देखि न सकइं पराइ विभूती :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

26 अप्रैल 2020   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (324 बार पढ़ा जा चुका है)

देखि न सकइं पराइ विभूती :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धराधाम पर मनुष्य सभी प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ कहा जाता है | अपने गुणों से मनुष्य ने यह श्रेष्ठता स्थापित करके स्वयं को सिद्ध भी किया है | आदिकाल से मनुष्य आपसी सामंजस्य , प्रेम एवं भाईचारा बनाकर एक दूसरे का सहयोग करता चला आया है | जहां समाज में एक दूसरे का हित चाहने वाले देखे जाते हैं जो दूसरों का भला करने के लिए अपना सर्वस्व दांव पर लगा देते हैं वहीं दूसरी ओर कुछ ऐसे लोग भी इसी समाज में रखते हैं जो दूसरों की उन्नति को देख कर के स्वयं में जलते एवं कुढ़ते रहते हैं | शायद ऐसे ही लोगों के लिए कविकुल शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी ने मानस में चौपाई लिखी है :-- "ऊंच निवास करतूती ! देखि ना सकइं पराइ विभूती !!" अर्थात :- ऊंचे कुल में जन्म लेकर उच्च पद एवं प्रतिष्ठा प्राप्त करने के बाद भी इनके कर्म बहुत ही निम्न होते हैं | दूसरों के ऐश्वर्य को , दूसरों को बर्चस्व को न देख पाने वाले लोग किसी को भी उन्नति करता हुआ नहीं देख पाते और यथासंभव प्रयास करते रहते हैं कि इसकी उन्नति अवनति में बदल जाय | ऐसे लोग सारे सुख ऐश्वर्य होने के बाद भी कभी भी प्रसन्न नहीं रह सकते | यदि किसी ने उच्च स्थान प्राप्त किया है तो उसने कितने कंटकंय मार्गों की यात्रा की है तब इस स्थान पर पहुँचा होगा | यह देखना चाहिए | किसी को कोई भी उच्चपद ऐसे ही नहीं प्राप्त हो जाता है उसके लिए मनुष्य को कर्म करना होता है अपने कर्म पर बल पर , कर्म को आधार बनाकर मनुष्य उच्च स्थान प्राप्त करता है , परंतु कुछ लोग उसके कर्मों को ना देख कर सिर्फ उसके उच्च स्थान को देखते हुए उसे ऐसा करने लगते हैं और अपनी ईर्ष्या के कारण उसकी निंदा करने का प्रयास करते हैं | ऐसे लोग अंतर्मुखी होते हैं और यह समाज में कभी किसी के हितैषी नहीं हो सकते , क्योंकि उनका लक्ष्य एक ही होता है उन्नति कर रहे मनुष्य को किस प्रकार गिराया जाय ! यह अलग विषय है कि वे स्वयं मैं सफल नहीं हो पाते हैं पर उनका यह प्रयास अनवरत जारी रहता है | अपने इन कृत्यों के कारण उनको लोग दोषी भी मानते हैं परंतु उनको यह अपना दोष नहीं लगता है बल्कि अपने अनुसार वे सकारात्मक कर्म की कर रहे होते हैं क्योंकि सबसे मुख्य विषय होता है मनुष्य की मानसिकता जिस प्रकार की मानसिकता बन गई है उसको बदल पाना कठिन ही नहीं बल्कि असंभव हो जाता है |*


*आज समाज में यत्र यत्र सर्वत्र इस प्रकार के महापुरुषों के दर्शन बड़ी सरलता से किए जा सकते हैं | चाहे राजनैतिक क्षेत्र हो , चाहे सामाजिक या फिर धार्मिक क्षेत्र हो आज प्रत्येक क्षेत्र में ऐसे लोग अपने कृत्य करते हुए दिख ही जाते हैं | देश के किसी भी राजनैतिक दल को देख लीजिए वे इसका ज्वलंत उदाहरण कहे जा सकते हैं | जहाँ अपनी अज्ञानता के कारण मनुष्य ऐसे कृत्य करता है वहीं अज्ञानता रूपी अंधकार को ज्ञानरूपी प्रकाश से दूर करने वाला विद्वतसमाज भी आज इस बीमारी से ग्रसित हो गया है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" देख रहा हूँ कि आज एक विद्वान दूसरे विद्वान को गिराने पर ही लगा दिख रहा है | यदि कोई माता - पिता के आशीर्वाद एवं सद्गुरु द्वारा प्रदत्त ज्ञान को अवलम्ब बनाकर समाज में स्थापित हो गया है तो लोग उससे व्यर्थ में ही ईर्ष्या करने लगते हैं | सबसे आश्चर्यजनक तथ्य यह देखने को मिल रहा है कि ऐसे लोग समुपस्थित होने पर ऐसा व्यवहार करते हैं जैसे इनसे अधिक प्रिय अन्य कोई हो ही नहीं सकता परंतु ये जैसे ही अवसर पाते हैं इनका सारा प्रेम गायब हो जाता है और ये सम्बन्धित विद्वान के प्रति विष वंन करने लगते हैं | किसी ने यदि उच्च पद प्राप्त करके समाज में सम्मान प्राप्त किया है तो उसने कर्म किया होगा ! किसी के प्रति ईर्ष्या न करके प्रत्येक मनुष्य को इसी कप्म को आधार बनाकर वैसा ही पद प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए | ऐसा करके वह भी यह स्थान प्राप्त कर सकता है परंतु कुछ लोग दूसरों की बुराई करके ही प्रसिद्धि प्राप्त करना चाहते हैं जो कि सम्भव नहीं हो सकता |*


*दूसरे की पद - प्रतिष्ठा देखने की अपेक्षा उस पद को प्राप्त करने के लिए किये गये कर्मों का अवलोकन करके उसी पथ का पथिक बनकर उस पद प्रतिष्ठा को स्वयं भी प्राप्त करने का प्रयास ही मनुष्य को सफल बना सकता है |*

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