ये लोग, खुद भी मरेंगे, हमको भी मारेंगे

04 अप्रैल 2020   |  सुमन पांडेय   (419 बार पढ़ा जा चुका है)

आज 22 मार्च 2020 को, 'जनता कर्फ्यू' का आवाहन हुआ है, और देश ने तय किया की हम अपनी बालकनी या दरवाजों पे खड़े होकर 5 मिनट के लिए स्वाथ्य और सफाई कर्मियों के द्वारा दिए जाने वाले त्याग और योगदान को सराहेंगे. बड़ा ही भव्य नज़ारा था, आँखों ने ऐसा दृश्य पहले कभी नहीं देखा था, भावविभोर हो उठी, देश की एकता को देखकर . उस वक़्त तो ध्यान नहीं आया की, सड़के जिनका घर हैं उन्होंने भी जमकर उतनी ही ताली बजाकर सराहना की, जितना हम बड़ी बालकनी वाले और घर वाले लोगो ने.


देश ने निर्णय किया की लॉक-डाउन करना ही एकमात्र उपाय है, इस भयंकर त्रासदी का सामना करने का, और सम्पूर्ण लॉक-डाउन का निर्णय हो गया. ट्रेन , बस , ऑटो, दुकाने सब बंद, सड़क पर दो से ज्यादा लोग न निकलें जैसे चेतावनी भी आ गयी.

लेकिन क्या हमें वो सड़क पर, बिना बालकनी और दरवाजे वाला देशवासी याद था तब? वही जिसने उतने ही बड़े दिल से स्वास्थ्यकर्मियों की सराहना की थी, जितने की हम घरो और बालकनी वालों ने. वही जिसकी चाय की टपरी पर हम बैठ के चाय की चुस्की लेते हुए, लाखो करोड़ों की बातें करते थे. क्या हमे याद था की हमारे बच्चो को जो रिक्शेवाला स्कूल ले के जाता है, उसके लिए भी तो लॉक-डाउन है. शायद नहीं , याद ही नहीं आये ये लोग.

वो पकौड़े और पराठे वाला जिसे हम बिज़नेस मैन भी कहते हैं संसद में, क्यूंकि ये अपने जैसे औरो को भी रोजगार देते हैं. वो मैगी और आमलेट वाला. ऑफिस में सिक्योरिटी गॉर्ड , ऑफिस की सफाई करने वाले लोग, हमारे आपके लिए चाय कॉफी सर्व करने वाले लोग. क्या हमें याद था की इनके पास सेविंग्स नहीं है, क्या पता घर भी न हो, कहा रहेंगे ये लोग अगर लॉक-डाउन हुआ तो.


ईश्वर का धन्यवाद की हमारे पास संसाधन और धन दोनों ही हैं. हमारी चिंताए थी की यार अब घर से बाहर नहीं जा पाएंगे, कोई पिक्चर नहीं देख सकेंगे , पार्टी नहीं कर पाएंगे, दोस्तों और रिश्तेदारों से मिल नहीं पाएंगे, काम पे नहीं जा पाएंगे. लेकिन मेरे ही घर की काम वाली बाई या उनके जैसे लाखो लोगो की चिंता ये थी की अब घर कैसे चलेगा, पैसे आएंगे भी की नहीं , रहेंगे कहा , कभी अपने घर लौट के जा पाएंगे क्या?

जबसे हमने इन बड़े और बंद घरो में रहना शुरू किया है, हमारे कानो और दिलो पर भी लोहे की जालियां पड़ी लगती हैं, जहां से हमे सेलेक्टिव सुनने और देखने की आदत हो गयी है.

क्या कभी हमने सोचा है की हर बेघर और शहर में रहने वाला इस आपदा में गांव क्यों लौटना चाह रहा था? आप भी सोचियेगा, मुझे लगता है की शायद उसे उम्मीद है की मेरा गांव मुझे भूख से मरने नहीं देगा.


देश के मुखिया और सभी नेताओ से सवाल ये की क्या शहरों में बिना घर और पर्याप्त राशन क रह रहे ये लोग 'मेरे प्यारे देश वासियो', भाइयो और बहनो' या फिर 'मित्रों' की कैटेगरी में आते हैं? और अगर आते हैं तो कही आप इन्हे कम्प्लीट लॉक-डाउन का आवाहन करते वक़्त, थोड़ी देर क लिए भूल तो नहीं गए थे? ईश्वर करे की ऐसा न हो, अगर ऐसा है तो याद दिला दू की ये वही लोग हैं जो आप लोगो की बड़ी बड़ी रैलियों और जनसभाओं को सफल बनाते हैं . क्यूंकि हम जैसे घरो और बालकनी वाले लोग ऑफिस की मार के बाद , AC कमरे में TV के सामने, किसी न्यूज़ रूम में एक AC में बैठ के, मौके का जायजा ले रहे news एंकर के प्रेजेंटेशन से जान जाते हैं की, रैली सफल रही. अगर आपसे ये भूल हुई है तो इसका प्रायश्चित क्या होगा ये मै आप पे छोड़ती हू.


जिन्हे हम अनपढ़, जाहिल या गवाँर कह रहे हैं, क्या हमने कभी खुद को उनकी जगह पे रख के सोचा है ? अगर आज हमारे सामने भूख से खुद को और अपने परिवार को मौत के मुँह में जाने से बचाने या फिर कोरोना से संक्रमित हो जाने के चांस , में से एक को चुनना हो तो किसे चुनेंगे?

हो सकता है की आपको जवाब मिल गया की इतने लोग सड़को पे क्यों उतर आये, हम लोगो में से बहुत से लोग समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी बखूबी निभा रहे हैं. उनको साधुवाद.

अगर आप हम सच में इनके या अपने लिए कुछ करना चाहते हैं तो व्यक्तिगत लेवल पे इनकी मदद कीजियेकरना होगा , बजाए इन्हे वायरस का करियर कह के कोसने के. क्यूंकि COVID-19 एक communal बिमारी है, इसे समाज के साथ मिल कर ही हराया जा सकता है. ये बचेंगे तभी हम और आप भी बचेंगे.

इनके बिना आपका काम भी नहीं चलेगा, लॉक-डाउन के बाद आपको काम पे जाना है और उसके लिए इनका काम पे लौटना निहायत ज़रूरी है. यही 'दीदी' 'भैया' बाज़ारों और त्योहारों की रौनक बढ़ाने में आप के पीछे खड़े रहकर आपको सहारा देते हैं , आज आप की बारी है . यही आप के महलो के बड़े बड़े सपनो को ईंट से ईंट जोड़कर पूरा करते हैं. ये कह दू तो बुरा मत मान जाइएगा की इस नए दौर में, इन्ही के जोर पे आप खुशहाल परिवार और बच्चो का सपना देखते हैं और उन्हें पूरा भी करते हैं.

सामाजिक सहिष्णुता और मनोरसता न ही सही पर क्या स्वार्थ भावना से ही सही, आप इनके लिए कुछ भी नहीं करना चाहते ? क्या अब भी आप यही कहोगे की 'खुद तो मरेंगे, साथ में हमें भी मारेंगे'?


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