बस सिर्फ पन्द्रह दिन और

30 मार्च 2020   |  कात्यायनी डॉ पूर्णिमा शर्मा   (242 बार पढ़ा जा चुका है)

बस सिर्फ पन्द्रह दिन और

*बस! सिर्फ पन्द्रह दिन और !!*
*डॉ दिनेश शर्मा*
मुझे लगता है कि कोरोना के खिलाफ इस महायुद्ध में कुछ अपवादों को छोड़कर जिस तरह देश की बड़ी जनता ने पिछले आठ दिनों में धैर्य, संकल्प और साहस का परिचय दिया है - वो पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल बनने वाला है । जिस कठोर व्यवस्था और लॉक डाउन को मात्र एक प्रोविन्स में लागू करने के लिए चीन जैसी निरंकुश तानाशाही व्यवस्था को पसीना आ गया और 'उल्लंघन करने पर देखते ही गोली मारने का' आदेश जारी करना पड़ा - वैसी ही व्यवस्था को एक सौ तीस करोड़ की जनसंख्या वाले इस देश ने न सिर्फ स्वीकार किया बल्कि सहयोग देने में भी पूरी भावना से आगे आ गए ।

इस देश में बहुत खामियां हो सकती है, गंदगी मच्छर कूड़े के ढेर, गलियों में घूमते आवारा कुत्ते सूवर और राजपथ पर बैठी जुगाली करती गायें हो सकती है -भ्रष्ट राजनेता पुलिस और सरकारी कर्मचारी हो सकते है, प्रायोजित हिन्दू मुस्लिम दंगे हो सकते हैं -पर इस मुल्क का परस्पर सहयोग का जो जज्बा है - वो बेमिसाल है । पूरे देश में भंडारे शुरू हो गए है । लोग घरों में खाना बनाकर पैक करके गरीबों को भिजवा रहे हैं । अपने लेवल पर सामान्य और साधारण लोग दिल खोल कर आटा, चावल, दाल, चीनी सब्ज़ियां वगैरा बांट रहे है, खाली खड़े रिक्शावालों को राशन और पैसा दे रहे हैं । गुरद्वारों में बड़े पैमाने पर चौबीसों घंटे लंगर शुरू हो गए है । देश के मन में किसी को भूखा न मरने देने का बृहत संकल्प पैदा हो गया है ।

बहुत लोगों ने अपनी सामर्थ्य के हिसाब से दान के रूप में सरकार से आर्थिक सहयोग भी करना शुरू कर दिया है । भले ही टाटा ग्रुप का 1500 करोड़ का और अक्षय कुमार का 25 करोड़ का संकल्प मीडिया में ज्यादा सुर्खियां बटोर रहा है पर लाखो लोग अपने अपने स्तर पर दिन रात जुट रहे है और दूसरों की सहायता कर रहे हैं । चालीसों देशों की सैंकड़ों यात्राएं करने और उन देशों के बारे में बहुत कुछ जानने के बाद में दावे के साथ कह सकता हूँ कि इस देश की, इस देश के लोगों की बात ही कुछ और है ।

बस पन्द्रह दिन की बात और है । अभी तक हमने बहुत कुछ संभाल कर रक्खा है । मुझे पूरा विश्वास है कि इस क्राइसिस के बाद पूरी दुनिया आने वाले दशकों और सदियों में हमारे देश की मिसाल देगी । क्योंकि विश्वास रखिये हम मिसाल बनने वाले हैं ।

यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रूमा, सब मिट गए जहाँ से।
अब तक मगर है बाक़ी, नाम-ओ-निशाँ हमारा।।
कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी।
सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-ज़माँ हमारा।।

https://shabd.in/post/112734/bas-do-hafte-aur-dinesh-doctor

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