जिंदगी सुखद संयोगो का खेल है .

27 मार्च 2020   |  विजय कुमार तिवारी   (281 बार पढ़ा जा चुका है)

कहानी

जिन्दगी सुखद संयोगों का खेल है।

विजय कुमार तिवारी

रमणी बाबू को भगवान में बहुत श्रद्धा है।उसके मन मेंं यह बात गहरे उतर गयी है कि अच्छे दिन अवश्य आयेंगे।अक्सर वे सुहाने दिनों की कल्पना में खो जाते हैं और वर्तमान की छोटी-छोटी जरुरतों की लिस्ट बनाते रहते हैं।गाँव के लड़के स्कूल साईकिल पर जाते थे तो वे मन मसोसकर रह जाते।पढ़ायी में भी कभी खास नहीं रहे,बस पास हो जाते थे और हर साल घर में चन्द दिनों के लिए खुशी का माहौल बन जाता था।दो बातों के लिए बाबू जी खुश होते,एक उनका फेल नहीं होना,जबकि उनके सहपाठी अक्सर अपनी कक्षाओं में लुढ़कते रहते थे।उन्होंने एक दिन सुन लिया,बाबूजी मांं को सुना रहे थे,"रमणी ने कभी ऐसा कुछ नहीं किया कि उसकी हुड़दंगयी या शरारत की कोई शिकायत मिली हो और हर साल पढ़ायी में पास हो जाता है।"

अपनी छोटी सी आय में घर का सारा बोझ उठाते हुए बाबू जी ने रमणी की पढ़ायी जारी रखी और अन्ततः उसने स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली।घर ही नहीं,पूरे गाँव के लिए यह बड़ी उपलब्धि थी।बाबू जी को खुश देखकर रमणी बाबू भी प्रसन्न थे।उनको उम्मीद हो चली कि कोई न कोई नौकरी लग ही जायेगी और वे अपनी सारी ईच्छायें पूरी कर पायेंगे।

गाँव में ब्रह्मस्थान और काली माई का छोटा सा मन्दिर है।आस्था के ये दोनों केन्द्र उन्हें वो सबकुछ सहज ही सुलभ करवाते रहते हैं जिनकी मनोकामना होती है।अब तो नौकरी जैसी बड़ी चीज की जरुरत है।वे मानते हैं कि भगवान निराश नहीं करेंगे।हुआ भी ऐसा ही।उन्होंने नौकरी के लिए कई जगह आवेदन कर रखा है और सरकारी,गैर-सरकारी विभागों की परीक्षायें भी दी हैं।

भगवान ने सुन ली।लिखित परीक्षा पास होने का पत्र मिला।साक्षात्कार के लिए बुलाया गया तो सहसा विश्वास ही नहीं हुआ।उन्हें अपनी काबिलियत पर जरा भी भरोसा नहीं था।जब भी वे परीक्षा के दिन की घटनाओं को व्यौरेवार याद करने की कोशिश करते तो इतना ही समझ पाते कि शहर गये थे,भागते-भागते परीक्षा-केन्द्र पहुँचे थे और उनके सामने परीक्षाा की पुस्तिका रखी गयी थी।दो सत्रों में परीक्षा हुई थी परन्तु उनको कुछ भी याद नहीं।बहुत कोशिश करने पर आसपास बैठे लड़कों के कुछ धूमिल चेहरे और दो-तीन लड़कियों के अक्स उभरते थे।उन्होंने क्या-क्या लिखा और क्या-क्या प्रश्न थे,कुछ भी उनकी स्मृति में नहीं उभरता।उन्होंने मान लिया कि भगवान ने ही आकर उनकी स्मृति का हरण कर लिया और कृपा करके पास करवा दिया।साक्षात्कार के दिन की कहानी भी उनकी साक्षात् कृपा का ही प्रमाण है वरना उनका तो मुँह ही नहीं खुलने वाला था।इतना याद है कि अनेक लड़के-लड़कियाँ बड़े से हाल में गुरु-गम्भीर अवस्था में बैठे थे।कभी-कभी आपस में दबीजबान और कभी खूब घुलमिल कर बातें करते थे।रमणी का कोई पूर्वपरिचित नहीं था।उनकी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था।थोड़ी देर बाद एक लड़का आकर बगल में बैठा।उसने पूछा,"आप कुछ ज्यादा ही परेशान दिख रहे हैं।"रमणी बाबू ने किंचित मुस्कराना चाहा।उनकी हँसी भी बेजान सी लगी।वह बहुत बातूनी था और उसने बहुत से टिप्स दिये।मसलन,यह हमारे ज्ञान की परीक्षा नहीं है;इसमें हमारा धैर्य,व्यवहार,स्थिति को सम्भाल लेने की क्षमता आदि को ही परखा जाता है।लोग बहुत आत्मीय होते हैं।उसकी मुस्कराहट,उसकी बातें और उसका आत्मविश्वास देखकर रमणी बाबू की दशा भी थोड़ी सामान्य हुई।

ऐसा ही हुआ।सबकुछ सहज ढंग से हो गया।वापस आते समय रमणी बाबू ने दिनभर के सारे हालात पर गौर किया,उनके जेहन में मानो बिजली कौंध गयी,"यह सब भगवान की ही लीला है।वह लड़का कोई और नहीं,भगवान जी ही थे।अन्तर्मन खिल उठा और नौकरी मिल जाने का विश्वास पुख्ता हुआ।

योगदान देने के पहले विभाग के क्षेत्रीय कार्यालय में बुलाया गया था।रमणी बाबू कभी इतने बड़े शहर में नहीं गये थे।तीन दिनों तक अपनी व्यवस्था में रहना था,सारे मूल प्रमाणपत्र जमा करने थे,मेडिकल जाँच होनी थी और उसके बाद प्रशिक्षण। अनजाने शहर की कोई जानकारी नहीं थी।बाबू जी के किसी परिचित ने एक ट्रान्सपोर्ट कम्पनी की गद्दी का पता दिया।जिस दिन निकलना था,उसके एक दिन पहले रमणी बाबू के शिक्षक मिले।"कैसे हो रमणी? क्या कर रहे हो?"उन्होंने पूछा।

रमणी बाबू ने श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया और उत्साह से कहा," कल ही नौकरी में योगदान देने शहर जा रहा हूँ।"

"शाम में मेरे घर आओ।मेरा बड़ा दामाद विजय वहीं है।बेटी विजया भी है।तुम्हें उनके नाम पत्र दूँगा,जाकर मिलना और दे देना।"

रमणी बाबू भोर में स्टेशन उतरे और पता लगाते हुए ट्रान्सपोर्ट कम्पनी की गद्दी पर पहुँचे।वहाँ कम्पनी के मैनेजर ने उत्साहपूर्वक स्वागत किया,खुशी जतायी,चाय पिलायी और बोले,"इतनी बड़ी गद्दी है,खूब आराम से रहिये।रमणी बाबू ने स्नान किया,कपड़े बदले,कचौड़ी-पूड़ी-जलेबी का नाश्ता किया और रिक्शे से कार्यालय के विशाल भवन में पहुँचे।

पहले उन्होंने अधिकारी से भेंट की,अपने मूल प्रमाणपत्र दिखाये और आवश्यक कार्यवाही पूरी की।तदन्तर पता लगाकर अपने शिक्षक के दामाद विजय भैया से मिले और पत्र दिया।

रमणी बाबू की आँखें भर आयीं और उन्होंने अपने भगवान की इस सुखद कृपा पर हृदय से आभार जताया।पत्र पढ़ते ही विजय भैया के चेहरे पर खुशी फैल गयी।वे पूरी आत्मीयता के साथ सक्रिय हो उठे।फिर तो मेडिकल जाँच,इस टेबुल,उस टेबुल जहाँ जैसी जरुरत हो रमणी बाबू को साथ लिये दौड़ते-भागते रहे।कैन्टिन में दोपहर का भोजन करवाया।शाम हुई तो रिक्शा पर बैठाया,गद्दी पर गये,सामान लिया और अपने घर लिवा ले गये।

घर में पत्नी विजया जी,मां और बच्चे थे।तीन दिन उनके साथ स्नेह और आत्मीयता में ऐसे बीते कि यादगार बन गये।प्रशिक्षण केन्द्र के लिए रिक्शा पर बैठने के पहले उन्होंने माताजी और विजय भैया के चरण छुए।मुस्कराती हुई विजया जी ने कहा, "फिर आईयेगा।आपके बिना सूना लगेगा और बच्चे भी आपको खोजेंगे।"तदन्तर अनेकों बार उन्होंने उनका आतिथ्य ग्रहण किया और हर बार परमात्मा को ऐसे प्रियजनों से जोड़ देने पर हृदय से आभार प्रकट किया।रमणी बाबू ने महसूस किया कि जिन्दगी सुखद संयोगों का खेल है।

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