मेरा नबाब ( डांग)

13 मार्च 2020   |  ललिता बोथरा   (274 बार पढ़ा जा चुका है)

मेरा नबाब ( डांग)

आज नबाब पूरे-पूरे दो साल का हो गया। सबका चहेता बन गया।
बच्चों ने कितना ज़िद किया मम्मी पापा मान जाओ ना । एक दिन
बहन भाई ने अपनी गुलक से सारे पैसे निकाल कर नबाब को ले आये। पापा ने चिल्ला कर कहा या तो इसे पाललो या फिर मेरे को।
मम्मी को कुत्ते बिल्कुल भी पसंद नहीं थे बच्चों को थप्पड़ जड़ दिया
बच्चों में जैसे डांट सहने की शक्ति आ गयी हो । सारा दिन बारी बारी उसकी सेवा में लगे रहे। मम्मी को डिप्रेशन में आते देख
पापा ने बच्चों को उसे छोड़ कर आने को बोला । छोड़ने की
आवाज सुनकर नबाब पापा के पैरों में आकर बैठ गया और
पैरों को चाटने लगा जैसे कह रहा हो मुझे मत भेजो । पापा को
दया आ गयी वो मान गये । मम्मी को मनाना मुश्किल हो गया।
नबाब ने अपनी प्यारी प्यारी हरकतों से सिर्फ मम्मी को ही नहीं घर में सबको मना लिया। नबाब को देख कर कोई कुछ कहता
तो कोई कुछ , कोई कहता घर में अशुभता आती है बरकत नहीं
होगी ये सारी बातों से दिमाग़ में घूमने लगा। एक दिन मैं उसे सुसु करवाने बाहर ले गयी तो उसने पेड़ पर सुसु कर दिया। थोड़े दिन बाद मैंने देखा सालों से पड़ा सुखा पेड़ हरा हो गया। सारी शंकाएं
समाप्त हो गयी।

अगला लेख: मेरा नबाब।



बहुत सुंदर अभिव्यक्ति । दरअसल सच तो ये है कि पेट्स हमें पालते है हम पेट्स को नही । पेट्स धीरे धीरे हमारे स्वामी बन जाते है और हम उनके सेवक । कुछ भी करने से पहले और कहीं भी जाने से पहले सोचना पड़ता है कि डॉग का क्या होगा ? उसे कौन रखेगा और कौन फीड करेगा ।

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