भारत के प्रसिद्द 5 मंदिर

26 मार्च 2020   |  मोनिका चौधरी   (293 बार पढ़ा जा चुका है)

भारत देश महान संस्कृति और सभी धर्मों को मानने वाला देश है ,हज़ारों देवी देवताओं का वास हमारे देश में माना जाता है |

यहाँ मिली जुली संस्कृति के लोग रहते है , और सभी धर्मों का बराबर आदर करते हैं , सभी एक - दूसरे के त्योहारों को प्यार से मनाते हैं | वैसे तो भारत देश का नाम बहुत सी चीज़ों की वजह से दुनिया में फैला हुआ है , पर जहाँ सांस्कृतिक ,धार्मिक चीज़ों की बात आती है तो भारत देश ला नाम सर्वप्रथम आता है ,क्यूंकि हमारे भारत में देवों यानि भगवान् का वास मन जाता है ,

भारत में अनेकों मंदिर हैं ,लेकिन कुछ मंदिर विश्व भर में प्रसिद्द हैं , जिनके दर्शन के लिए लोग दूर-दूर देशों से भारत में आते हैं , कुछ मंदिरों का इतिहास भगवान् और युगों से चला आ रहा है , ऐसे मंदिरों को देखने , उनका रहस्य जानने के लिए लोग दूर देशों से आते हैं | चलिए आपको बताते ऐसे कौन से मंदिर हैं जो विश्व भर में प्रसिद्द हैं |

भारत में लाखों मंदिर हैं और उनमें से कुछ भूमि जितनी ही प्राचीन है। भारत के यह मंदिर कई प्रकार की शैलियों में बनाए गए हैं, यही एक कारण है जिसकी वजह से इन्हें भारत के प्रमुख मंदिरों में गिना जाता है। इन मंदिरों को वास्तुकला यह आने वाले पर्यटकों और दर्शोको को आश्चर्यचकित कर देती है। इस लेख में हम आप को भारत के प्रमुख मंदिर, उनके स्थान और उनके संस्थापक के बारे में बताने जा रहे है।

भारत के प्रमुख 5 मंदिर -

1.केदारनाथ मंदिर || kedarnath temple

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प्रमुख देवता: भगवान शिव

स्थान:रूद्रप्रयाग, उत्तराखण्ड

संस्थापक या पुन: निर्माता: पाण्डव वंश के जनमेजय आदि शंकराचार्य

निर्माण का समय: 8th Century

लगभग 400 साल तक बर्फ के अंदर पूरी तरह से ढका हुआ बाबा केदारनाथ का मंदिर जिसे बारहवें ज्योतिर्लिंग के रूप में पूजा जाता है, जिसकी महिमा अपरंपार है. चारों तरफ बर्फ के पहाड़ और दो तरफ से मन्दाकिनी और सरस्वती नदियों के बीचों बीच खड़ा शिव का ये अनोखा मंदिर ,जाने कितनी बार भयानक और विनाशकारी छोटी-बड़ी आपदा को झेलने वाले बाबा केदार के इस धाम में बाबा की ऐसी महिमा है कि कभी इस मंदिर का बाल भी बांका नहीं हो पाया |

बाबा केदारनाथ मंदिर का इतिहास और ख़ास बातें -

केदारनाथ मंदिर की स्थापना के बारे में बहुत सी बातें कही गयी हैं, लेकिन पुराणों में लिखी गयी मान्यताओं के अनुसार महाभारत की लड़ाई के बाद पाण्डवों को जब अपने ही भाइयों के मारे जाने पर भारी दुख हुआ तो वे पश्चाताप करने के लिए केदार की इसी भूमि पर आ पहुंचे, कहते हैं उनके ही द्वारा इस मंदिर की स्थापना हुई थी.

बाबा केदारनाथ मंदिर के दर्शन करने के लिए गौरीकुण्ड से ही 15 किलोमीटर की पैदल यात्रा करनी पड़ती थी. जबकि आपदाओं के बाद ये पैदल यात्रा की दूरी 15 किलोमीटर अधिक हो गयी है |

बाबा केदारनाथ मंदिर के पास रक्षाबंधन से पहले श्रावणी अन्नकूट मेला लगता है. कपाट बन्द होने के दिन विशेष समाधि शंकराचार्य की पूजा होती है. केदारनाथ त्याग की भावना को भी दर्शाता है.

बाबा केदारनाथ के दर्शन सिर्फ सुबह 6 से 2 और शाम 3 से 5 बजे तक किए जा सकते हैं.

बाबा केदार का ये धाम कात्युहरी शैली में बना हुआ है. केदारनाथ मंदिर के निर्माण में सफ़ेद रंग के बड़े पत्थरों का प्रयोग अधिक मात्रा में किया गया है. मंदिर की छत लकड़ी की बनी हुई है, जिसके शिखर पर सोने का कलश रखा हुआ है. मंदिर के बाहरी द्वार पर पहरेदार के रूप में शिव के सबसे प्रिय नंदी की बड़ी प्रतिमा बनी हुई है.

केदारनाथ मंदिर को तीन भागों में बांटा गया है.

पहला- गर्भगृह

दूसरा- दर्शन मंडप (जहां पर दर्शानार्थी एक बड़े प्रागण में खड़े होकर पूजा करते हैं)

तीसरा- सभा मण्डप (इस जगह पर सभी तीर्थयात्री जमा होते हैं)

जो भी बाबा केदारनाथ जाता है वो यहां भगवान शिव के अलावा ऋद्धि सिद्धि के साथ भगवान गणेश, पार्वती, विष्णु और लक्ष्मी, कृष्ण, कुंति, द्रौपदी, युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव की पूजा अर्चना भी करते हैं.

बाबा केदारनाथ की यात्रा से जुड़े तथ्य - -

पुराने दौर में लोग केदारनाथ मंदिर के दर्शन करने बर्फ से ढके पहाड़ों से होकर गुजरते थे। क्यूंकि वहां कोई भी रास्ता नहीं था , पगडण्डी पर होकर लोग जाया करते थे |

केदारनाथ धाम के मुख्य पुरोहित वागीशलिंग स्वामी कहते हैं कि केदारनाथ में इतने सारे लोग आते हैं लेकिन ज्यादातर आस्था और भक्ति के चलते नहीं बल्कि मौज-मस्ती के लिए आते हैं। शिव तो बैरागी हैं उन्हें सांसारिक सुख के साधनों और इच्छाओं से कोई लेनादेना नहीं है लेकिन उनके नाम पर यहां आने वाले तो उल्टी राह अपनाते हैं।

केदारनाथ मंदिर 40 साल पुरानी तस्वीर में भी मंदिर से सटे निर्माण नजर नहीं आते सिर्फ मंदिर के आसपास पुजारियों और पंडों के रुकने का इंतजाम था बाकी जो दर्शन के लिए आता था उसी रोज वापस लौट जाता था।

मनुष्य ने अपने लालच और स्वार्थ के चलते कुछ वैध और ज्यादातर अवैध निर्माण किये , दुकानें , होटल खोल लिए और वहां की पवित्रता को खराब किया |

2 . अक्षरधाम मंदिर || akshardham mandir

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प्रमुख देवता: स्वामिनारायण

स्थान: पांडव नगर, नई दिल्ली

संस्थापक या पुन: निर्माता: BAPS, प्रमुख स्वामी महाराज

निर्माण का समय: 6 November 2005

दिल्ली शहर लोगो को आकर्षित करने वाला शहर है, आकर्षण की एक ख़ास वजह यहाँ बना अक्षरधाम मंदिर – Akshardham Temple भी है जो स्वामीनारायण मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।

यह मंदिर विश्व के विशालकाय मंदिरों में से यह एक है। इसका विशाल आर्किटेक्चर इसके इतिहास को बयाँ करता है।अक्षरधाम मंदिर से सम्बंधित जरूरी बातेँ -

अक्षरधाम या स्वामीनारायण अक्षरधाम मंदिर एक हिन्दू मंदिर है और भारत के नयी दिल्ली में स्थापित साहित्यिक-सांस्कृतिक स्थान है। यह मंदिर दिल्ली अक्षरधाम या स्वामीनारायण अक्षरधाम के नाम से भी जाना जाता है।

अक्षरधाम मंदिर के पीछे संस्था BAPS का हात है, जिसका अर्थ बोचासनवासी श्री अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था से है। इसके प्रमुख स्वामी महाराज ने मंदिर को बनाने में मुख्य भूमिका निभाई है।

इस मंदिर में लाखो हिन्दू साहित्यों और संस्कृतियों और कलाकृतियों को मनमोहक अंदाज़ में दर्शाया गया है।

दिल्ली में आने वाले 70% यात्रियों को अक्षरधाम मंदिर आकर्षित करता है। इस मंदिर को डॉ.ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने 6 नवम्बर 2005 को शासकीय रूप से खोला था।

इस कॉम्प्लेक्स में अभिषेक मंडप, सहज आनंद वाटर शो, थीम गार्डन और तीन प्रदर्शनी (Exhibition) सहजआनंद दर्शन, नीलकंठ दर्शन और संस्कृति दर्शन है।

स्वामीनारायण में हिन्दुओ के अनुसार अक्षरधाम शब्द का अर्थ भगवान के घर से है और भगवान के भक्तो का ऐसा मानना है की अक्षरधाम भगवान का निवास स्थान हुआ करता था।

मंदिर के बीच के गुम्बद के निचे 11 फूट (3.4 मी) ऊँची स्वामीनारायण भगवान की अभयमुद्रा में बैठी हुई मूर्ति है।

स्वामीनारायण मंदिर जातिगत गुरुओ के विचारो की प्रतिमाओ से घिरा हुआ है। स्वामीनारायण में बनी हर एक मूर्ति हिन्दू परंपरा के अनुसार पञ्च धातु से बनी हुई है। इस मंदिर में सीता-राम, राधा-कृष्णा, शिव-पार्वती और लक्ष्मी-नारायण की मूर्तियाँ भी है।

3. श्री सिद्धिविनायक मंदिर || Shri Siddhi Vinayak Ganpati Mandir

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प्रमुख देवता: सिद्धिविनायक (भगवान गणेश )

स्थान: मुंबई, महाराष्ट्र

संस्थापक या पुन: निर्माता: लक्ष्मण विठु और देउबाई पाटिल

निर्माण का समय: 19 November 1801

मुंबई के प्रभादेवी में स्थित श्री सिद्धिविनायक मंदिर विश्व में स्थित सबसे पूजनीय मंदिरों में से एक है. यह मंदिर भगवान गणेश को समर्पित है.

इस मंदिर के अंदर एक छोटे से आँगन में भगवान् गणेश के सिद्धिविनायक रूप की मूर्ति को स्थापित किया गया है , बाहर लकड़ी के दरवाजों पर भगवान् गणेश के प्रतिबिंब को झलकाया गया है और अंदर की छत सोने से बनी हुईं हैं मुंबई स्थित सिद्धिविनायक मंदिर का निर्माण 1801 में विट्ठु और देउबाई पाटिल ने किया था. इस मंदिर में गणपति का दर्शन करने सभी धर्म और जाति के लोग आते हैं.

इस मंदिर के नाम के पीछे भी एक वाकया है इसका नाम सिद्दिविनायक इसलिये पड़ा क्योंकि भगवान गणेश के सूड दाई ओर मुड़ी होती हैं तथा वे सिद्धि पीठ से जुड़ी होती हैं. गणेश के शरीर से ही सिद्दिविनायक नाम पड़ा. इस मंदिर के प्रति लोगो में खास अटूट विशवास है.

इस मंदिर में प्रवचन के लिये अलग से हाल है. मंदिर के दूसरी मंजिल पर अस्पताल है जहाँ पर रोगियों का निशुल्क उपचार किया जाता हैं. इस मंदिर में लिफ्ट लगे हुए हैं|

सिद्धिविनायक मंदिर में स्थित गर्भगृह :

इस मंदिर में एक गर्भगृह भी हैं, गर्भगृह को इस तरह बनाया गया है कि भक्तगण सभा से ही दर्शन ले सकते हैं. गर्भगृह 10 फीट चौड़ा और 13 फीट ऊँचा हैं.जहां भगवान् गणेश रहते हैं और अंदर जाने के 3 दरवाजे हैं

4-5 घंटे के बाद लाइन में नम्बर आता हैं. यहाँ हर साल गणपति पूजा महोत्सव आयोजन होता हैं.

सिद्धिविनायक में स्थित चर्तुभुर्जी विग्रह :

जहां भगवान् श्री गणेश अपनी दोनों पत्नियों रिद्धि और सिद्धि के साथ विराजमान है , भगवन गणेश की पत्नियों को लक्ष्मी ,धन, की देवी के रूप में लोग पूजते हैं और अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए प्रार्थना करते हैं |

4. काशी विश्वनाथ मंदिर

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प्रमुख देवता: भगवान शिव

स्थान: वाराणसी, उत्तर प्रदेश

संस्थापक या पुन: निर्माता: मराठा शासक, इंदौर की अहिल्या बाई होल्कर

निर्माण का समय: 1780

काशी विश्वनाथ मंदिर भगवान शिव को समर्पित सबसे प्रसिद्ध हिंदू मंदिरों में से एक है|

यह वाराणसी, उत्तर प्रदेश, भारत में स्थित है। यह मंदिर पवित्र नदी गंगा के पश्चिमी तट पर स्थित है,

मान्यता के अनुसार वाराणसी स्थित काशी विश्वनाथ जी का मंदिर बारह ज्योतिर्लिंगस में से एक है,

काशी विश्वनाथ को मुख्य देवता विश्वनाथ या विश्वेश्वर नाम से जाना जाता है जिसका अर्थ है ब्रह्मांड के शासक है।

वाराणसी शहर के कई नाम है जिसमे काशी भी एक है ,। इसलिए मंदिर को काशी विश्वनाथ मंदिर कहा जाता है।

काशी विश्वनाथ के कुछ रोचक तथ्य -

कहा जाता है , कि गंगा किनारे बसी काशी नगरी भगवान शिव के त्रिशुल की नोक पर बसी है |

गंगा के तट पर हुई यह काशी नगरी वास्तव में पाप-नाशिनी है। भगवान शंकर को यह गद्दी अत्यन्त प्रिय है इसीलिए उन्होंने इसे अपनी राजधानी एवं अपना नाम काशीनाथ रखा है।

इतिहासकारों के अनुसार इस भव्य मंदिर को सन् 1194 में मुहम्मद गौरी द्वारा तोड़ा गया था। इसे फिर से बनाया गया, लेकिन एक बार फिर इसे सन् 1447 में जौनपुर के सुल्तान महमूद शाह द्वारा तोड़ दिया गया। पुन: सन् 1585 ई. में राजा टोडरमल की सहायता से पं. नारायण भट्ट द्वारा इस स्थान पर फिर से एक भव्य मंदिर का निर्माण किया गया|

वाराणसी कई शताब्दियों से हिन्दू मोक्ष तीर्थस्थल माना जाता है। शास्त्र मतानुसार जब मनुष्य की मृत्यु हो जाती है तो मोक्ष हेतु मृतक की अस्थियां यहीं पर गंगा में विसर्जित की जाती हैं। यह शहर सप्तमोक्षदायिनी नगरी में एक है।

इसीलिए अधिकतर लोग यहां काशी में अपने जीवन का अंतिम वक्त बिताने के लिए आते हैं और मरने तक यहीं रहते हैं।

शहरों और नगरों में बसाहट के अब तक के सबूतों के आधार पर एशिया का सबसे प्राचीन शहर वाराणसी को ही माना जाता है। इसमें लोगों के निवास के सबूत 3,000 साल से अधिक पुराने हैं। हालांकि कुछ विद्वान इसे करीब 5,000 साल पुराना मानते हैं, लेकिन हिन्दू धर्मग्रंथों में मिलने वाले उल्लेख के अनुसार यह और भी पुराना शहर है,

कोई भी वेद , पुराण उठाकर देखलो हर वेद में काशी का जिक्र किया गया है , यहाँ तक महाभारत में काशी का विवरण किया है |

काशी शहर को बनारस भी काशी की चीज़े विश्व प्रसिद्द है, चाहे वो संगीतकार , संगीत हो लेकिन जबसे काशी का नाम बनारस रखा गया तबसे बनारसी पान , बनारसी साड़ी , और बनारसी मक्खन मलाईये विश्व प्रसिद्द हैं , इनको खाने और खरीदने दुनिया भर से लोग आते हैं | चाहे आम आदमी हो बड़ा पैसे वाला बनारसी जादू से नहीं बच सकता |

5. अमरनाथ मंदिर || AMARNATH MANDIR

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प्रमुख देवता: भगवान शिव

स्थान: जम्मू एवं कश्मीर

संस्थापक या पुन: निर्माता: रानी सूरमाती

निर्माण का समय: 11th Century

हिन्दू धर्म का सबसे प्रमुख तीर्थ स्थल अमरनाथ धाम को माना जाता है। अमरनाथ में बर्फ से प्राकृतिक शिवलिंग बनते हैं ।

अमरनाथ धाम की यात्रा जून के महीने के बाद शुरू होती है ,हर साल इस एक महीने में लाखों भक्त अपने बाबा बर्फानी अमरनाथ यात्रा का हिस्सा बनते हैं |

कश्मीर की राजधानी श्रीनगर के उत्तर-पूर्व में 135 किलोमीटर दूर एवं समुद्र तल से 13 हजार 600 फुट की ऊंचाई पर यह मौजूद है।

इस यात्रा के वक़्त लोगों को कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है | यहां बनने वाला शिलिंग बारह ज्योतिर्लिंग में से एक है।

प्राचीनकाल में इसे 'अमरेश्वर' कहा जाता था। क्यूंकि वास्तव में यह अमरेश्वर महादेव का स्थान है|

अमरनाथ के स्थानीय इतिहासकार मानते हैं कि 1869 के ग्रीष्मकाल में गुफा की खोज की गई और पवित्र गुफा की पहली औपचारिक तीर्थयात्रा 3 साल बाद 1872 में आयोजित की गई थी।

अमरनाथ गुफा को 5 हजार वर्ष पुराना मानते हैं अर्थात महाभारत काल में यह गुफा थी। लेकिन यह मानना गलत भी हो सकता है क्यूंकि हिमालय के प्राचीन पहाड़ों को लाखों वर्ष पुराना माना जाता है। उनमें कोई गुफा बनाई गई होगी तो वह हिमयुग के दौरान ही बनाई गई होगी अर्थात आज से 12 से 13 हजार वर्ष पूर्व। तो ये बात साफ़ नहीं है कि ये गुफा कितनी पुरानी है |

पुराणों के अनुसार काशी में दर्शन से दस गुना, प्रयाग से सौ गुना और नैमिषारण्य से हजार गुना ज्यादा पुण्य बाबा अमरनाथ के दर्शन में है | और कहा जाता है जो कैलाश जाता है है वो मोक्ष पता है और ये पुराण महाभारत के वक़्त लिखे गए थे

बर्फ का शिवलिंग कश्मीर को छोड़कर विश्व में कहीं भी नहीं मिलता।

बताया जाता है कि भगवान शिव ने माता पार्वती को इसी अमरनाथ गुफा में अमर कथा सुनाई थी। बताया जाता है कि जिस दौरान भगवान शिव माता पार्वती को यह कथा सुना रहें थे उस समय उनके अलावा एक कबूतर का जोड़ा मौजूद था। जो यह सुनकर अमर हो गया एवं आज भी अमरनाथ के दर्शन करने जाने वाले श्रद्धालुओं को यह कबूतर का जोड़ा दिखाई देता है।

यानी जीवन में एक बार बाबा अमरनाथ के दर्शन कर लिए और इस यात्रा का हिस्सा बन गए तो आपका जीवन सफल है और मृत्यु के बाद आपको प्राप्ति भी होती है , बाबा बर्फानी को देखने देश विदेश से लोग आते हैं ,क्यूंकि यहाँ बहुत शांति और पवित्रता है ,और इस जगह भगवान् शिव यानी बाबा अमरनाथ और माता पार्वती वास है | तो एक बार जीवन में बाबा अमरनाथ के दर्शन जरूर करें |

आशा करते हैं आपको भारत के 5 प्रसिद्द मंदिरों के बारे में पढ़कर अच्छा लगा होगा |





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