सनातन में समाजिक दूरी की मान्यता :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

27 मार्च 2020   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (296 बार पढ़ा जा चुका है)

सनातन में समाजिक दूरी की मान्यता :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म पूर्ण वैज्ञानिकता पर आधारित है , हमारे पूर्वज इतने दूरदर्शी एवं ज्ञानी थे कि उन्हेंने आदिकाल से ही मानव कल्याण के लिए कई सामाजिक नियम निर्धारित किये थे | मानव जीवन में वैसे तो समय समय पर कई धटनायें घटित होती रहती हैं परंतु मानव जीवन की दो महत्त्वपूर्ण घटनायें होती हैं जिसे जन्म एवं मृत्यु कहा जाता है | किसी नये जीव का जन्म लेना एवं किसी जीव का इस संसार को छोड़कर जाना अर्थात उसकी मृत्यु हो जाना इस सृष्टि की दो महत्वपूर्ण घटनायें हैं | इन दोनों ही अवसर पर हमारे पूर्वजों ने कुछ विशेष नियम मानवमात्र के लिए निर्धारित किये थे | मानव जीवन को कई प्रकार से प्रभावित करने वाले संक्रमणों से बचने के लिए ही इन नियमों को बनाया गया था | सन्तान का जन्म होने पर नवजात शिशु एवं प्रसूता (माता) को परिवार के सम्पर्क से दूर करते हुए एक कमरे में स्थान दिया जाता था जिससे कि जन्म देते समय प्रकट हुआ संक्रमण परिवार के अन्य सदस्यों को न संक्रमित कर पाये | यह सामाजिक दूरी (सोशल डिस्टेंसिंग) सवा महीने की होती थी | उसी प्रकार किसी की मृत्यु पर दाहक्रिया करने वाला भी दस दिन तक समाज से दूर रहा करता था , क्योंकि हमारे पूर्वजों का मानना था कि दाहक्रिया करते समय मृतक के शरीर से निकले हुए अनेक कीटाणु / विषाणु दाहकर्ता के सम्पर्क में आये होंगे किसी अन्य को वे संक्रमित न कर सकें इसीलिए दाहकर्ता दस दिन तक सामाजिक दूरी (सोशल डिस्टेंसिंग) के नियम का पालन करता रहा है | उसके अतिरिक्त हमारे दरवाजों पर एक बाल्टी में पानी भरा रखा होता था जिससे कि बाहर से आना वाला कोई भी हो हाथ - पैर धुलकर ही घर में प्रवेश करे जिससे कि उसके हाथ - पैरों के माध्यम से कोई संक्रमित कीटाणु घर में प्रवेश न कर पाये | यह सनातन के नियम थे जिसका पालन यत्र तत्र आज भी देश के गाँवों में देखने को मिल जाता है , लेकिन धीरे - धीरे हम आधुनिक होते गये और उपरोक्त सारे नियम हमको पिछड़ापन एवं गंवारपन लगने लगा , बम अपनी मान्यताओं से दूर होकर आधुनिकता की चकाचौंध में खोते चले गये | आज सन्तान का जन्म होने पर माता एवं नवजात शिशु की सामाजिक दूरी लगभग समाप्त सी होती दिख रही है यही कारण है कि लोग अनेक प्रकार के रोगों से ग्रसित हो रहे हैं | सनातन. की कोई भी मान्यता महज दिखावा नहीं बल्कि ठोस कारणों पर आधारित थी परंतु आज का मनुष्य उसके रहस्यों को समझ पाने में सक्षम नहीं रह गया है | आज समय परिवर्तित हुआ तो सामाजिक दूरी का महत्त्व लोगों की समझ में आने लगा है |*


*आज समस्त विश्व में लोग सनातन की प्राचीन मान्यताओं को मानने पर बाध्य हो रहे हैं | विश्व का प्रत्येक देश सामाजिक दूरी बनाये रखने की अपील कर रहा है | आज कोरोना संक्रमण ने समस्त विश्व में कोहराम मचा रखा है , एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलने वाले इस संक्रमण ने समूचे विश्व को हिलाकर रख दिया है , लाखों व्यक्ति इस संक्रमणीय महामारी से प्रभावित हो गये हैं | चिकित्सा पद्धति में महारत हासिल कर चुके मनुष्य को इस बीमारी की चिकित्सा नहीं मिल पा रही है | यदि बीमारी होती तब तो चिकित्सा संभव थी परंतु यह महामारी है महामारी की चिकित्सा ईश्वर के अतिरिक्त कोई नहीं कर सकता | ईश्वर एवं सनातन की मान्यताओं का मजाक उड़ाने वाले आज सामाजिक दूरी बनाकर अपने घरों में बैठे बैठे उसी ईश्वर से प्रार्थना कर रहे है कि इस महामारी से बचाईये | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" आज समूचे विश्व में हो रही तालाबन्दी (लॉकडाउन) को देख रहा हूँ , यह तालाबन्दी इसलिए हो रही है कि लोग एक दूसरे से दूर रहें जिससे कि कोरोना का संक्रमण एक दूसरे में फैलने न पाये | मैं गर्व करता हूँ अपने पूर्वजों पर ( जिन्हें आज के तथाकथित गंवार एवं पिछड़ा कहा करते हैं ) जिन्होंने संक्रमणीय रोगों में सामाजिक दूरी का पालन बहुत पहले से करना प्रारम्भ कर दिया था | आज के आधुनिक मनुष्य को अपना जीवन बचाने के लिए सनातन की मान्यताओं के अतिरिक्त अन्य कोई भी मार्ग नहीं दिखाई पड़ रहा है | सनातन की प्रत्येक मान्यता मे मानवमात्र का कल्याण निहित है , अभी भी समय है कि हम इन मान्यताओं को पिछड़ापन न मानकरके इन्हें अपना कर इस महामारी के संकटकाल में इस संक्रमण को रोकते हुए सामाजिक दूरी बनाने का प्रयास करें ! अभी तक जो गल्ती करते रहे हैं उसे अब न दोहराया जाय तो शायद यह अनमोल जीवन बच जाय !*


*सुबह का भूला यदि शाम को घर आ जाय तो उसे भूला नहीं कहते हैं इस सूक्ति को ध्यान में रखते हुए आओं लौट चलें सनातन मान्यताओं की ओर |*

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