Sketches from Life: चन्द्रो

22 अप्रैल 2020   |  हर्ष वर्धन जोग   (367 बार पढ़ा जा चुका है)

Sketches from Life: चन्द्रो

चन्द्रो

लोअर बाज़ार एक संकरी सी सड़क पर था और उस सड़क के दोनों तरफ छोटी छोटी दुकानों की दो कतारें थी. सौ मीटर चलें तो दाहिनी ओर एक पक्का मकान था जिसमें आप का अपना बैंक था. आगे चलते चलें तो परचून की, जूतों की, मिर्च मसालों की वगैरा वगैरा दुकानें मिलती जाएँगी. ज्यादा एक्टिव बाज़ार नहीं था सोया सोया सा था. इसी तरह ब्रांच में भी ग्यारह बजे से पहले शांति रहती थी. हाँ महीना शुरू होते ही पेंशन लेने वाले लाइन लगा लेते थे और तब छोटी सी ब्रांच और छोटी लगने लगती थी.

ज्यादातर पेंशन लेने वाले पुरुष थे जो आसपास के गाँव से आते थे. कुछ महिलाएं भी पेंशन लेने आती थीं. इनमें चन्द्रो भी थी. पिछले साल जब यहाँ ज्वाइन किया था तो तीसरे दिन ही चन्द्रो से मुलाकात हो गई थी. चन्द्रो ने केबिन के दरवाज़े पे खड़े होकर बेबाक ऊँची आवाज़ में बोली,
- साब जी को नमस्ते ! नए आए हो ?
- 'हूँ !' बोल के चन्द्रो की शकल देखी और सोचा ये कौन सी जनरल मैनेजर आ गई पूछती है नए आए हो ? तब तक उसने इंकपैड उठाकर स्लिप पर अंगूठा लगा दिया और लाल पेन उठाकर पकड़ा दिया,
- लो जी गूठा लगा दिया सही कर दो.
- आपको तो पूरी जानकारी है ?
- लो जी पन्दरा साल हो गए पिंशन लेते पूरा पता है. चलो जी नमस्ते.

गौर से देखा तो लगा चन्द्रो सत्तर के आसपास होगी. चेहरे पर झुरियां, बाल सफ़ेद पर गाल लाल और मुस्कराहट. बिना रोक-टोक बतियाना और हंसना. सात आठ मिनट ब्रांच में रही और सिर्फ उसी की आवाज़ गूंजती रही. बाद में पता लगा केशियर और ऑफिसर से कई बार लड़ चुकी थी और वो दोनों चन्द्रो से कन्नी काटते थे. हालांकि उसके नाम साढ़े चार लाख की फिक्स्ड डिपाजिट भी थी. लोअर बाज़ार ब्रांच में उन दिनों साढ़े चार लाख ठीक ठाक रकम थी.

चन्द्रो से दूसरी मुलाकात उसके गाँव में हुई. गाँव से तीन लोन के फॉर्म आए हुए थे और उन लोगों से मिलना था. पर रास्ते में चन्द्रो मिल गई और उसने मेरा ही इंटरव्यू लेना शुरू कर दिया ! फिर अपने बारे में उसने बताया की फौजी की पत्नी थी. रिटायर होने के बाद फौजी मकान बनवा रहा था उसी दौरान एक्सीडेंट में उसका निधन हो गया. किसी तरह मकान पूरा कराया. मकान पर नज़र डाली तो देखा की गाँव के दूसरे मकानों से ज्यादा साफ़ और बेहतर था. दोनों का कोई बच्चा नहीं था और वो अकेली उस मकान में रह रही थी. उसे अफ़सोस था की वो बचपन में स्कूल नहीं जा पाई. चन्द्रो ने चाय के लिए पूछा पर काम करने की जल्दी थी इसलिए उसे मना कर दिया. पर ब्रांच में आइन्दा जब भी आई तो उसका काम जल्दी करवा देता था. खजांची भी खुश रहने लगा था.

सोमवार को गाँव के स्कूल के हेड मास्टर जी पधारे.
- हेड मास्टर जी आज कैसे आना हुआ ? स्कूल की छुट्टी तो है नहीं आज.
- कुछ काम से आया था. आपकी ब्रांच में चन्द्रो नाम की पेंशनर का खाता है शायद.
- हाँ है तो.
- उसका बैलेंस बता दें.
- वो क्यूँ आपको तो नहीं बता सकते. क्या आप की रिश्तेदार है ?
- हाँ रिश्तेदार तो है. है क्या थी पिचले सोमवार को उसका स्वर्गवास हो गया.
- ओ ! सुनकर अच्छा नहीं लगा. पर हरी इच्छा ! उसके खाते का बैलेंस का आपने क्या करना है ?
- जी वो चन्द्रो अपनी वसीयत लिखवा गई थी. अपना मकान, एक गाय और खाते का बैलेंस स्कूल को दान कर गई है.
- अच्छा !
- वकील की बनी हुई पक्की वसीयत है जी. मैंने भी विटनेस दी थी. दो और भी विटनेस हैं. फॉर्म वगैरा दे दो भर के सारे कागज़ लगा के आपको अगले हफ्ते दे देंगे. स्कूल का खाता भी आपके ही पास है. उसी में डाल देना बस काम आसान हो गया.
- हाँ हाँ आप पेपर्स ले लाइए कर देंगे. चन्द्रो अकेली ही थी क्या ? और कोई रिश्तेदार वगैरा नहीं थे क्या ?
- साब चन्द्रो की दो बहनें और तीन भाई हैं. और उसके घरवाले के भी भाई बहन थे परन्तु वसीयत में किसी को कुछ नहीं दिया. कहती थी की मेरे मकान के पीछे पड़ें हैं सारे. मेरा ख़याल किसी को नहीं है. किसी को भी कुछ नहीं दूँगी.
- हूँ ठीक किया. वसीयत लिख कर सबको नसीहत दे दी.

गाँव की सत्तर साल की एक अनपढ़ औरत ने सोचने पर मजबूर कर दिया. अब वसीयत भी लिखनी है और उसमें दान की व्यवस्था भी करनी है.

आपने अपनी वसीयत लिख दी क्या ?
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