मदर्स डे की कविता पढ़ेंगे - mothers day poems in hindi

28 अप्रैल 2020   |  मोनिका चौधरी   (255 बार पढ़ा जा चुका है)

मदर्स डे की कविता पढ़ेंगे - mothers day poems in hindi

इस लेख में आप मदर्स डे की कविता पढ़ेंगे - mothers day poems in hindi -


मदर्स डे माँ के सम्मान में मनाया जाता है. मातृत्व, मातृ बंधन व् परिवार में माँ के महत्त्व को सेलिब्रेट करता, इस मदर्स डे की आप सभी को ढेरों शुभकामनाएं. हमारे भारतीय समाज में माँ को भगवान के समान दर्जा दिया जाता था, भगवान के बाद अगर कोई बोले तो माँ की ही पूजा की जाती है. वैसे माँ के बलिदान उनके प्यार को शब्दों में या किसी एक दिन स्पेशल बनाकर नहीं कर सकते है. मदर्स डे रोज सेलिब्रेट होना चाहिए, ताकि हम अपनी माँ के कार्य को दिल से समझ सकें और उन्हें वो सम्मान दें जिसकी वो हक़दार है. कहते है जिनके पास जो चीज नहीं होती है उन्हें वो चीज की सही कीमत समझ आती है. जिनके पास माँ नहीं होती है, वो उनकी कमी को अच्छे से समझ सकते है.


माँ क्या है -

माँ वो है जो हमें जीना सिखाती है, दुनिया में वो पहला इन्सान जिसे हम मात्र स्पर्श से जान जाते है वो होती है माँ. 9 महीने तक अपने पेट में रखने के बाद, इनती परेशानियों के बाद वो हमें जन्म देती है. माँ के लिए तो उसकी पूरी दुनिया उसके बच्चे ही होते है. छोटे हो या बड़े माँ को हर वक्त अपने बच्चे की चिंता होती है. स्कूल जाने से पहले घर में जीवन का जो पाठ सिखाये वो होती है माँ. गिर कर जो उठना सिखाये वो होती है माँ. रात को देर तक पढाई करने पर जो हमारे साथ जागे वो होती है माँ. रिजल्ट आने पर जिसे हम से ज्यादा ख़ुशी हो वो होती है माँ. रात को देर से घर आने पर हमारा जो इंतजार करे वो होती है माँ. पापा से गलतियों में जो बचाए वो होती है माँ. हमें परेशानी में देख जो बिना बोले समझ जाये वो होती है माँ. हमारे दुःख में जो खुद रोने लगे वो होती है माँ. माँ को परिभाषित करने के लिए शब्द कम पड़ जायेंगें लेकिन उसे हम कुछ शब्दों में परिभाषित नहीं कर पायेंगें.


माँ के लिए कविता : mothers day poems in hindi -

1. अपने आंचल की छाओं में,

छिपा लेती है हर दुःख से वोह

एक दुआ दे दे तो

काम सारे पूरे हों…


अदृश्य है भगवान,

ऐसा कहते है जो…

कहीं ना कहीं एक सत्य से,

अपरिचित होते है वोह…

खुद रोकर भी हमें

हसाती है वोह…

हर सलीका हमें

सिखलाती है वोह…


परेशानी हो चाहे जितनी भी,

हमारे लिए मुस्कुराती है वोह…

हमारी खुशियों की खातिर

दुखो को भी गले लगाती है वो…

हम निभाएं ना निभाएं

अपना हर फ़र्ज़ निभाती है वोह…

हमने देखा जो सपना

सच उसे बनती है वो…


दुःख के बादल जो छाये हमपर

तो धुप सी खिल जाती है वोह…

ज़िन्दगी की हर रेस में

हमारा होसला बढाती है वोह…

हमारी आँखों से पढ़ लेती है

तकलीफ और उसे मिटाती है वोह…

पर अपनी तकलीफ कभी नही जताती है वोह…


शायद तभी भगवान से भी ऊपर आती है वोह…

तब भी त्याग की मूरत नही माँ कहलाती है ‘वोह’….


2. माँ भगवान का दूसरा रूप

उनके लिए दे देंगे जान


हमको मिलता जीवन उनसे

कदमो में है स्वर्ग बसा


संस्कार वह हमे बतलाती

अच्छा बुरा हमे बतलाती


हमारी गलतियों को सुधारती

प्यार वह हमपर बरसती.


तबियत अगर हो जाए खराब

रात-रात भर जागते रहना


माँ बिन जीवन है अधुरा

खाली-खाली सुना-सुना


खाना पहले हमे खिलाती

बादमे वह खुद खाती


हमारी ख़ुशी में खुश हो जाती

दुःख में हमारी आँसू बहाती


कितने खुश नसीब है हम

पास हमारे है माँ


होते बदनसीब वो कितने

जिनके पास ना होती माँ…


3. प्यारी प्यारी मेरी माँ

प्यारी-प्यारी मेरी माँ

सारे जाग से न्यारी माँ.


लोरी रोज सुनाती है,

थपकी दे सुलाती है.

जब उतरे आँगन में धूप,

प्यार से मुझे जगाती है.


देती चीज़ें सारी माँ,

प्यारी प्यारी मेरी माँ.


उंगली पकड़ चलाती है,

सुबह-शाम घुमाती है.

ममता भरे हुए हाथों से,

खाना रोज खिलाती है.


देवी जैसी मेरी माँ,

सारे जाग से न्यारी माँ….


4. माँ

चूल्‍हे की आग में खुद को तपाती हुई

बच्चे की ग़लतियाँ ममता में भुला रही है

दूध रोटी से लेकर, मंदिर के घंटे तक

स्नेह की चाशनी में, बचपन घुला रही है

बारिश के मौसम में, अंदर से गीला होकर

बच्चे को बचाकर खुद को सिला रही है

बिगड़ ना जाए वो, कुछ ऐसा ही सोचे

उसे डाँटकर माँ खुद को रुला रही है

अंधेरा है आगे, कहीं डर ना जाए बच्चा

कतरा कतरा माँ खुद को जला रही है

बहुत खेल चुके, अब शाम हो गयी है

आ जाओ पास माँ तुम्हे बुला रही है..!


5. मेरी प्यारी माँ तू कितनी प्यारी है

जग है अधियांरा तू उजियारी है

शहद से मिठी हैं तेरी बातें

आशीष तेरा जैसे हो बरसातें


डांट तेरी है मिर्ची से तीखी

तुझ बिन जिंदगी है कुछ फीकी

तेरी आंखों में छलकते प्यार के आँसू

अब मैं तुझसे मिलने को भी तरसूं


माँ होती है भोरी भारी

सबसे सुंदर प्यारी प्यारी….


6. हमारे हर मर्ज की दवा होती है माँ….

कभी डाँटती है हमें, तो कभी गले लगा लेती है माँ…..

हमारी आँखोँ के आंसू, अपनी आँखोँ मेँ समा लेती है माँ…..

अपने होठोँ की हँसी, हम पर लुटा देती है माँ……

हमारी खुशियोँ मेँ शामिल होकर, अपने गम भुला देती है माँ….

जब भी कभी ठोकर लगे, तो हमें तुरंत याद आती है माँ…..


दुनिया की तपिश में, हमें आँचल की शीतल छाया देती है माँ…..

खुद चाहे कितनी थकी हो, हमें देखकर अपनी थकान भूल जाती है माँ….

प्यार भरे हाथोँ से, हमेशा हमारी थकान मिटाती है माँ…..

बात जब भी हो लजीज खाने की, तो हमें याद आती है माँ……

रिश्तों को खूबसूरती से निभाना सिखाती है माँ…….

लब्जोँ मेँ जिसे बयाँ नहीँ किया जा सके ऐसी होती है माँ…….

भगवान भी जिसकी ममता के आगे झुक जाते हैँ


7. मेरे सर्वस्व की पहचान

अपने आँचल की दे छाँव

ममता की वो लोरी गाती

मेरे सपनों को सहलाती

गाती रहती, मुस्कराती जो

वो है मेरी माँ।


प्यार समेटे सीने में जो

सागर सारा अश्कों में जो

हर आहट पर मुड़ आती जो

वो है मेरी माँ।


दुख मेरे को समेट जाती

सुख की खुशबू बिखेर जाती

ममता की रस बरसाती जो

वो है मेरी माँ।


8. मैं अपने छोटे मुख कैसे करूँ तेरा गुणगान

माँ तेरी समता में फीका-सा लगता भगवान


माता कौशल्या के घर में जन्म राम ने पाया

ठुमक-ठुमक आँगन में चलकर सबका हृदय जुड़ाया

पुत्र प्रेम में थे निमग्न कौशल्या माँ के प्राण

माँ तेरी समता में फीका-सा लगता भगवान


दे मातृत्व देवकी को यसुदा की गोद सुहाई

ले लकुटी वन-वन भटके गोचारण कियो कन्हाई

सारे ब्रजमंडल में गूँजी थी वंशी की तान

माँ तेरी समता में फीका-सा लगता भगवान


तेरी समता में तू ही है मिले न उपमा कोई

तू न कभी निज सुत से रूठी मृदुता अमित समोई

लाड़-प्यार से सदा सिखाया तूने सच्चा ज्ञान

माँ तेरी समता में फीका-सा लगता भगवान


कभी न विचलित हुई रही सेवा में भूखी प्यासी

समझ पुत्र को रुग्ण मनौती मानी रही उपासी

प्रेमामृत नित पिला पिलाकर किया सतत कल्याण

माँ तेरी समता में फीका-सा लगता भगवान


‘विकल’ न होने दिया पुत्र को कभी न हिम्मत हारी

सदय अदालत है सुत हित में सुख-दुख में महतारी

काँटों पर चलकर भी तूने दिया अभय का दान

माँ तेरी समता में फीका-सा लगता भगवान


9. माँ मैं फिर जीना चाहता हूँ, तुम्हारा प्यारा बच्चा बनकर

माँ मैं फिर सोना चाहता हूँ, तुम्हारी लोरी सुनकर

माँ मैं फिर दुनिया की तपिश का सामना करना चाहता हूँ, तुम्हारे आँचल की छाया पाकर

माँ मैं फिर अपनी सारी चिंताएँ भूल जाना चाहता हूँ, तुम्हारी गोद में सिर रखकर

माँ मैं फिर अपनी भूख मिटाना चाहता हूँ, तुम्हारे हाथों की बनी सूखी रोटी खाकर

माँ मैं फिर चलना चाहता हूँ, तुम्हारी ऊँगली पकड़ कर

माँ मैं फिर जगना चाहता हूँ, तुम्हारे कदमों की आहट पाकर

माँ मैं फिर निर्भीक होना चाहता हूँ, तुम्हारा साथ पाकर

माँ मैं फिर सुखी होना चाहता हूँ, तुम्हारी दुआएँ पाकर

माँ मैं फिर अपनी गलतियाँ सुधारना चाहता हूँ, तुम्हारी चपत पाकर

माँ मैं फिर संवरना चाहता हूँ, तुम्हारा स्नेह पाकर

क्योंकि माँ मैंने तुम्हारे बिना खुद को अधूरा पाया है. मैंने तुम्हारी कमी महसूस की है .


10. जब कभी शाम के साये मंडराते हैं

मैं दिवाकिरण की आहट को रोक लेती हूँ

और सायास एक बार

उस तुलसी को पूजती हूँ

जिसे रोपा था मेरी माँ ने

नैनीताल जाने से पहले

जब हम इसी आँगन में लौटे थे

तब मैं उस माँ की याद में रो भी न सकी थी

वह माँ जिसके सुमधुर गान फिर कभी सुन न सकी थी

वह माँ जो उसी आँगन में बैठ कर मुझे अल्पना उकेरना सिखा न सकी थी

वह माँ जिसके बनाये व्यंजनों में मेरा भाग केवल नमकीन था

वह माँ जिसके वस्त्रों में सहेजा गया ममत्व

मेरी विरासत न बन

एक परंपरा बन गया था

वह माँ जिसके पुनर्वास के लिए

हमने सहेजे थे कंदील और

हम बैठे थे टिमटिमाते दीपों की छाया में

और बैठे ही रहे थे |


11. बचपन में अच्छी लगे यौवन में नादान।

आती याद उम्र ढ़ले क्या थी माँ कल्यान।।१।।


करना माँ को खुश अगर कहते लोग तमाम।

रौशन अपने काम से करो पिता का नाम।।२।।


विद्या पाई आपने बने महा विद्वान।

माता पहली गुरु है सबकी ही कल्यान।।३।।


कैसे बचपन कट गया बिन चिंता कल्यान।

पर्दे पीछे माँ रही बन मेरा भगवान।।४।।


माता देती सपन है बच्चों को कल्यान।

उनको करता पूर्ण जो बनता वही महान।।५।।


बच्चे से पूछो जरा सबसे अच्छा कौन।

उंगली उठे उधर जिधर माँ बैठी हो मौन।।६।।


माँ कर देती माफ़ है कितने करो गुनाह।

अपने बच्चों के लिए उसका प्रेम अथाह।।७।।


12. थोड़ी थोड़ी धूप निकलती थोड़ी बदली छाई है

बहुत दिनों पर आज अचानक अम्मा छत पर आई है!


शॉल सरक कर कांधों से उजले पाँवों तक आया है

यादों के आकाश का टुकड़ा फटी दरी पर छाया है

पहले उसको फ़ुर्सत कब थी छत के ऊपर आने की

उसकी पहली चिंता थी घर को जोड़ बनाने की

बहुत दिनों पर धूप का दर्पण देख रही परछाई है!

बहुत दिनों पर आज अचानक अम्मा छत पर आई है!


सिकुड़ी सिमटी उस लड़की को दुनिया की काली कथा मिली

पापा के हिस्से का कर्ज़ मिला सबके हिस्से की व्यथा मिली

बिखरे घर को जोड़ रही थी काल चक्र को मोड़ रही थी

लालटेन-सी जलती-बुझती गहन अंधेरे तोड़ रही थी

सन्नाटे में गूँज रही वह धीमी-सी शहनाई है!

बहुत दिनों पर आज अचानक अम्मा छत पर आई है!


दूर गाँव से आई थी वह दादा कहते बच्ची है

चाचा कहते भाभी मेरी फूलों से भी अच्छी है

दादी को वह हँसती-गाती अनगढ़-सी गुड़िया लगती थी

छोटा मैं था- मुझको तो वह आमों की बगिया लगती थी

जीवन की इस कड़ी धूप में अब भी वह अमराई है!

बहुत दिनों पर आज अचानक अम्मा छत पर आई है!


नींद नहीं थी लेकिन थोड़े छोटे-छोटे सपने थे

हरे किनारे वाली साड़ी गोटे-गोटे सपने थे

रात रात भर चिड़िया जगती पत्ता-पत्ता सेती थी

कभी-कभी आँचल का कोना आँखों पर धर लेती थी

धुंध और कोहरे में डूबी अम्मा एक तराई है!

बहुत दिनों पर आज अचानक अम्मा छत पर आई है!


हँसती थी तो घर में घी के दीए जलते थे

फूल साथ में दामन उसका थामे चलते थे

धीरे धीरे घने बाल वे जाते हुए लगे

दोनों आँखों के नीचे दो काले चाँद उगे

आज चलन से बाहर जैसे अम्मा आना पाई है!


पापा को दरवाज़े तक वह छोड़ लौटती थी

आँखों में कुछ काले बादल जोड़ लौटती थी

गहराती उन रातों में वह जलती रहती थी

पूरे घर में किरन सरीखी चलती रहती थी

जीवन में जो नहीं मिला उन सबकी माँ भरपाई है!

बहुत दिनों पर आज अचानक अम्मा छत पर आई है!


बड़े भागते तीखे दिन वह धीमी शांत बहा करती थी

शायद उसके भीतर दुनिया कोई और रहा करती थी

खूब जतन से सींचा उसने फ़सल फ़सल को खेत खेत को

उसकी आँखें पढ़ लेती थीं नदी नदी को रेत रेत को

अम्मा कोई नाव डूबती बार बार उतराई है!

बहुत दिनों पर आज अचानक अम्मा छत पर आई है

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