पुरुष समुंदर है,स्त्री समर्पण..

13 फरवरी 2020   |  स्वरिमा तिवारी   (509 बार पढ़ा जा चुका है)

पुरुष समुंदर है,स्त्री समर्पण..

पुरुष का प्रेम समुंदर सा होता है..गहरा, अथाह..पर वेगपूर्ण लहर के समान उतावला। हर बार तट तक आता है, स्त्री को खींचने, स्त्री शांत है मंथन करती है, पहले ख़ुद को बचाती है इस प्रेम के वेग से.. झट से साथ मे नहीं बहती। पर जब देखती है लहर को उसी वेग से बार बार आते तो समर्पित हो जाती है समुंदर में गहराई तक, डूबने का भी ख़्याल नहीं करती, साथ में बहने लगती है।


समुंदर अब शांत है, उछाल कम है, स्त्री उसके पास है। पर स्त्री मचल उठती है इतना प्रेम देख प्रतिदान के लिए, वो उड़कर बादल बन जाती है, अपना प्रेम दिखाने को तत्पर हो वो बरसने लगती है, पहले हल्की हल्की, समुंदर को अच्छा लगता है वो भी बहने लगता है, कभी कभी वेग से उछलता है प्रेम पाकर, फिर शांत हो जाता है।


पर स्त्री बरसती रहती है लगातार झूमकर दो दिन, तीन दिन, बहुत दिन तक। मगर अब पुरुष से इतना प्रेम समेटना मुश्किल होने लगता है..अंदर अथाह प्रेम होने पर भी समुंदर को ऊपर से शांत रहना है क्यूँकि उसे सब देखना है, आते जाते जहाज, उगता डूबता सूरज, तट पर लोग(पुरुष की ज़िम्मेदारियाँ)। मगर स्त्री प्रेम के उन्माद में बरस रही है, अंदर तक घुलने को व्याकुल..


लेकिन जब अंदर उमड़ते घुमड़ते ख़्यालों के कारण सुनामी आने के डर से, समुंदर से संभलता नहीं, तो वो स्त्री को रुकने कहता है, किसी और देश जाने कहता है। पर प्रेम में समर्पित स्त्री को रोकना असंभव है, जब वह देखती है कि समुंदर अब नहीं चाहता तो वो दर्द के आवेग में बरसती है पास बुलाने को, स्त्री के आँसू ख़तरनाक होते हैं, बाढ़ आने लगती है, पुल टूटने लगते हैं, पानी घरों में जाने लगता है, सब तहस नहस होने लगता है। फिर धीरे धीरे बादल ख़त्म होने लगते हैं, आँसू सूख जाते हैं, सूखा, अकाल आ जाता है, स्त्री पत्थर हो जाती है।

पर स्त्री का स्वभाव समर्पण है, वो फिर किसी समुंदर किनारे खड़ी कर दी जाती है, एक नई लहर आवेग में आती है, स्त्री बचती है पर फिर बह जाती है समर्पित होने के लिए अंदर तक...

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पुरुष समुंदर है,स्त्री समर्पण..

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अलोक सिन्हा
15 फरवरी 2020

अच्छा लेख है , प्रशंसनीय | गद्य गीत जैसी मधुरता लिए हुए | ऐसे ही लिखती रहिये | शुभ कामनाएं |

Mayank mishra
13 फरवरी 2020

आप की टिप्पणी स्त्रियों के प्रति बहुत ही ज्यादा उन्मादक लगी।
"नारी तुम केवल श्रद्धा हो,विश्वास रजत,नग,पग तल में।
प्रेम श्वेत सी बहा करो, जीवन के मधुर तला तल में"।।
समुद्र की उपमेयता आप ने पुरूष से कर मधुरता का ऐसा रस पिरोया है कि आप का बारम बार अभिनंदन करने का दिल करता है।।

Mayank mishra
13 फरवरी 2020

आप की टिप्पणी स्त्रियों के प्रति बहुत ही ज्यादा उन्मादक लगी।
"नारी तुम केवल श्रद्धा हो,विश्वास रजत,नग,पग तल में।
प्रेम श्वेत सी बहा करो, जीवन के मधुर तला तल में"।।
समुद्र की उपमेयता आप ने पुरूष से कर मधुरता का ऐसा रस पिरोया है कि आप का बारम बार अभिनंदन करने का दिल करता है।।

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