आओ मिलकर दिया जलाएँ

04 अप्रैल 2020   |  कात्यायनी डॉ पूर्णिमा शर्मा   (282 बार पढ़ा जा चुका है)

आओ मिलकर दिया जलाएँ

आओ मिलकर दिया जलाएँ

कोरोना के संकट की इस घड़ी में प्रधानमंत्री जी ने कल समस्त जनता का आह्वाहन किया कि सभी 5 अप्रेल को रात्रि 9 बजे 9 मिनट के लिए आइए अपने घरों की लाइट्स बन्द करके घरों के दरवाजों या बाल्कनी में मोमबत्ती, दिया या टॉर्च जलाकर देश के हर नागरिक के जीवन में आशा का प्रकाश प्रसारित करने का प्रयास करें | उसके बाद से ही अनेकों विद्वानों ने ज्योतिष और अंक ज्योतिष आदि के आधार पर इस कार्यक्रम को परिभाषित करना आरम्भ कर दिया | वे सभी बधाई के पात्र हैं | बहुत से लोगों ने हमसे जानना चाहा कि हमारी इस विषय में क्या राय है, तो हम सभी से क्षमायाचना पूर्वक कहना चाहेंगे कि हमारे पास इतना ज्ञान नहीं है कि हम इस कार्यक्रम की परिभाषा किसी प्रकार से ज्योतिष अथवा हिन्दू धर्म के आधार पर कर सकें | कारण ?

मोदी जी ने ऐसा किसी अन्धविश्वास के कारण नहीं कहा है - हमारे जैसे ज्योतिषी भले ही ज्योतिष के आधार पर या धर्म के आधार पर इसकी समीक्षा करते रहें - लेकिन ये सत्य है कि मोदी जी जैसा तरक़्क़ीपसन्द और दूरदर्शी प्रधानमन्त्री - जिसके निर्णयों का आज समूचा विश्व क़ायल है - कभी भी अन्धविश्वासी नहीं हो सकता | एक ही तारीख को एक ही समय दीप प्रज्वलित करने के पीछे भावना यही है कि सामूहिक रूप से ऐसा करने से हम उस महाशक्ति का जागरण करने में समर्थ हो जाएँगे जिसे सामूहिक चेतना यानी Collective Consciousness कहा जाता है फिर चाहे इसके लिए पाँच अप्रैल नियत की जाती या कोई दूसरी तारीख़ | रात्रि को नौ बजे का समय नियत करने का उद्देश्य हमारे विचार से यही है कि उस समय रात्रि अपनी युवा अवस्था में होती है, उस समय यदि घरों की बिजलियाँ बन्द करके अपने अपने स्थान पर रहते हुए ही सामूहिक रूप से दृढ़ संकल्प के साथ दीप प्रज्वलित किये जाएँगे तो उससे जो प्रकाश उत्पन्न होगा और जो उसकी प्रतिच्छाया समूचे वातावरण में प्रसारित होगी वह दृश्य इतना अद्भुत और नयनाभिराम होगा कि कोरोना जैसी विपत्ति के चलते लॉकडाउन से त्रस्त उदास मनों में आशा, उत्साह, उमंग का प्रकाश प्रसारित करने में और जन मानस में ये दृढ़ विश्वास उत्पन्न करने में कि हम शीघ्र ही इस आपत्ति पर विजय प्राप्त कर लेंगे - सक्षम होगा | रोग का निदान विज्ञान और औषधि के द्वारा ही सम्भव है, लेकिन विज्ञान, औषध विज्ञान और सामूहिक चेतना को यदि मिला दिया जाए तो सकारात्मक परिणाम प्राप्त होने में हमारे विचार से कोई सन्देह नहीं रह जाता |

तो इस अवसर को किसी भी धर्म, सम्प्रदाय, ज्योतिष आदि के द्वारा परिभाषित न करके अपने प्रधानमन्त्री जी के आह्वाहन पर केवल इसकी मूलभूत भावना को ध्यान में रखते हुए हम सभी कल यानी 5 अप्रेल को रात्रि 9 बजे 9 मिनट के लिए अपने घरों की लाइट्स बन्द करके अपने अपने दरवाज़ों पर या बाल्कनी में दीप प्रज्वलित करके इस आपदा से मुक्ति प्राप्त करने के लिए सामूहिक चेतना को जागृत करने का प्रयास करें ताकि देश के हर नागरिक के जीवन में आशा, विश्वास, प्रेम, उत्साह और उमंग का प्रकाश प्रसारित हो सके | ऐसा करके हम श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी के इस स्वप्न को भी सार्थक करने का प्रयास करेंगे...

आओ फिर से दिया जलाएँ
भरी दुपहरी में अँधियारा, सूरज परछाई से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़ें, बुझी हुई बाती सुलगाएँ ||
हम पड़ाव को समझे मंज़िल, लक्ष्य हुआ आँखों से ओझल
वर्तमान के मोहजाल में, आने वाला कल न भुलाएँ ||
आहुति बाकी, यज्ञ अधूरा, अपनों के विघ्नों ने घेरा
अंतिम जय का वज़्र बनाने, नव दधीचि हड्डियाँ गलाएँ ||
आओ फिर से दिया जलाएँ ||

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