Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) History in Hindi

31 मार्च 2020   |  मोनिका चौधरी   (265 बार पढ़ा जा चुका है)

Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) History in Hindi

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) का इतिहास (Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) History in Hindi)-

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आरएसएस का पूरा नाम राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ हैं. इस संगठन का राजनीति से सीधा कोई सम्बंध नहीं हैं लेकिन भारत में ये स्वयंसेवी संस्था ना केवल राजनैतिक बल्कि सामजिक परिवेश में भी महत्वूर्ण स्थान रखती हैं. संघ के अस्तित्व को समझने के लिए ये समझना जरुरी हैं कि भारत अति-प्राचीन देश हैं और यह विज्ञान,आर्ट्स,टेक्नोलॉजी,एग्रीकल्चर,आध्यात्म,दर्शन-शास्त्र और अन्य कई क्षेत्रों में सदियों से आगे रहा हैं, लेकिन यहाँ पर हुए विभिन्न आक्रमणों ने इसकी सभ्यता और संस्कृति को नष्ट करने का प्रयास किया,जिसे भविष्य में बचाए रखने के लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की आवश्यकता महसूस हुई

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कैसे हुई ? राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना-

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना केशवराम बलिराम हेडगेवार जी के द्वारा की गयी थी , जिनका जन्म 1889 में हुआ था और जिनकी मृत्यु स्वतन्त्रता से पूर्व 1940 में ही हो गयी थी. केशव पेशे से डॉक्टर थे, और महाराष्ट्र में रहते थे. उनमे बचपन से ही अंग्रेजों के अत्याचार के प्रति आक्रोश और देश के लिए कुछ करने का जज्बा था. वो वीर विनायक दामोदर सावरकर के हिंदुत्व से प्रभावित थे और उन्हें एक ऐसी संस्था की आवश्यकता महसूस हुयी जो समाज के हर वर्ग को जोडकर एक सशक्त समाज का निर्माण कर सके. इसलिए 27 सितम्बर 1925 को विजयादशमी के शुभदिन पर नागपुर में उन्होंने कुछ युवाओं को एकत्र करके राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना की. उसके बाद वहाँ रोज शाखा लगने लगी,जहाँ पर नियमित शाखा,प्रार्थना,खेल जैसी गतिविधियाँ होने लगी.धीरे-धीरे ये शाखाएं पूरे शहर और फिर देश में फ़ैल गयी,और आज देश के कोने-कोने में संघ का प्रभाव देखा जा सकता हैं.

केशवराम बलिराम हेडगेवार जी वास्तव में डॉक्टर केशव, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक,डॉक्टर मुंजे और लोकनायक एम.एस. अने के करीबी थे उन्होंने इंडियन नेशनल कांग्रेस में भी जिम्मेदार पद पर थोड़े समय के लिए काम किया था और 1920 के प्रारम्भ तक उन्होंने हिन्दू महासभा से भी जुड़े हुए थे.

दो दर्जन से कम लोगों ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की शुरुआत की थी -

संघ के प्रथम सरसंघचालक हेडगेवार ने अपने घर पर 17 लोगों के साथ गोष्ठी में संघ के गठन की योजना बनाई. इस बैठक में हेडगेवार के साथ विश्वनाथ केलकर, भाऊजी कावरे, अण्णा साहने, बालाजी हुद्दार, बापूराव भेदी आदि मौजूद थे.

उन दिनों हेडगेवार की पब्लिक स्पीच बहुत ही ज्यादा रोचक और लोकप्रिय होने लगी थी. उन्होंने साफ़ कहा था कि “केवल वोही सरकार शासन कर सकती हैं जो आम-लोगों की सरकार हो,यूरोपियन जो खुको इस देश का शासक समझते हैं,उन्हें समझ जाना चाहिए कि अब उनके देश छोड़ने का समय आ गया हैं. उन्हें एक साल का कारवास भी मिला था,जेल से छूटने के बाद भी हेडगेवार बहुत से सामाजिक और राजनीतिक गतिविधयों में सक्रिय थे.


ऐसे नाम पड़ा आरएसएस-

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ यह नाम अस्तित्व में आने से पहले विचार मंथन हुआ. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जरीपटका मंडल और भारतोद्वारक मंडल इन तीन नामों पर विचार हुआ. बाकायदा वोटिंग हुई नाम विचार के लिए बैठक में मौजूद 26 सदस्यों में से 20 सदस्यों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अपना मत दिया, जिसके बाद आरएसएस अस्तित्व में आया.

'नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे' प्रार्थना के साथ पिछले कई दशकों से लगातार देश के कोने कोने में संघ की शाखायें लग रही हैं. हेडगेवार ने व्यायामशालाएं या अखाड़ों के माध्यम से संघ कार्य को आगे बढ़ाया. स्वस्थ और सुगठित स्वयंसेवक होना उनकी कल्पना में था.


केशवजी के बाद उनका पद माधवजी ने सम्भाला था,और इसके बाद संगठन प्रमुख का पद (जिसे सरसंघचालक कहते हैं) निम्न अधिकारियों को मिलता गया.

समय नाम

1925 से 1940 तक डॉक्टर केशवराव बलिराम हेडगेवार

1940 से 1973 माधवराव सदाशिवराव गोलवरकर

1973 से 1994 बाला साहेब देवरस

1994 से 2000 प्रोफेसर राजेन्द्र सिंह

2000 से 2009 के.एस. सुदर्शन

2009 से वर्तमान डॉक्टर मोहनराव भागवत

क्या है ? संघ की कार्यप्रणाली -

बहुत से युवा लड़कों का एक समूह एक जगह इकठ्ठा होता है ,और एक केसरिया रंग का ध्वज जिसे भगवा कहते हैं उस ध्वज को सम्मान के साथ फहराया जाता है | साथ ही संघ की प्रार्थना (नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमि) होती है ,उसके बाद कई तरह की एक्सरसाइज होती हैं.जिनमे सूर्यनमस्कार भी शामिल हैं.

शाखा के कार्यकर्ताओं को स्वयंसेवक कहा जाता हैं, सभी स्वयंसेवकों के पास एक लकड़ी का “दंड” होता हैं,इससे विविध युद्ध कौशल के अभ्यास किये जाते हैं.

संघ में अनुसाशन का ख़ास ध्यान रखा जाता है ,संघ में प्रार्थना और ग्रुप लीडर की सभी घोषणाएं संस्कृत में होती हैं. प्रार्थना के अंत में “भारत माता की जय” का नारा लगाया जाता हैं.

शाखा किसी भी व्यक्ति में देश-प्रेम की भावना जगाने का काम करती हैं. संघ के ढाँचे में कार्यवाहक से लेकर शाखा संचालित करने वाले तक के लिए विभिन्न पद होते हैं. और इन पदों पर कार्यरत स्वयंसेवकों का निर्धारण उनके अनुभव और शाखा या संघ सम्बन्धित गतिविधियों में क्रियाशीलता पर होता हैं.

संघ में स्वयंसेवकों के लिए अलग -अलग स्तर पर संघ-शिक्षा वर्ग आयोजित किये जाते हैं,संघ वर्ष भर में 6 राष्ट्रीय कार्यक्रम- नववर्ष-प्रतिपदा जो कि हिन्दू नव-वर्ष हैं, ज्येष्ठ चतुर्दशी को हिन्दू साम्राज्य दिनोत्स्व, छत्रपति शिवाजी के राज्याभिषेक का दिवस,आषाढ़ पूर्णिमा को गुरुपूजा,श्रावण पूर्णिमा को रक्षा बंधन,विजयादशमी और मकर संक्रांति मनाता हैं. वर्ष में तरह-तरह के उत्सवों पर स्वयंसेवकों का पद-संचालन भी होता हैं,जिनमें गणवेश पहने स्वयमसेवक अनुशासित पंक्तियों में शहर भर में घूमते हैं,और कई जगह उनका फूलों से स्वागत भी किया जाता हैं. इसके अलावा संचालन में एक बैंड भी होता है,इन सबका प्रशिक्षण शाखा के विभिन्न वर्गों में दिया जाता हैं.


क्या है ? संघ का उद्देश्य -

हिन्दू संगठन के रूप में विख्यात आरएसएस का उद्देश्य देश में सामजिक समरसता,शान्ति और भारतीय संस्कृति की रक्षा करना हैं.

संगठन का अनुशासन और समाज के लिए नि:स्वार्थ सेवा ही इसकी पहचान हैं.

राष्ट्र पर आई कोई भी आपदा प्रबन्धन में इसके कार्यकर्ता जिस तरह सेवा को आगे आते हैं उस हिसाब से इसे भारत की घरेलू और अनऑफिशियल आर्मी भी कहा जा सकता हैं.

संघ की संरचनात्मक इकाई शाखा हैं. और बिना किसी वेतन के भी अपने कर्तव्य के लिए प्रतिबद्ध इसके कार्यकर्ताओं के लिए अनुशासन और देश ही सर्वोपरी हैं. संघ का मुख्य उद्देश्य देश की धरोहर यानि भारत की संस्कृति को बचाना और रक्षा करना है |


स्वतंत्रता से पहले वाला संघ -

संघ का उद्देश्य भी देश को स्वतन्त्रता दिलाना ही था ,लेकिन डॉक्टर हेडगेवार का कहना था कि यदि अंग्रेज देश छोडकर चले भी जाए तो भी देश तब ही सशक्त बनेगा जब यहाँ का हिन्दू संगठित होगा,वरना क्या गारंटी हैं कि हम अपनी स्वतन्त्रता की रक्षा कर पाएंगे? उनके शब्द सही सिद्ध हुए देश स्वतंत्र तो हो गया लेकिन पंजाब,बंगाल,सिंध जैसे क्षेत्र भारत से टूटकर अलग हो गए. यही नहीं स्वतन्त्रता के बाद इतने वर्ष बीत जाने पर भी कश्मीर अभी तक पूरा भारत के पास नहीं हैं. आसाम में मुस्लिम बाहुल क्षेत्र में राज्य की मांग,नागालैंड में क्रिश्चयनीटी की समस्या हैं. ऐसे में संघ की भूमिका ना केवल हिंदुत्व को बचाए रखने बल्कि देश के कई राज्यों में संघ गरीब वर्ग को किसी भी रह के कन्वर्जन से या आपदाओं से बचाने का और वंचित वर्ग को समाज की मुख्यधारा में लाने काम देखता भी हैं. इसी तरह स्वतन्त्रता से पूर्व भी जब देश बंटवारे की तयारी होते देख रहा था तब संघ ने समाज के विभिन्न तबकों को जोड़े रखने में मुख्य भूमिका निभाई थी.


स्वतंत्रता के बाद संघ -

देश जब स्वतंत्र हुआ तब सरसंघचाक के पद पर माधवसदाशिव राव गोलवरकर थे,जिन्हें बाबाजी कहा जाता था. उन्होंने संघ के कार्य क्षेत्र को काफी विस्तार दे दिया था. वो स्वयंसेवकों से बहुत ही स्नेह ,ऊर्जा के साथ मिलते थे और उनके प्रयासों से आसाम और केरला तक संघ का काम फ़ैल चुका था, पहले जहां शाखा नागपुर,विदर्भ और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में लगती हैं वो स्वतंत्रता से पहले ही लाहौर,दिल्ली,वाराणसी,कलकता और मद्रास तक पहुच चुकी थी,और स्वतंत्रता के बाद सशक्त रूप से आगे बढ़ रही थी. इसके अलावा संघ से जुड़े कई अन्य संगठन जैसे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद,बीएमएस और बीकेवीएस इत्यादि भी बनने लगे थे. स्वतंत्रता के बाद गांधीजी की मृत्यु के समय संघ पर प्रतिबंध लगा था लेकिन बाद में कोई दोष सिद्ध ना होने की स्थिति में ये प्रतिबंध हटा लिया गया |


संघ पर लगे प्रतिबंध-

25 जून 1975 को जब इंदिरा गाँधी ने देश में इमरजेंसी की घोषणा तब सबसे पहले जिस संगठन पर प्रतिबंध लगा था वो संघ ही था.

4 जुलाई 1975 के दिन केंद्र सरकार ने संघ पर प्रतिबंध लगा दिया. 30 जून को आरएसएस के तत्कालीन सरसंघचालक बालासाहेब देवरस को नागपुर रेलवे स्टेशन पर गिरफ्तार कर लिया गया. ये वो समय था आरएसएस के नेता जो राजनीति में सक्रिय थे वो अन्य विपक्षी पार्टी के नताओं के काफी करीब आये थे.

1977 में जनता पार्टी के नेतृत्व में सरकार भी बनी थी,जिसमें,जनसंघ,कांग्रेस ओ(o),भारतीय लोक दल भी शामिल थे. लेकिन जल्दी ही जनता पार्टी के नेताओं जैसे राज नारायण और मधु लिमये ने बीजेएस के मंत्रियों के आरएसएस में भी मेम्बर होने पर सवाल उठा.

आखिर में 1980 में जनता पार्टी की सरकार गिर गई और उसी समय भारतीय जनता पार्टी का भी उदय हुआ.


संघ का एक चेहरा ये भी रहा-

संघ ने धीरे-धीरे अपनी पहचान एक अनुशासित और राष्ट्रवादी संगठन की बनाई. 1962 में चीन के धोखे से किए हमले से देश सन्न रह गया था. उस वक्त आरएसएस ने सरहदी इलाकों में रसद पहुंचाने में मदद की थी. इससे प्रभावित होकर प्रधानमंत्री नेहरू ने 1963 में गणतंत्र दिवस की परेड में संघ को बुलाया था. 1965 में पाकिस्तान से युद्ध के दौरान दिल्ली में ट्रैफिक व्यवस्था सुधारने में संघ ने मदद की थी. 1977 में आरएसएस ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को विवेकानंद रॉक मेमोरियल का उद्घाटन करने के लिए बुलाया था.


तिरंगे का भी विरोध कर चुका है संघ-

आरएसएस के मुखपत्र द ऑर्गनाइजेशन ने 17 जुलाई 1947 को नेशनल फ्लैग के नाम से संपादकीय में लिखा कि भगवा ध्वज को भारत का राष्ट्रीय ध्वज माना जाए. 22 जुलाई 1947 को जब तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज माना गया तो द ऑर्गेनाइजेशन ने ही इसका जमकर विरोध किया. काफी लंबे समय तक संघ तिरंगा नहीं फहराता था. हाल ही में आरएसएस ने अपने को बदला है. यहां तक कि आरएसएस के धुर विरोधियों ने भी उसे जगह देना शुरू किया.

संघ का काम राष्ट्र के निर्माण में सहयोग देना हैं,और इसके लिए संघ ने राजनीति में खुलकर योगदान ना दिया हो लेकिन बीजेपी को अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर नरेंद्र मोदी तक कई सशक्त प्रचारक दिए हैं,जिन्होंने पार्टी के साथ देश और राज्यों का नेतृत्व भी अच्छे से सम्भाला हैं. इस तरह देश के प्रमुख पदों तक योग्य व्यक्ति पहुचाने के अतिरिक्त संघ का कार्य छोटे से छोटे स्तर पर भी समाज-हित में काम करना ही हैं,जिसका ज्वलन्त उदाहरण केरल में आई बाढ़ आपदा में स्वयंसेवकों द्वारा दिया गया सहयोग हैं.

और आरएसएस साफ तौर पर हिंदू समाज को उसके धर्म और संस्कृति के आधार पर शक्तिशाली बनाने की बात करता है. संघ से निकले स्वयंसेवकों ने ही बीजेपी को स्थापित किया. हर साल विजयादशमी के दिन संघ स्थापना के साथ ही शस्त्र पूजन की परम्परा निभाई जाती है. देश भर में पथ संचलन निकलते हैं. कभी 25 स्वयंसेवकों से शुरू हुआ संघ आज विशाल संगठन के रूप में स्थापित है.


आशा करते हैं , कि आपको राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) का इतिहास (Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) के बारे में सभी जानकारी मिल गयी होगी |






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