बेटा-बेटी में भेदभाव

22 मई 2015   |  निवेदिता चतुर्वेदी   (3532 बार पढ़ा जा चुका है)

मैं आज तक इस बात को अपने मन में ही सोचती और समझती थी , लेकिन आज इस बात को कलम के सहारे लिखने को मजबूर हो गयी |


ये बात कोई और नहीं , ये बात हमारे समाज में लड़कियों क प्रति फैले कुविचार और अपराध हैं | आखिर लड़कियों में ऐसा क्या है या ऐसा क्या नहीं है जिसके कारन उसे समाज में लड़को से निचा दिखाया जाता है | क्या उसका अपना कोई हक़ नहीं ,कोई अधिकार नहीं |


सबसे बड़ी हैरानी तो हमे तब हुई जब ,मैं ट्रैन में सफर कर रही थी और बगल में बैठे दो औरतो को आपस में बातें करती हुई सुनी | उसमे से पहली औरत दूसरी औरत से बातों क क्रम में पूछती है ! क्या आपके बेटा-बेटी आपके पास ही रहते है ? दूसरी ने जवाब दी -बेटा दूर शहर में पढाई करने क लिए रहता है और बेटी मेरे पास | पुनः पहली औरत पूछती है -बेटा बेटी का शादी अभी तो नहीं करनी है न | दूसरी बोलती है -बेटी का करना है , ग्रेजुएशन तक पढ़ ही ली है और बेटा का तो जब से नौकरी नहीं होगा तब तक शादी नहीं करना है , ऐसे भी बेटा जाने कब शादी करेगा ,उसे किस तरह की लड़की चाहिए ये तो बेटा के ऊपर है | हमे क्या चिंता करना है इसक बारे में |


मैं जैसे ही इस बात को सुनी कि बेटा का जब से नौकरी नहीं होगा ................, बेटा जाने कब शादी करेगा ........ और उसे कैसी लड़की चाहिए .....| तब मेरे से रहा नहीं गया और मैं बीच में ही बोल पड़ी -क्यों बेटे क विषय में चिंता करना आपका काम नहीं और बेटी क विषय में सोचना आपका काम है ? क्या बेटी ये फैशला नहीं ले सकती है कि हमे कैसा लड़का से शादी करना चाहिए या फिर यह इच्छा नही कि नौकरी करे ? बेटी कि भी इच्छा होती है , दूर शहर में जाकर पढाई करना , उसे भी बेटे कि तरह खुल कर जीना आता हैं ,लेकिन हमारा समाज खुल कर जीने दे तब तो | आप एक माँ होकर अपने ही बेटा - बेटी के बीच भेदभाव एवं अंतर रखने लगी | मैं ये सब बाते बोल ही रही थी कि मेरे अगल -बगल कि ढेर सारी औरते भी ये सब बाते उस औरत को समझाने लगी कि ये बिलकुल सही बोल रही हैं , एक माँ होकर अपने ही संतान के बीच अंतर करना यह शोभनीय नहीं है , धर्म नहीं है | तब हमे बहुत ख़ुशी हुई कि कुछ लोग हैं जो बेटा-बेटी के बीच अंतर नहीं करते लेकिन उन दोनों औरत कि बातें सुनकर दुखी भी हुई |


तो क्या सच में लड़की का अपना कोई अधिकार नहीं है ? लड़की के साथ ही ये सब अन्याय आखिर क्यों ? ये सब हमारे समाज का दोष है, जो लड़कियों को लड़को के बराबरी नहीं समझा जाता हैं , और इस अन्याय को सभी लोग देखते है ,सुनते है लेकिन कोई इसका विरोध नहीं करता | यदि सभी मानव जाती इसका विरोध करे तो सम्भव है कि हमारे समाज से ये कुरीति एवं कुविचार सदा -सदा के लिए ही मिट जाये |


निवेदिता चतुर्वेदी

अगला लेख: एक बार ....



धन्यबाद बताने क लिए आगे से मई ऐसा ही करुँगी |

निवेदिता जी, ऐसा तो नहीं होना चाहिए , आप एक बार कोशिश कर के देखिये .. कमेंट अवश्य होना चाहिए ... साथ ही मई आपको एक जानकारी देना चाहती थी की आपको यदि कभी भी किसिस प्रकार की समस्या आए तो आप हमे ईमेल द्वारा सूचित करे क्योंकि हज़ारों की संख्या में आर्टिकल्स आने के कारण कई बार मेरी नज़र आर्टिकल्स की टिप्पणी में नहीं पड़ पाती . इसलिए ज्यादा सहुलियत होगी यदि आप हमे ईमेल करे इस पते पर - info@shabdanagari.in

हमारे समाज को संकुचित मानसिकता से बहार आना होगा

मुझे भी आपसे मिलकर बहुत ही अच्छा लगा | हाँ १ बात करनी थी आपसे , जब मैं दीपिका जी के कमेंट्स का जवाब देना चाही तो उनके निचे में कमेंट्स नहीं लिखा पा रहा है , ऐसा क्यों |

बिलकुल भी नहीं , मुझे तो उनका कमेंट अच्छा लगा , आपको सूचित करने हेतु मैंने आपको टिप्पणी द्वारा सूचित किया ..... मैंने फेस्बूक पर भी आपके कोमेंट्स देखे है ..... मुझे शब्दनगरी के जरिये आपसे मिलकर अच्छा लगा .....- प्रियंका

ये दीपिका कुमारी दीप्ति जी मेरी फेसबुक की मित्र है , इसलिए शायद वो कॉमेंट की | इससे आपको कोई आपत्ति तो नहीं , धन्यबाद

निवेदिता जी , हमने आपका ये लेख शब्दानगरी के गूगल प्लस अकाउंट में पोस्ट किया तो उस पर एक कमेंट आया है Deepika kumari दीप्ति जी का आपके लिए - उन्होंने लिखा है -
विल्कूल सही कहा आपने निवेदिता जी ! हमारे समाज में ये भेदभाव शुरु से ही चलता आ रहा है और न जाने कबतक चलता रहागा ।

बहुत बहुत धन्यबाद शब्दनगरी संगठन जी

प्रिय मित्र , आपकी इस उत्क्रष्ट रचना को शब्दनगरी के फ़ेसबुक , ट्विट्टर एवं गूगल प्लस पेज पर भी प्रकाशित किया गया है । नीचे दिये लिंक्स मे आप अपने पोस्ट देख सकते है - https://plus.google.com/+ShabdanagariIn/posts https://www.facebook.com/shabdanagari https://twitter.com/shabdanagari - प्रियंका शब्दनगरी संगठन

anamika
22 मई 2015

सच हैं,औरत,औरत को न मारे, तो वो कभी न हारें।

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
13 मई 2015
कि
किताबें कुछ कहना चाहती हैं | किताबों में चिड़ियाँ चहचहाती हैं | किताबों में खेतियाँ लहलहाती हैं | किताबों में झरने गुनगुनाते हैं | परियों के किस्से सुनाते हैं | सबके सब मन बहलाते है | किताबों में राकेट का राज हैं | किताबों में साइंस की आवाज हैं | किताबों का कितना बड़ा संसार हैं | संसार की स
13 मई 2015
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x