न्याय या मजाक

04 मार्च 2020   |  वर्षा वार्ष्णेय   (277 बार पढ़ा जा चुका है)

न्याय या मजाक

बेटियों की जान सस्ती होती है ,
ये कानून ने भी समझा दिया ।
मार दी जाती हैं निर्ममता से ,
वहशियों को दिलासा दे दिया ।

क्यूँ नहीं खौलता खून तुम्हारा ,
बेहयाई की हद देखकर भी ।
क्या छोड़ देते तुम कसूरवारों को ,
गर निर्भया तुम्हारी बेटी होती ।

कैसे मासूम हो सकते हैं वो ,
जिन्हें एक पल भी दया नहीं आयी ।
माँगती रही वो जिंदगी की भीख ,
तड़फते देखकर भी लाज न आई ।

तुम क्या जानो एक माँ का दर्द ,
जिसकी जान को लूट लिया ।
इंतजार में न्याय के क्यूँ माँ को,
फिर से तुमने रुसबा कर दिया।

क्या लहू के रंग में भी अंतर होता है ,
क्या कानून भी मोहताज होता है ?
मौत के बदले तुरंत मौत क्यों नहीं ,
ये रिवाज भी सिर्फ भारत में होता है ।

कब तक भटकती रहेगी बेटी की आत्मा ,
कब तक कहते रहोगे खुद को परमात्मा।
वो दिन दूर नहीं जब तुम भी पछताओगे,
खोकर फिर से बेटी को गहरी चोट खाओगे।

कैसे जी सकती है बेटी इस दुर्गध में ,
जहाँ साँस लेने पर भी पाबंदी हो ।
कैसे निर्भय हो सकती है एक बेटी ,
जहाँ न्याय में लगती इतनी देरी हो ।

मत करो बदनाम देश को ,
ऑंखें अब अपनी खोलो तुम ।
ये देश है झाँसी की रानी का ,
मत तलवारों से खेलो तुम।
वर्षा वार्ष्णेय अलीगढ़


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