कोरोना और स्त्री

25 मार्च 2020   |  विजय कुमार तिवारी   (247 बार पढ़ा जा चुका है)

करोना और स्त्री

विजय कुमार तिवारी

कल प्रधानमन्त्री ने देश मेंं कोरोना के चलते ईक्कीस दिनों के"लाॅकडाउन"की घोषणा की है।सभी को अपने-अपने घरों में रहना है।बाहर जाने का सवाल ही नहीं उठता।घर मेंं चौबिसों घण्टे पत्नी के साथ रह पाना,सोचकर ही मन भारी हो जाता है।किसी साधु-सन्त के पास इससे बचाव का उपाय नहीं है।यदि कोई उपाय रहता तो ऐसे सन्तजन गृहत्यागी होकर जंगलों,पहाड़ों,गुफा-कन्दराओं की खाक क्यों छानते फिरते।कला-संस्कृति के मर्मज्ञों ने पता नहीं कैसे इतने बड़े-बड़़ेे काव्य-महाकाव्य रच डाले हैं।लोगों को वह सब पढ़कर कल्पनात्मक दुनिया का आकर्षण घेरे रहता है।यह धारणा बिल्कुल स्पष्ट हो गयी है कि ऐसे सभी लोगों को यथार्थ से पाला नहीं पड़ा है।जिनका पाला पड़ गया है उनसे आटा-दाल का भाव पूछिये।अधिकांश यही कहते मिलेंगे कि न जी रहे हैं और न मर रहे हैं।

"तुम्हेंं झेल पाना मेरे बस में कभी नहीं रहा," लगभग पूरी तरह समर्पण करते हुए शिवाकान्त ने अपनी ही अर्धांगिनी के सामने अपने कान पकड़े,"तुम्हें कौन जीत सकता है?"उनके चेहरे पर मृदुल मुस्कान की एक पतली रेखा उभर आयी जिसे दूसरी तरफ मुँह घुमाकर उन्होंने छिपा लेना चाहा।

उनको पता है,एक बार श्यामा का मुड उखड़ गया तो आगे के कई दिनों तक ऐसे ही गुजारने पड़ेंंगें।कभी-कभी तो उन्हें यह भी नहीं पता चलता,आखिर किस बात को लेकर वह परेशान रहती है।पूछने पर मौनव्रत धारण कर लेती है।उसका यों मौन हो जाना भी शिवाकान्त को बहुत भारी लगता है।लगता है जैसे पूरा घर विरान हो गया है या घर की सम्पूर्ण जीवन्तता मृत्यु हुए घर की तरह हो गयी है।उन्होंने हमेशा अनुभव किया है कि उसको मनाना तो बिल्कुल सम्भव नहीं है।उधर श्यामा भी भले ही सामने कुछ ना कहे,उनकेे जरा सी देर होने पर बेचैन हो उठती है।

शिवाकान्त को याद है जब श्यामा नयी-नयी दुल्हन बनकर उनकी जिन्दगी में आयी थी।घर में बहुत रौनक थी।लोग उत्साहित और खुश थे।शादी की रात मांंगलिक विधि-विधानों में व्यस्तता और व्रत आदि के कारण उसकी आँखें मानो सूज सी गयी थीं।शायद थक भी गयी होगी।इसकी बावत पूछने पर उसने जिस ढंग से उत्तर दिया,शिवाकान्त बाबू समझ गये कि दिन ऐसे ही कटने वाले हैंं।उसने यह भी कहा कि वह शादी करना ही नहीं चाहती थी,पर विरोध भी नहीं कर पायी।

शिवा बाबू ने इसे असामान्य नहीं माना।दरअसल बहुत सी लड़कियाँं शादी के समय अनेक कल्पनात्मक भय के दौर से गुजरती हैं और स्वयं में वह आत्म-विश्वास नहीं जगा पातीं।उन्होंने उसे समय देना चाहा ताकि वह स्वयं में विश्वास जगा पाये,शादी की मर्यादा और इस घर में अपना सही स्थान समझ सके।तदन्तर जो भी हुआ वह कामचलाऊ ही समझना चाहिए।साहित्य की किताबों में फैला हुआ प्रेम मायाजाल की तरह ही दिखा।उन्हें समझ मे आ गया कि कबूतर दाना चुग चुका है और अब फड़फड़ाने से कोई लाभ नहीं।शायद श्यामा ने भी अपनी नियति के रहस्य को समझ लिया था।

शिवा बाबू ने अपने तई साथ बने रहने के कुछ तौर-तरीके खोज निकाले और श्यामा ने भी स्वयं को कुछ ढिला छोड़ दिया।जीवन की गाड़ी चल पड़ी।

क्या इतने से काम चलता है?दोनो की रुचियाँ भिन्न हैंं।कोई भी समझौता करने को तैयार नहीं।शिवाकान्त अक्सर झुंझला उठता है।

उनकी यह झुंझलाहट कभी-कभी इस बात पर भी होती है जब श्यामा चुपचाप उनकी सारी जरुरतों की पूर्ति करती रहती है,कोई प्रतिक्रिया नहीं करती।

बहुत बार तो पैसे की कमी ने स्थिति बिगाड़ी और छोटी-छोटी चीजें बड़े-बड़़े मतभेदों की आधार बनती रहीं।जब पैसे कम थे तो शौक बहुत थे, जब थोड़े पैसे हुए तो उसने त्यागी-तपस्विनी का रुप धारण कर लिया।शिवा बाबू के भीतर का ज्वार वैसे ही शिथिल होता रहा और उन्होंने अपनी अभिरुचियोंं में मन लगा लिया।

उसने शुरु में ही कहा था कि बचपन में स्वप्न में उसे श्रीकृष्ण ने दर्शन दिया है और मेरी शादी उन्हीं से हुई है।

"मुझे ही अपना कृष्ण मान लो,"शिवा बाबू ने माहौल को मधुर करना चाहा।

वह् क्रुद्ध हुई थी परन्तु कहा कुछ नहीं।

फिर बच्चे हुए और दोनो उनके पालन-पोषण मेंं व्यस्त रहे।दोनो ने अपने-अपने तरीके से अपनी-अपनी जिम्मेदारियाँ सम्हाल ली।दोनो की अपनी-अपनी दुनिया विकसित होती गयी जिसकी परिधि एक-दूसरे के आसपास तो थी परन्तु कभी एक-दूसरे से होकर नहीं गुजरी।

नौकरी के दौरान शिवाकान्त को अनेक कमरों के घर मिलते थे और लोगोंं का आना-जाना बना रहता था।सबके अपने-अपने कमरे थे।घर की चहल-पहल मेंं दिन बीत जाते थे।बहुत से लोग थे जिनकी सेवायेंं मिल जाती थींं।दोनो का एक-दूसरे से कहे-सुने बिना काम चल जाता था।

अब उसने अपनी भक्ति को जागृत कर लिया है और अपने आराध्य की सेवा में लगी रहती है।घर में सुन्दर सा मन्दिर बन गया है।यह नया परिवेश उसे रास नहीं आता।इस नयी जगह में उसके वे सारे लोग बिछड़ गये हैं।थोड़ी भक्ति शिवा ने भी सीख ली है।चाहे-अनचाहे जीवन के उत्तरार्ध में मात्र दोनो ही हैं एक-दूसरे के लिए और जरुरत भी है एक-दूसरे के देखभाल की।भरसक दोनो निभाते भी हैं परन्तु दोनो की चिर-परिचित एक-दूसरे के प्रति प्रेम-भाव को छिपा लेने की आदत बरकरार है।

शिवा,श्यामा के लिए कुछ भी करना चाहता है तो वह चिढ़ाने से बाज नहीं आती, कहती है,"मुझे इसकी कोई जरुरत नहीं है।"दवा भी उसी ठसक से ग्रहण करती है।

शिवाकान्त का पूरा ध्यान रखती है।आवश्यक सारी चीजों की व्यवस्था करती है।पानी गरम करना,कपड़े धोना,समय पर दवा देना,परहेज में कोताही होने पर उलाहनायें देना और भोजन की पूरी व्यवस्था करती है।

करोना को लेकर वह बहुत सजग हो उठी है और बाहर न जाने की हिदायतें दे रही है।उसके इस तरह चिन्तित रुप को देखकर शिवाकान्त अवाक् है,"तुम कबसे मेरी चिन्ता करने लगी?"

वह मुस्करा उठी,"जीवन भर आप मुझे समझ नहीं पाये।"पूरे अधिकार वाली धौंस से उसने कहा,"चुपचाप घर में रहिये।"

"अच्छा,जैसे तुमने मुझे जीवन भर समझ ही लिया है!"उसके स्नेह-युक्त मधुर भाव को देखकर शिवाकान्त के चेहरे पर मृदुल मुस्कान तैर गयी,"अब मर भी गये तो कोई बात नहीं।"

"ऐसा मत कहिये जी,"अचानक वह भावुक हो उठी।

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