मानव एवं प्रकृति :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

12 मार्च 2020   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (293 बार पढ़ा जा चुका है)

मानव एवं प्रकृति :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में मनुष्य जैसा कर्म करता उसको वैसा ही फल मिलता है | किसी के साथ मनुष्य के द्वारा जैसा व्यवहार किया जाता है उसको उस व्यक्ति के माध्यम से वैसा ही व्यवहार बदले में मिलता है , यदि किसी का सम्मान किया जाता है तो उसके द्वारा सम्मान प्राप्त होता है और किसी का अपमान करने पर उससे अपमान ही मिलेगा | ठीक उसी प्रकार इस संसार में सब कुछ प्रदान करने वाली प्रकृति मानव मात्र की माता है , क्योंकि उसी के माध्यम से मानव शरीर के ढांचे से लेकर के मानसिक विकास तक की जीवन को बनाने वाली अनेकानेक उपलब्धियां प्राप्त हुई हैं | जीवन जीने के लिए आवश्यक सुविधाएं एवं साधनों के भंडार प्रकृति से ही प्राप्त हुए हैं | आज मनुष्य जिन उपलब्धियों पर गर्व कर रहा है वह सब प्रकृति की ही देन है , परंतु जल्दी से जल्दी अधिकाधिक प्राप्त कर लेने की मंशा के कारण ही मनुष्य प्रकृति का दोहन करने लगा जिससे प्रकृति का संतुलन बिगड़ने लगा और अदृश्य जगत में बिक्षोभ की स्थिति उत्पन्न होने लगी | इसके कारण पर विचार किया जाय कि प्रकृति का संतुलन क्यों विगड़ रहा है तो यही परिणाम निकल कर आता है कि जिस प्रकार एक गाय का बच्चा जब तक धीमी गति से अपनी मां का दुग्धपान करता है तब तक वह गाय भी उसे प्रेम से दुग्धपान कराती है और चाटती रहती है , परंतु जब बच्चा थोड़ा बड़ा हो जाता है और वह दुग्धपान करने में उद्दंडता करने लगता है और अपनी मां के स्तनों को काटकर लहूलुहान करने लगता है तब गाय भी अपना व्यवहार बदल देती है और उसके ऐसा करने पर अपनी लातों की ठोकरों से उस बच्चे को अलग कर देती है | कहने का तात्पर्य है कि जब एक पक्ष का व्यवहार बदल जाता है तो दूसरे पक्ष का व्यवहार बदलने में तनिक भी समय नहीं लगता | यही उदाहरण प्रकृति के लिए भी दिया जा सकता है जब तक मनुष्य प्रकृतिप्रदत्त साधनों का उचित उपयोग करता रहता है तब तक प्रकृति भी सहयोगी की भूमिका में रहती है परंतु जब मनुष्य के द्वारा प्रकृति के दोहन का अनाधिकृत प्रयास किया जाता है तो प्रकृति असंतुलित होकर के मनुष्य के प्रति भी वैसा ही व्यवहार करने लगती है | जैसा व्यवहार आज मनुष्य प्रकृति के साथ कर रहा है बदले में प्रकृति भी उसी प्रकार के व्यवहार मनुष्य के साथ निभा रही है इसलिए प्रकृति के परिवर्तन पर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए |*


*आज के परिवेश में मनुष्य के द्वारा अनुचित प्रयोग प्रकृति के साथ अपनाया जा रहा है | तेजी से चलने वाले वाहनों एवं कारखानों के लिए भूगर्भ से तेल एवं कोयला जैसे खनिज पदार्थों का दोहन प्रतिपल असाधारण गति से हो रहा है यही कारण है कि वायुमंडल प्रदूषण से भऱता चला जा रहा है | आवश्यकता से अधिक भूगर्भीय पदार्थों का दोहन करने से उनका भंडार भी कम हो रहा है तथा जब पृथ्वी के अंतस्थल से इन पदार्थों को निकाल लिया जा रहा है तो भूकंप आदि की संभावना अधिक बनती चली जा रही है और समय-समय पर इसका प्रकोप मानव मात्र को झेलना भी पड़ रहा है | मेरा "आचार्य अर्जुन तिवारी" का मानना है कि जिस गति से प्रकृति के साथ अनुचित व्यवहार मनुष्य के द्वारा किया जा रहा है उसी गति से प्रकृति भी मनुष्य के साथ दुर्व्यवहार कर रही है | वर्षपर्यंत होने वाली बरसात किसानों के लिए बिजली गिरा रही है , वहीं अनेक प्रकार के रोगों को भी जन्म देने में सहायक हो रही है | आज प्रकृति का अत्यधिक दोहन करके नये पदार्थों को प्राप्त करना आधुनिक वैज्ञानिकों को अपनी सफलता भले ही लग रही हो परंतु यदि इसके दूरगामी परिणाम देखे जायं तो यह समस्त विश्व के लिए घातक सिद्ध होने वाला है | वायु में प्रदूषण फैल गया है , अंतरिक्ष में मानव निर्मित उपग्रहों की संख्या बढ़ती जा रही है , जल की शुद्धता समाप्त हो रही है , धरती रेगिस्तान बनती जा रही है , परंतु मनुष्य अपने उद्दंडता से बाज नहीं आ रहा है | मनुष्य को सचेत करने के लिए समय-समय पर प्रकृति संदेश देती रहती है परंतु अपनी सफलता के मद में चूर हुआ मनुष्य उसके संदेश को समझ नहीं पा रहा है और यदि मनुष्य ने अपने हाथ पीछे ना खींचे तो आने वाला समय बहुत ही भयावह होने वाला है | यदि मनुष्य प्रकृति से अपने लिए सुंदर वातावरण एवं सुंदर व्यवहार की कामना करता है तो उसे भी प्रकृति के साथ समुचित व्यवहार करना ही होगा |*


*प्रकृति शरण में वापस लौटने का उद्घोष जब जन-जन के मन में प्रवेश करेगा तो प्रकृति पर आधिपत्य जमाने की वर्तमान उद्दंडता को पलायन करना ही पड़ेगा प्रकृति प्रकोप से बचने के लिए मनुष्य को ऐसा करने की आवश्यकता है |*

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