शरीर एक मुबाईल है निकाल निकाल

29 फरवरी 2020   |  ललिता बोथरा   (290 बार पढ़ा जा चुका है)

एक दिन मेरे साथ एक विचित्र घटना हुई मस्तिष्क जाग रहा है लेकिन शरीर शिथिल होने लगा हाथ उठाना चाहती हूं पर उठा नहीं पा रही हूं। मुझे लगा मेरे शरीर की गति चलते चलते धीरे होने लगी। मुझे मेरा शरीर किसी मुबाईल फोन से कम नहीं लग रहा था । फोन जब ओवरलोड हो जाता है तो चलने में दिक्कत करता है तो उसे हल्का करना पड़ता है। उसी क्षण मैंने अपने जीवन से जुड़ी बेकार की चीजों को डिलिट करने की सोची और फिर चन्द ही क्षणों में मैंने अपनी दिनचर्या से बेकार की चीजों को निकाल बाहर किया आलस प्रमाद व नकारात्मक सोच को डिलिट किया । धर्म ,योग , और सकारात्मक सोच को अपना फेसबुक दोस्त बनाया ।नयी सोच नयी उमंग से शरीर में ऊर्जा का संचार हुआ धीरे धीरे शरीर की शिथिलता समाप्त हो गई । शरीर व दिमाग दोनों दौड़ने लगे। दोस्तों जीवन बहुत छोटा है ईमानदारी से जीओ हंसते हुए हंसाते हुए।

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