लगा। यहयात्रा भारत-अमेरिका रिश्ते की एक नयी औरमजबूत शुरुआत थी।सन् 2006 में जॉर्ज डब्ल्यू बुश भारत की ओर कदमबढ़ाने को राज़ी हुए। 


बदलती परिस्थिति में भारतएक महाशक्ति बनकर उभर रहा था। आईटी सेक्टरदौड़ पड़ा था और भारत एक परमाणु संपन्न देश था।बुश की यह यात्रा कई मायनों में ख़ास रही। इराक़युद्ध को लेकर भारतीय मुस्लिम उनका विरोध कर रहेथे। इस यात्रा के पश्चात भारत वैश्विक स्तर परपरमाणु बिरादरी में अछूत नही रहा। भारतअमेरिका के साथ असैन्य परमाणु करार पर आगे बढ़ा।हालांकि यात्रा के दौरान यूपीएसहयोगी वामदलों के विरोध के चलते उन्हें भारतीयसंसद में संबोधन से वंचित रहना पड़ा। उन्होंने विश्वभरमें भारत से लोकतंत्र फ़ैलाने के लिए मदद मांगी परंतुएक भारतीय प्रवक्ता ने उन्हें खरी-खरी सुना दी कि भारत लोकतंत्र का कारोबारनही करता।अब 26 जनवरी 2015 को गणतंत्र दिवस के मौके परओबामा की भारत यात्रा वास्तव में अहम है। चीनसीमा विवाद और पाकिस्तान की लगातारबढ़ती नापाक हरकत का समाधान संभव है। 


भारतकी कोशिश यही होगी की इन अहम मुद्दों परअमेरिका से सहयोग प्राप्त कर लिया जाय।आतंकवादियों के सुरक्षित पनाह बन चुकेपडोसी मुल्क पाकिस्तान पर नकेल कसने के लिएभारत अमेरिका का सहयोग प्राप्त कर सकता है औरसाथ ही साथ तंग सीमाओं पर शान्ति बहाल करने मेंसफल हो सकता है। साथ ही परमाणु उत्तरदायित्वपर लचीलापन संभव है जिससेअमेरिकी कम्पनियाँ माल सप्लाई करने के लिएराज़ी हो जाये। खाद्य सुरक्षा और सब्सिडी परभी दोनों नेता एक दूसरे से बात कर सकते है।आईटी सेक्टर की महत्वाकांक्षाओंको भी तवज्जो दिया जा सकता है साथ ही साथआयात-निर्यात के दायरों को बढ़ाने हेतु बातचीतसंभव है।दोनों देश आतंकवाद के मुद्दे पर एकजुट दिखाई पड़ते हैऔर मौजूदा चुनौतियों से निपटने हेतु आमसहमति प्रकट कर सकते है।यह यात्रा भारतीय अर्थव्यवस्था में मजबूती लाने केलिए एक ख़ास कदम है। 


साथ ही सैन्यहथियारों की खरीद-फरोख्त पर भी अमेरिका केसाथ ख़ास वार्तालाप हो सकती है एवंअमेरिका द्वारा वांछित मदद भी मिल सकती है।यह यात्रा भारत और अमेरिका के रिश्ते की तरफ नएयुग की शुरुआत साबित हो सकती है परन्तु अपने पुरानेएवं विश्वसनीय मित्र रूस से नाराज़गी एवं असहयोगका खतरा भी संजोये हुए है। अब देखना ये हैकि मोदी की वैश्विक नीति कितना रंग लाती हैऔर कैसे वो अमेरिका और रूस, दो परस्पर विचारविरोधी देशों के संग रिश्ते को आगे बढ़ाने एवं मजबूतकरने में सफल होते है।


-ठाकुर दीपक सिंह कविलेखक लिटरेचर इन इंडिया जालपत्रिका के प्रधानसंपादक हैं।

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