भोतिक आवश्यकता।

25 मार्च 2020   |  ललिता बोथरा   (274 बार पढ़ा जा चुका है)

आज मेरा मन स्थिर नहीं है जब मेरा मन स्थिर नहीं होता है तो
मैं पेड़ों से बातें करती हुं। ज़िन्दगी कितनी अजीब होती जा रही है।
एक समय था जब चाय पीने की फुरसत नहीं मिलती थी
बच्चों की परवरिश, घर के कामों में ही सारा समय निकल जाता था
और अब समय है तो परिवार साथ नहीं है पहले परिवार बड़ा होता
था तो घर हरा भरा लगता था अकेले पन का अहसास भी नहीं होता था।अब दो बच्चे हैं जो अपना भविष्य बाहर सेट करने में लगे हैं।
मेरे पास दुखी होने का कोई कारण नहीं था ख़ुश होकर भी में
खुश नहीं थी । बच्चे शायद अपने सपनों में में इतने व्यस्त हो गए कि उनको ध्यान ही नहीं रहा कि पापा मम्मी को भी हमारी
जरूरत है ।काश माता पिता की इच्छा को लेकर सपने संजोए होते
नहीं उनको बाहर की दुनिया में ही सबकुछ ठीक लगता है।इन
सबका कारण भौतिकता,पैसा, दौलत,का मोह ही परिवार से दुर
करता है। इस मोह को आज की जेनरेशन ने आवश्यकता का नाम
दे दिया। क्या आवश्यकता मां बाप के साथ पुरी नहीं हो सकती?
अपनी आवश्यकताओं को सीमित रखे । भौतिक वस्तुएं हमें आज
का सुख दे सकती है कल का नहीं। तभी ठंडी हवाएं चलने लगी
अन्दर से आवाज आई मम्मी आज नाश्ता नहीं मिलेगा क्या?
बेटी ने गले लगा लिया और बोली मैं आपको छोड़कर के कई
नहीं जानेवाली। क्या उसने मेरे दर्द को जान लिया सोचते हुए
अन्दर आ गई।

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